शशि थरूर का दावा: केरल में एनडीए की कोई विश्वसनीयता नहीं है
सारांश
Key Takeaways
- एनडीए की केरल में कोई विश्वसनीयता नहीं है।
- शशि थरूर ने भाजपा को 'जीरो-सीट वाली पार्टी' कहा।
- उन्हें महिला आरक्षण बिल पर कांग्रेस का समर्थन है।
- उच्च वोटिंग प्रतिशत को लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत माना।
- राज्य में तीन-तरफा मुकाबला हो रहा है।
नई दिल्ली, 9 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। केरल में मतदान के दौरान कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की केरल में कोई विश्वसनीयता नहीं है। उन्होंने भाजपा को 'जीरो-सीट वाली पार्टी' करार दिया।
गुरुवार को तिरुवनंतपुरम में अपने मत डालने के बाद थरूर ने राष्ट्र प्रेस से बात की और कहा, "एनडीए केरल में कोई सीट जीतने में सफल नहीं हो पाएगी। सरकार बनाने के संदर्भ में इसकी कोई विश्वसनीयता नहीं है। 140 सीटों में से मुश्किल से दो सीटें हैं, जहां उन्हें एक मजबूत दावेदार माना जा सकता है।"
शशि थरूर ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) की चुनावी संभावनाओं पर टिप्पणी करते हुए कहा, "2011 में जब हमें सरकार चलाने का अवसर मिला, तो लोगों ने हमें बहुत कम बहुमत दिया। इस बार मुझे बेहतर नतीजों की उम्मीद है, ताकि हमारी सरकार के पास काम करने के लिए एक मजबूत आधार हो और वह सही मायने में कोई बड़ा बदलाव ला सके।"
उन्होंने राज्य में एनडीए की मौजूदगी को सिरे से खारिज करते हुए कहा, "मैं पूरे राज्य का दौरा कर चुका हूं। मुझे एनडीए की किसी भी तरह की मजबूत मौजूदगी के कोई खास संकेत नहीं मिले। यहां तीन-तरफा मुकाबला है, जहां यूडीएफ, एलडीएफ और एनडीए तीनों एक-दूसरे से टकरा रहे हैं। इसलिए मैं यह नहीं मान सकता कि एनडीए के पास कहीं भी जीतने का कोई मौका है।"
शशि थरूर ने प्रारंभिक वोटिंग पर संतोष व्यक्त किया और इसे लोकतंत्र के लिए एक अच्छा संकेत बताया। उन्होंने कहा, "मैं आज अपने बूथ पर वोट डालने आया हूं और मुझे यह देखकर खुशी हुई कि वोटिंग बहुत अच्छी हुई है। ऐसा लगता है कि यह ऐसा चुनाव है जिसमें केरल के वोटर बड़ी संख्या में बाहर आ रहे हैं और यह एक सकारात्मक संकेत है। इसका मतलब है कि केरल के लोग यह फैसला सिर्फ राजनीतिक कार्यकर्ताओं और पार्टी के लोगों पर नहीं छोड़ रहे हैं।"
इसके अलावा, कांग्रेस सांसद ने महिला आरक्षण बिल पर भी अपनी राय दी। उन्होंने कांग्रेस पार्टी के रुख को दोहराते हुए कहा, "इसकी शुरुआत हमने ही की थी। असल में सोनिया गांधी ही थीं, जिन्होंने यूपीए सरकार के दौरान पहला महिला आरक्षण बिल पेश किया था। इसलिए हम महिला आरक्षण के पक्ष में हैं, लेकिन सवाल यह है कि इसका तरीका क्या होगा? वे इसमें क्या बदलाव लाना चाहते हैं? हमने अभी तक बिल नहीं देखा है।"