शारदीय नवरात्र 2025: 11 अक्टूबर को घटस्थापना का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और सामग्री सूची
सारांश
मुख्य बातें
शारदीय नवरात्र का पावन पर्व 11 अक्टूबर, रविवार से आरंभ हो रहा है और इसी दिन घटस्थापना (कलश स्थापना) के साथ मां दुर्गा की नौ दिवसीय आराधना का शुभारंभ होगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विधि-विधान से की गई घटस्थापना घर में सकारात्मक ऊर्जा, सुख-समृद्धि और शांति का संचार करती है। इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं।
घटस्थापना का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, 11 अक्टूबर को घटस्थापना के लिए सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। इसके अतिरिक्त अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा, जो विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। जो भक्त प्रातःकाल पूजा न कर सकें, वे अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापित कर सकते हैं।
घटस्थापना के लिए आवश्यक सामग्री
घटस्थापना के लिए निम्नलिखित सामग्री एकत्र करना आवश्यक है — मिट्टी का चौड़े मुंह वाला पात्र, साफ मिट्टी, जौ, कलश, गंगाजल, शुद्ध जल, सिक्का, साबुत सुपारी, अक्षत (साबुत चावल), दूर्वा, रोली, कलावा तथा आम या अशोक के पाँच या सात पत्ते। इसके साथ पानी वाला नारियल, लाल कपड़ा या चुनरी, फूल, फल, पान, इलायची, लौंग, घी का दीपक, मिठाई और बताशे भी पूजा में अनिवार्य माने जाते हैं।
घटस्थापना की पूजा विधि
नवरात्र के प्रथम दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करके एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएँ और उस पर मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगाजल से स्थान का शुद्धिकरण करें और माता रानी को फूल, चुनरी तथा शृंगार सामग्री अर्पित करें।
अब मिट्टी के पात्र में साफ मिट्टी भरकर जौ बोएँ और ऊपर से हल्की मिट्टी की परत डालकर थोड़ा जल छिड़कें। इस पात्र को पूजा स्थल पर रखें और नौ दिनों तक नियमित रूप से जौ में जल देते रहें ताकि अंकुर निकल सकें।
इसके बाद कलश पर कलावा बाँधें और उसमें गंगाजल, साफ पानी, साबुत सुपारी, सिक्का, अक्षत और हल्दी की गाँठ डालें। कलश के मुख पर आम या अशोक के पाँच या सात पत्ते रखकर ऊपर नारियल स्थापित करें। अंत में कलश को जौ वाले पात्र के निकट रखें, घी का दीपक प्रज्वलित करें और धूप, फूल, फल तथा मिठाई अर्पित करके मां दुर्गा के मंत्रों का जाप एवं आरती करें।
जौ बोने का धार्मिक महत्त्व
धार्मिक मान्यताओं में जौ को समृद्धि, अच्छी फसल और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। यह विश्वास प्रचलित है कि नवरात्र में जौ का भली प्रकार अंकुरित होना शुभ संकेत देता है और घर में खुशहाली का आगमन सूचित करता है। यह परंपरा कृषि-आधारित भारतीय संस्कृति की जड़ों से गहराई से जुड़ी है।
नवरात्र का आगे का क्रम
घटस्थापना के पश्चात् नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों — शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री — की क्रमशः पूजा की जाएगी। विजयादशमी (दशहरा) के साथ इस पर्व का समापन होगा, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव है।