समता दिवस: बिहार के छोटे गांव से उप प्रधानमंत्री बनने तक 'बाबूजी' की प्रेरणादायक यात्रा
सारांश
Key Takeaways
- जगजीवन राम का जीवन समानता और न्याय का प्रतीक है।
- उन्होंने दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।
- उनकी जयंती को समता दिवस के रूप में मनाया जाता है।
- बाबूजी ने स्वतंत्रता संग्राम में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- उनका योगदान समाज में बदलाव लाने के लिए प्रेरणादायक है।
नई दिल्ली, 4 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। 5 अप्रैल... यह केवल एक दिन नहीं है। इसी दिन 1908 में बिहार के एक छोटे से गांव, चंदवा में जगजीवन राम का जन्म हुआ, जिन्हें सभी 'बाबूजी' के नाम से जानते थे। वे ऐसे नेता थे जिन्होंने अपने समस्त जीवन को समाज में समानता और न्याय की स्थापना के लिए समर्पित किया। यही कारण है कि उनकी जयंती को समता दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में सार्वजनिक अवकाश भी होता है।
बचपन में ही बाबूजी को भेदभाव का सामना करना पड़ा। उन्हें अपनी जाति के कारण स्कूल में अन्य बच्चों के साथ एक ही बर्तन से पानी पीने की अनुमति नहीं थी, लेकिन उन्होंने इस अन्याय को स्वीकार नहीं किया और अलग रखे बर्तन तोड़ दिए। उनके इस साहस ने विद्यालय के नियमों में बदलाव लाने में मदद की।
बाबूजी की शिक्षा आरा टाउन स्कूल से हुई, जहाँ उन्होंने उत्कृष्ट अंक प्राप्त किए। इसके बाद, उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में पढ़ाई की और फिर कलकत्ता विश्वविद्यालय से बीएससी की डिग्री हासिल की। कॉलेज के दिनों में ही वे महात्मा गांधी के अस्पृश्यता विरोधी आंदोलन में शामिल हुए और समाज में समानता के संदेश का प्रचार करने लगे।
बाबूजी सिर्फ एक छात्र या नेता ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने दलित और पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित किया। 1930 के दशक में, उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय भाग लिया। 1934 में उन्होंने अखिल भारतीय रविदास महासभा और अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ की स्थापना की। उनका मानना था कि समाज के सभी लोग, चाहे वे अछूत हों, मंदिर और कुओं में समान रूप से प्रवेश कर सकें।
1940 में, सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्हें गिरफ्तार किया गया। स्वतंत्रता के बाद, बाबूजी ने राजनीति में कदम रखा और पहले श्रम मंत्री बने। इसके बाद, वे रेलवे, कृषि, रक्षा और संचार जैसे महत्वपूर्ण विभागों में मंत्री रहे। 1971 में, वे भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान रक्षा मंत्री थे।
बाबूजी का राजनीतिक करियर प्रेरणादायक था। 1936 में, जब वे केवल 28 वर्ष के थे, तब वे बिहार विधान परिषद के सदस्य बने। इसके बाद, 50 वर्षों तक वे संसद सदस्य रहे। 1977 में, उन्हें भारत का उप प्रधानमंत्री बनाया गया। उनका जीवन गरीब और पिछड़े समुदायों के लिए संघर्ष करते हुए समाज में बदलाव लाने का एक प्रेरणादायक उदाहरण है।
उनके निजी जीवन में भी कई उतार-चढ़ाव थे। बाबूजी की पहली पत्नी का निधन 1933 में हुआ। इसके बाद, उन्होंने इंद्राणी देवी से विवाह किया और उनके दो बच्चे हुए, सुरेश कुमार और मीरा कुमार, जो स्वयं भी राजनीतिज्ञ बने और लोकसभा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बाबूजी का निधन 6 जुलाई 1986 को हुआ। उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में ऐसे स्थान पर हुआ, जिसे 'समता स्थल' कहा जाता है। उन्होंने अपना जीवन समाज की कुरीतियों को समाप्त करने और लोगों को समानता का अधिकार दिलाने में बिताया। इसी कारण, हर साल उनकी जयंती, 5 अप्रैल को समता दिवस के रूप में मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य यह याद दिलाना है कि समाज में किसी के साथ छुआछूत, जातिवाद या अन्यायपूर्ण व्यवहार कभी भी स्वीकार्य नहीं है।