क्या सोमनाथ स्वाभिमान पर्व सनातन की अटूट शक्ति का संदेश देगा?

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क्या सोमनाथ स्वाभिमान पर्व सनातन की अटूट शक्ति का संदेश देगा?

सारांश

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व, जो जनवरी 2026 में आयोजित होगा, एक ऐतिहासिक अवसर है जो भारतीय संस्कृति की गहराई को दर्शाएगा। यह आयोजन भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण क्षणों को पुनः जीवंत करेगा।

Key Takeaways

  • सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का आयोजन जनवरी 2026 में होगा।
  • यह पर्व भारत के धार्मिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
  • सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए कई वीरों ने बलिदान दिया।
  • इस आयोजन से युवाओं में भारतीय संस्कृति की समझ बढ़ेगी।
  • सोमनाथ मंदिर का इतिहास पुनर्निर्माण और आस्था की गाथा है।

सोमनाथ, 5 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त होने जा रहा है। जनवरी 2026 में, सोमनाथ मंदिर पर हुए विदेशी हमले को 1,000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस ऐतिहासिक अवसर पर भारत सरकार द्वारा सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का आयोजन किया जा रहा है। इस पहल का स्थानीय ब्राह्मण समुदाय, तीर्थ पुरोहितों और देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं ने खुले दिल से स्वागत किया है।

सोमनाथ मंदिर के तीर्थ पुरोहितों और सोमपुरा ब्राह्मण समुदाय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस पहल की प्रशंसा की है। उनका कहना है कि एक हजार साल पहले सोमनाथ की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीरों को स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपने गौरवशाली इतिहास से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है। पुरोहितों के अनुसार, इस कार्यक्रम से युवाओं में भारतीय संस्कृति, परंपरा और सनातन धर्म की समझ गहरी होगी।

सोमनाथ मंदिर का इतिहास केवल एक मंदिर का इतिहास नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म की अटूट शक्ति और निरंतर पुनर्जन्म की कहानी है। इतिहास गवाह है कि कई बार यवन आक्रमणकारियों ने इस पवित्र स्थल को नष्ट करने का प्रयास किया, लेकिन हर बार यह मंदिर पहले से अधिक भव्य रूप में खड़ा हुआ। यही कारण है कि आज भी सोमनाथ मंदिर दुनिया भर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।

स्कंद पुराण के अनुसार, प्रभास क्षेत्र का विशेष महत्व है। यह क्षेत्र उत्तर में 126 किलोमीटर, पूर्व में तुलसीश्याम तक 111 किलोमीटर, पश्चिम में माधवपुर और दक्षिण में समुद्र के दक्षिणी ध्रुव तक फैला हुआ माना जाता है। मान्यता है कि यही वह भूमि है जहां भगवान श्रीकृष्ण 56 करोड़ यदुवंशियों के साथ आए थे और यहीं देहोत्सर्ग किया था। दक्षिण दिशा को पितृलोक से जोड़े जाने के कारण इस स्थान को 'मोक्षस्थल' भी कहा जाता है।

भारत की आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प देश के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने लिया था। वर्ष 1947 में उन्होंने समुद्र का जल हाथ में लेकर यह प्रण किया कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण किया जाएगा। जनता के सहयोग और जन-धन से बना यह भव्य मंदिर आज लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। स्थानीय लोग गर्व से कहते हैं, "सोमनाथ दादा के दर पर जो रोता हुआ आता है, वह मुस्कुराता हुआ जाता है।"

श्रद्धालुओं का कहना है कि जब-जब सोमनाथ मंदिर पर संकट आया, तब किसी एक जाति या समुदाय ने नहीं, बल्कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, सभी ने मिलकर रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इन वीरों ने इतिहास में नाम दर्ज कराने के लिए नहीं, बल्कि केवल धर्म और आस्था की रक्षा के लिए बलिदान दिया। यही सोमनाथ की सबसे बड़ी शक्ति रही है।

इतिहासकारों और पुराणों के अनुसार, सोमनाथ मंदिर पर कई बार आक्रमण हुए। 6 जनवरी 1026 को मुहम्मद गजनवी द्वारा किए गए हमले को अंतिम बड़ा आक्रमण माना जाता है। इसके बाद छोटे-छोटे राजवाड़ों ने समय-समय पर मंदिर का पुनर्निर्माण किया, हालांकि वह फिर नष्ट हुआ। इतिहास में मूलराज सोलंकी और भीमदेव सोलंकी जैसे राजाओं के योगदान को विशेष रूप से याद किया जाता है। लगभग 135 वर्ष पहले महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने भी सोमनाथ में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था।

सोमपुरा ब्राह्मण पुरोहित जयवर्धन जानी ने राष्ट्र प्रेस से बताया कि अलग-अलग इतिहासकारों और पुराणों में सोमनाथ पर हमलों की संख्या अलग-अलग बताई गई है। कहीं 7 बार, कहीं 11 बार और कहीं 17 बार

उन्होंने कहा कि मंदिर कभी लकड़ी से, कभी पत्थर से और कभी विभिन्न धातुओं से बनाया गया। मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण, राजा भीमदेव और यहां तक कि भगवान श्रीराम के योगदान का भी उल्लेख मिलता है। उनका कहना है कि इन सभी कथाओं का सार यही है कि सनातन धर्म की शक्ति इतनी प्रबल है कि 2026 में भी सोमनाथ मंदिर पूरी भव्यता के साथ खड़ा है।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि एक हजार साल बाद शहीदों को श्रद्धांजलि देने का कार्यक्रम आयोजित कर उन्होंने इतिहास को जीवंत कर दिया है।

वहीं, सोमपुरा ब्राह्मण पुरोहित कमलेशभाई पाठक ने बताया कि प्राचीन काल में मंदिर के पास इतनी संपत्ति थी कि उसकी कीमत अरबों में आंकी जाती थी और इसकी प्रसिद्धि भारत से बाहर पूरी दुनिया में फैली हुई थी। आक्रमणकारियों ने मंदिर को लूटा, लेकिन हर बार इसका पुनर्निर्माण हुआ। सरदार पटेल की सनातन धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा के कारण ही आज हम इस भव्य सोमनाथ मंदिर के दर्शन कर पा रहे हैं।

Point of View

बल्कि यह नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण प्रयास भी है।
NationPress
07/01/2026

Frequently Asked Questions

सोमनाथ मंदिर का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
सोमनाथ मंदिर, जिसे हिन्दू धर्म का एक प्रमुख तीर्थ स्थल माना जाता है, का इतिहास आक्रमणों और पुनर्निर्माण की गाथा के रूप में जाना जाता है।
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व कब मनाया जाएगा?
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व जनवरी 2026 में मनाया जाएगा, जो सोमनाथ मंदिर पर हुए विदेशी हमले की 1,000वीं वर्षगांठ है।
इस पर्व का उद्देश्य क्या है?
इस पर्व का उद्देश्य श्रद्धालुओं को अपने गौरवशाली इतिहास से जोड़ना और भारतीय संस्कृति की गहराई को समझाना है।
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