क्या रवींद्र केलकर ने कोंकणी भाषा को पहचान दिलाई?

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क्या रवींद्र केलकर ने कोंकणी भाषा को पहचान दिलाई?

सारांश

रवींद्र केलकर, कोंकणी साहित्य के प्रमुख स्तंभ, जिन्होंने कोंकणी भाषा को पहचान दिलाई और गोवा को सम्मान दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी लेखनी और संघर्ष ने न केवल साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि संस्कृति की धरोहर को भी सहेजा। जानिए उनके जीवन की प्रेरणादायक कहानी।

Key Takeaways

  • कोंकणी भाषा की पहचान के लिए रवींद्र केलकर का योगदान महत्वपूर्ण है।
  • उन्होंने कोंकणी साहित्य को नई दिशा दी।
  • रवींद्र केलकर का संघर्ष और लेखनी प्रेरणादायक है।
  • उन्होंने गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने में भी मदद की।
  • उनकी कृतियों ने भारतीय साहित्य को समृद्ध किया।

नई दिल्ली, 26 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। कोंकणी साहित्य के मुख्य स्तंभों में रवींद्र केलकर का नाम लेना अनिवार्य है। उन्होंने ही कोंकणी भाषा को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करवाने और गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी प्रसिद्ध किताब 'आमची भास कोंकणिच' (1962) ने कोंकणी भाषा की अस्मिता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

रवींद्र केलकर ने कोंकणी साहित्य की ग्रंथसूची को कोंकणी, हिंदी और कन्नड़ में प्रस्तुत कर भाषा की सांस्कृतिक और साहित्यिक समृद्धि को उजागर किया। उनके प्रयासों के कारण 1975 में साहित्य अकादमी ने कोंकणी को स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता दी और 1992 में इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।

7 मार्च 1925 को दक्षिण गोवा के कुंकोलिम में जन्मे रवींद्र के पिता डॉ. राजाराम केलकर एक प्रसिद्ध चिकित्सक थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पणजी के लिसेयुम हाई स्कूल में प्राप्त की और छात्र जीवन में ही 1946 में गोवा मुक्ति संग्राम से जुड़े, जिसने उनके जीवन और लेखन को गहराई से प्रभावित किया।

केलकर ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और गोवा के पुर्तगाली शासन से मुक्ति के लिए सक्रिय भूमिका निभाई। 1946 में गोवा मुक्ति आंदोलन में शामिल होने के बाद वे कई राष्ट्रीय नेताओं, जैसे राम मनोहर लोहिया और गांधीवादी विचारकों के संपर्क में आए। लोहिया से प्रेरित होकर उन्होंने मातृभाषा कोंकणी को जन-जागरण का माध्यम बनाया। 1949 में वे वर्धा चले गए, जहां उन्होंने गांधीवादी विचारक काकासाहेब कालेलकर के साथ काम किया।

बाद में दिल्ली के गांधी स्मारक संग्रहालय में लाइब्रेरियन के रूप में कार्य किया, लेकिन गोवा की आजादी के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी। गोवा मुक्ति के लिए उन्होंने 'गोमांतभारती' साप्ताहिक पत्रिका का संपादन किया, जो रोमन लिपि में कोंकणी में प्रकाशित होती थी।

इसके अलावा, केलकर ने कोंकणी भाषा मंडल की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 'जाग' पत्रिका का 20 सालों तक संपादन किया। उनकी लगभग 100 पुस्तकों में से कई कोंकणी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियां हैं, जिनमें यात्रा के दौरान हुए अनुभव (यात्रा वृत्तांत), निबंध और अनुवाद शामिल हैं।

उनके यात्रा वृत्तांत 'हिमालयांत' को 1976 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और उन्होंने गुजराती लेखक झवेरचंद मेघानी की पुस्तक का कोंकणी में अनुवाद कर 1990 में दूसरा साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त, उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी फेलोशिप, गोवा कला अकादमी साहित्य पुरस्कार (1974), कोंकणी साहित्यरत्न पुरस्कार (1994) और पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

रवींद्र केलकर का निधन 27 अगस्त 2010 को गोवा के मडगांव में हुआ। उनकी मृत्यु के साथ ही कोंकणी साहित्य ने एक महान हस्ती को खो दिया।

Point of View

बल्कि भारतीय संस्कृति के लिए भी प्रेरणादायक है। उनकी कोशिशों ने हमें यह सिखाया कि भाषा और संस्कृति की पहचान को सहेजना आवश्यक है। एक राष्ट्रीय संपादक के रूप में, हम उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे।
NationPress
30/08/2025

Frequently Asked Questions

रवींद्र केलकर का जन्म कब और कहाँ हुआ?
रवींद्र केलकर का जन्म 7 मार्च 1925 को दक्षिण गोवा के कुंकोलिम में हुआ।
उन्होंने कोंकणी भाषा को संविधान में कब शामिल कराया?
उन्होंने कोंकणी भाषा को 1992 में भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करवाया।
रवींद्र केलकर को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी फेलोशिप, गोवा कला अकादमी साहित्य पुरस्कार, कोंकणी साहित्यरत्न पुरस्कार और पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
उनकी प्रमुख कृतियों में कौन-कौन सी शामिल हैं?
उनकी प्रमुख कृतियों में 'आमची भास कोंकणिच' और यात्रा वृत्तांत 'हिमालयांत' शामिल हैं।
रवींद्र केलकर का निधन कब हुआ?
रवींद्र केलकर का निधन 27 अगस्त 2010 को गोवा के मडगांव में हुआ।