12 अक्टूबर 2026
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सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने रवाना किया 'स्पेयर' अभियान, ₄,८५० किमी हिमालयी EV यात्रा शुरू

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सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने रवाना किया 'स्पेयर' अभियान, ₄,८५० किमी हिमालयी EV यात्रा शुरू

सारांश

भारतीय सेना ने ₄,८५० किमी के 'स्पेयर' EV अभियान की शुरुआत की — दिल्ली से माणा, नाथू ला-बुम ला पार करते हुए वालोंग तक। यह सिर्फ साहसिक यात्रा नहीं, बल्कि ऊँचाई वाले सीमावर्ती इलाकों में इलेक्ट्रिक वाहनों की व्यावहारिक परीक्षा है — जो सेना की भविष्य की रसद रणनीति को नई दिशा दे सकती है।

मुख्य बातें

सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने 12 अक्टूबर 2026 को मानेकशॉ केंद्र, दिल्ली छावनी से 'स्पेयर' EV अभियान को हरी झंडी दिखाई।
अभियान की कुल दूरी लगभग ₄,८५० किलोमीटर है — दिल्ली से माणा (उत्तराखंड) होते हुए पूर्वोत्तर तक।
मार्ग में नाथू ला और बुम ला जैसे ₄,५०० मीटर से अधिक ऊँचाई के दर्रे शामिल हैं।
अभियान का समापन 16 नवंबर 2026 को वालोंग युद्ध स्मारक , अंजॉ जिला, अरुणाचल प्रदेश पर होगा — वालोंग दिवस के अवसर पर।
उद्देश्य: चरम परिस्थितियों में EV की क्षमता, सहनशक्ति और व्यावहारिक उपयोगिता का आकलन; साथ ही वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि।

भारतीय सेना ने 12 अक्टूबर 2026 को एक ऐतिहासिक इलेक्ट्रिक वाहन अभियान की शुरुआत की, जिसे सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने दिल्ली छावनी स्थित मानेकशॉ केंद्र से हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। 'स्टैलियंस पैन-हिमालयन ईवी राइडर्स एक्सपीडिशन' (स्पेयर) नाम का यह दल हिमालय की दुर्गम चोटियों, गंगा के मैदानों और पूर्वोत्तर भारत की विविध भौगोलिक परिस्थितियों से गुज़रते हुए लगभग ₄,८५० किलोमीटर की यात्रा पूरी करेगा। यह अभियान सेना की हरित परिवहन के प्रति प्रतिबद्धता और इलेक्ट्रिक वाहनों की सैन्य उपयोगिता को परखने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

अभियान का मार्ग और प्रमुख पड़ाव

यात्रा की शुरुआत दिल्ली छावनी से हुई है। पहले चरण में सवार उत्तराखंड के माणा गाँव — जिसे भारत का अंतिम बसा हुआ गाँव माना जाता है — तक पहुँचेंगे। इसके बाद दल उत्तर प्रदेश के गंगा मैदानी क्षेत्र से होते हुए पूर्व दिशा की ओर बढ़ेगा और हिमालय के अत्यंत दुर्गम इलाकों में प्रवेश करेगा।

अभियान में नाथू ला और बुम ला जैसे ऊँचाई वाले दर्रों को पार करना शामिल है, जो समुद्र तल से ₄,५०० मीटर से अधिक की ऊँचाई पर स्थित हैं। इन स्थानों पर तीव्र ठंड, विरल वायुमंडल और कठिन चढ़ाई जैसी परिस्थितियाँ इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए वास्तविक परीक्षा बनेंगी।

अभियान का उद्देश्य और वैज्ञानिक महत्व

इस अभियान का प्राथमिक लक्ष्य यह आकलन करना है कि इलेक्ट्रिक वाहन अत्यधिक ऊँचाई, कम तापमान और पहाड़ी रास्तों पर कितने भरोसेमंद और व्यावहारिक साबित होते हैं। लंबी दूरी की यात्रा में उनकी बैटरी क्षमता, सहनशक्ति और संचालन-योग्यता की जाँच की जाएगी।

इसके लिए भारतीय सेना के परिचालन अनुभव को सहयोगी कंपनियों की तकनीकी विशेषज्ञता के साथ जोड़ा जाएगा। गौरतलब है कि यह पहल केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है — इससे दुर्गम सीमावर्ती क्षेत्रों में वैकल्पिक परिवहन की संभावनाओं का भी व्यावहारिक मूल्यांकन होगा, जो सेना की दीर्घकालिक रसद रणनीति के लिए महत्त्वपूर्ण है।

श्रद्धांजलि और राष्ट्रीय भावना

यह अभियान केवल तकनीकी परीक्षण नहीं है — इसमें देश की रक्षा में सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का भाव भी निहित है। अभियान का समापन 16 नवंबर 2026 को अरुणाचल प्रदेश के अंजॉ जिले में स्थित वालोंग युद्ध स्मारक पर होगा — यह तिथि वालोंग दिवस के साथ मेल खाती है, जो 1962 के युद्ध में वहाँ लड़े सैनिकों की स्मृति में मनाया जाता है।

सेना की हरित पहल और व्यापक संदर्भ

यह ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार रक्षा क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन घटाने और स्वदेशी तकनीक को प्रोत्साहित करने के लिए नीतिगत स्तर पर प्रयास कर रही है। भारतीय सेना पहले भी सौर ऊर्जा और जैव-ईंधन के प्रयोगों में अग्रणी रही है, लेकिन इतनी लंबी दूरी और ऊँचाई वाले क्षेत्र में EV का इस पैमाने पर परीक्षण पहली बार हो रहा है।

अभियान के निष्कर्ष भविष्य में सेना की वाहन-खरीद नीति और सीमावर्ती रसद व्यवस्था को नया आकार दे सकते हैं। यह पहल साहसिक गतिविधियों और तकनीकी नवाचार को राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ जोड़ने का एक अनूठा उदाहरण बन सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

८५० किलोमीटर की यह यात्रा एक तकनीकी प्रयोग है, लेकिन इसका असली महत्त्व इस सवाल में है — क्या इलेक्ट्रिक वाहन वाकई उन सीमावर्ती क्षेत्रों में काम कर सकते हैं जहाँ पारंपरिक ईंधन की आपूर्ति श्रृंखला पहले से ही जटिल है? नाथू ला और बुम ला जैसे दर्रों पर तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है, और बैटरी दक्षता ऐसे में तेज़ी से घटती है — यह कोई नियंत्रित प्रयोगशाला परीक्षण नहीं होगा। अगर अभियान के परिणाम सार्वजनिक और पारदर्शी रूप से साझा किए जाते हैं, तो यह सेना की खरीद नीति के लिए मूल्यवान डेटा बनेगा; लेकिन यदि यह महज एक प्रचार अभियान बनकर रह जाए बिना सत्यापन-योग्य तकनीकी निष्कर्षों के, तो रक्षा क्षेत्र में हरित परिवर्तन की वास्तविक गति पर सवाल बरकरार रहेंगे।
RashtraPress
12 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'स्पेयर' EV अभियान क्या है?
'स्टैलियंस पैन-हिमालयन ईवी राइडर्स एक्सपीडिशन' (स्पेयर) भारतीय सेना का एक इलेक्ट्रिक वाहन अभियान है जो दिल्ली से अरुणाचल प्रदेश के वालोंग तक लगभग ₄,८५० किलोमीटर की यात्रा करेगा। इसे 12 अक्टूबर 2026 को सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने रवाना किया।
इस अभियान का उद्देश्य क्या है?
अभियान का मुख्य उद्देश्य अत्यधिक ऊँचाई, कम तापमान और दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर इलेक्ट्रिक वाहनों की क्षमता, सहनशक्ति और व्यावहारिक उपयोगिता का आकलन करना है। साथ ही यह देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिकों को श्रद्धांजलि देने का माध्यम भी है।
अभियान किन क्षेत्रों से गुज़रेगा?
अभियान दिल्ली छावनी से शुरू होकर उत्तराखंड के माणा गाँव, उत्तर प्रदेश के गंगा मैदान, हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों — जिनमें नाथू ला और बुम ला दर्रे शामिल हैं — से होते हुए पूर्वोत्तर भारत तक जाएगा। समापन अरुणाचल प्रदेश के अंजॉ जिले में वालोंग युद्ध स्मारक पर होगा।
अभियान का समापन कब और कहाँ होगा?
अभियान का समापन 16 नवंबर 2026 को अरुणाचल प्रदेश के अंजॉ जिले में स्थित वालोंग युद्ध स्मारक पर होगा। यह तारीख वालोंग दिवस के साथ मेल खाती है, जो 1962 के युद्ध में वहाँ लड़े जवानों की स्मृति में मनाया जाता है।
यह अभियान सेना के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह पहल सेना को सीमावर्ती क्षेत्रों में EV की व्यावहारिक उपयोगिता का वास्तविक डेटा देगी, जो भविष्य की वाहन-खरीद नीति और रसद रणनीति को प्रभावित कर सकती है। यह रक्षा क्षेत्र में हरित और तकनीकी नवाचार की दिशा में एक बड़ा कदम है।
राष्ट्र प्रेस
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