क्या शब्दोत्सव 2026 में सिनेमा में हिंदू धर्म के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव की चर्चा हो रही है?
सारांश
Key Takeaways
- 70 के दशक से सिनेमा में बदलाव आया है।
- फिल्मों में हिंदू धर्म का मजाक उड़ाया जाता है।
- आज के हीरो की परिभाषा में परिवर्तन आया है।
- विलेन को अब आदर्श माना जा रहा है।
- संस्कारों की जगह गुंडागर्दी को प्राथमिकता दी जा रही है।
नई दिल्ली, 3 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। 'राजा हरिश्चंद्र' भारतीय सिनेमा की पहली मूक फिल्म मानी जाती है, जिसमें नायक सच्चा, मेहनती और संस्कारी था। हालांकि, आज की फिल्मों में अभिनेता और अभिनेत्रियों की परिभाषा में बड़ा परिवर्तन आ चुका है।
बॉलीवुड में हमेशा से हिंदू धर्म को हल्के में लिया गया है, जिसके कारण अक्सर फिल्मों को लेकर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। इस महत्वपूर्ण विषय पर दिल्ली के शब्दोत्सव में फिल्म फेस्टिवल क्यूरेटर प्रशांत कश्यप ने बताया कि ये परिवर्तन कब से शुरू हुआ।
शब्दोत्सव में सिनेमा और हिंदू धर्म पर बात करते हुए प्रशांत कश्यप ने कहा कि पहले फिल्में संस्कारों पर आधारित होती थीं, लेकिन अब समय का पहिया काफी बदल चुका है। उन्होंने यह भी बताया कि क्यों फिल्मों में हमेशा हिंदू धर्म और देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया जाता है।
प्रशांत ने आगे कहा कि पहले फिल्में भारतीय संस्कारों से प्रेरित होती थीं और हमारे ग्रंथों से किरदार बनाए जाते थे, जैसे कि 'राजा हरिश्चंद्र'। 70 के दशक के पूर्व फिल्मों के किरदार मर्यादा के दायरे में रहते थे, जो ईमानदार और सच्चे होते थे। 'राजा हरिश्चंद्र' में भी यही दिखाया गया है, लेकिन 70 के दशक ने सब कुछ बदल दिया।
उन्होंने कहा कि अभिनेत्रियों की प्रेरणा भी मां सीता से ली जाती थी, जो मुखर और मर्यादित थीं, लेकिन 70 के दशक के बाद नायक की परिभाषा बदल गई। अब नायक डॉन बन गए हैं। दर्शकों को यह बताया गया कि जो मर्यादा से दूर है, वही उनका नायक है, जो गुंडा होगा और मंदिर में जाकर भगवान से पूछेगा, 'आज तो तुम बहुत खुश होगे।' इस प्रकार धर्म और संस्कारों का मजाक बना दिया गया है।
वहीं, हिंदी सिनेमा में आए बदलाव पर बात करते हुए फिल्म निर्देशक अश्विन कुमार ने कहा कि आज की फिल्मों में विलेन को आदर्श माना जाने लगा है, जैसे 'धुरंधर' में अक्षय खन्ना। लोग अब फिल्म के हीरो की तुलना में विलेन को ज्यादा पसंद करने लगे हैं, जो समाज के लिए खतरा बनता जा रहा है।