मोदी के जन्मदिन पर 'दीपोत्सव' विवाद: संतोष सुमन बोले — दीये जलाना भारतीय संस्कृति की अभिव्यक्ति, राजनीति नहीं
सारांश
मुख्य बातें
बिहार के मंत्री संतोष कुमार सुमन ने गुरुवार, 17 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर प्रस्तावित 'दीपोत्सव' कार्यक्रम का खुलकर बचाव किया और कहा कि जश्न के रूप में दीये जलाने पर किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए। पटना में पत्रकारों से बात करते हुए सुमन ने इस पहल को विशुद्ध सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बताया, राजनीतिक कृत्य नहीं।
नेहरू-मोदी की तुलना से दिया जवाब
इस आयोजन पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए सुमन ने पूछा कि यदि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की जयंती को लंबे समय से 14 नवंबर को 'बाल दिवस' के रूप में मनाया जाता रहा है, तो वर्तमान प्रधानमंत्री का जन्मदिन 'दीपोत्सव' के जरिए मनाना विवाद का विषय क्यों बनाया जा रहा है। उनके अनुसार, यह तर्क दोहरे मानदंड को उजागर करता है।
दीये का सांस्कृतिक महत्व
सुमन ने कहा कि भारतीय संस्कृति में मिट्टी के दीये रोशनी, शुभता, ज्ञान और कल्याण के प्रतीक हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पिछले कुछ वर्षों में केक काटना और मोमबत्तियाँ बुझाना जन्मदिन का एक लोकप्रिय तरीका बन गया है। लेकिन उनका तर्क था कि आधुनिक तौर-तरीके अपनाने का अर्थ यह नहीं कि भारत की सांस्कृतिक जड़ों को छोड़ दिया जाए।
राजनीतिक कृत्य नहीं, सांस्कृतिक चेतना
मंत्री ने स्पष्ट किया कि मोमबत्तियाँ बुझाने के बजाय दीये जलाना किसी राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े रहने का प्रयास है। उन्होंने कहा, 'जन्मदिन रोशनी का जश्न होना चाहिए, अंधेरे का नहीं। दीये जलाए जाने चाहिए, शुभकामनाएं दी जानी चाहिए और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए आगे बढ़ना चाहिए।'
आयोजन का उद्देश्य
सुमन के अनुसार, यदि लोग अपने घरों, संस्थानों और सार्वजनिक स्थलों पर दीये जलाकर प्रधानमंत्री मोदी के अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और सफल जीवन की कामना करते हैं, तो इसे विवाद का विषय नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की सकारात्मक अभिव्यक्ति माना जाना चाहिए। उन्होंने इसी भावना को 'दीपोत्सव' का मूल उद्देश्य बताया।
आधुनिकता और परंपरा का संतुलन
यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब विपक्षी खेमों से यह सवाल उठाए जा रहे थे कि किसी सत्तारूढ़ नेता के जन्मदिन पर सरकार-समर्थित सांस्कृतिक आयोजन करना उचित है या नहीं। गौरतलब है कि 'दीपोत्सव' की अवधारणा पहले भी अयोध्या जैसे अवसरों पर बड़े पैमाने पर आयोजित की जा चुकी है, जहाँ यह आयोजन राज्य सरकारों का प्रमुख सांस्कृतिक उत्सव बन चुका है। सुमन का मानना है कि आधुनिकता और पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखकर ही भारत समग्र प्रगति कर सकता है।