सुप्रीम कोर्ट ने झूठे मुकदमों के बढ़ते मामलों पर केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया

Click to start listening
सुप्रीम कोर्ट ने झूठे मुकदमों के बढ़ते मामलों पर केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया

सारांश

सुप्रीम कोर्ट ने झूठे मुकदमों की बढ़ती संख्या पर केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया है। याचिका में आपराधिक न्याय प्रणाली में झूठी शिकायतों और मनगढ़ंत आरोपों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है।

Key Takeaways

  • सुप्रीम कोर्ट ने झूठे मुकदमों के खिलाफ कदम उठाया है।
  • झूठी शिकायतें और मनगढ़ंत आरोपों पर कार्रवाई की मांग की गई है।
  • याचिका में यूपी की आत्महत्या की घटना का जिक्र किया गया है।
  • जनता को झूठे मामलों से गंभीर नुकसान हो रहा है।
  • यह कानूनी प्रक्रिया को सुधारने का एक अवसर है।

नई दिल्ली, २४ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक जनहित याचिका (पीआईएल) के संदर्भ में नोटिस जारी किया है। इस याचिका में आपराधिक न्याय प्रणाली में झूठी शिकायतों, मनगढ़ंत आरोपों और झूठे सबूतों के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए उचित निर्देश देने की मांग की गई है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। इस मामले की अगली सुनवाई ११ मई को होने की उम्मीद है।

याचिका में यह कहा गया है कि वर्तमान कानूनी ढांचे के कारण पीड़ित व्यक्ति या विक्टिम को झूठी शिकायतों और मनगढ़ंत सबूतों के आधार पर कार्रवाई शुरू करने से रोकता है, जब तक कि उसे अदालत से पूर्व में मंजूरी न मिल जाए। इससे जवाबदेही में एक संरचनात्मक बाधा उत्पन्न होती है।

इसमें यह तर्क किया गया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), २०२३ की धारा २१५ और ३७९ की व्याख्या ने कई दंडात्मक प्रावधानों को निष्क्रिय कर दिया है, जिससे अपराधियों को पुलिस थानों में झूठी एफआईआर दर्ज कराने और अदालतों पर झूठे मामलों, झूठे आरोपों, झूठी जानकारियों, झूठे प्रमाणपत्रों, झूठे बयानों और झूठे सबूतों का बोझ डालने का अवसर मिल गया है।

याचिका में उल्लेखित किया गया है कि यूपी के फतेहपुर जिले में एक परिवार ने कथित तौर पर झूठे मामलों में फंसाए जाने की धमकियों के कारण आत्महत्या कर ली। याचिका में यह भी बताया गया है कि जनता को इससे गंभीर नुकसान हो रहा है, क्योंकि झूठे मामलों के कारण निर्दोष नागरिक आत्महत्या कर रहे हैं।

पीआईएल में यह भी कहा गया है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों में झूठी शिकायतों और झूठी गवाही के मामलों पर महत्वपूर्ण डेटा की कमी, इस समस्या से निपटने में एक प्रणालीगत कमी को उजागर करती है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, पुलिस थानों में झूठी एफआईआर का बढ़ता मामला और अदालतों पर बढ़ता कार्यभार यह दर्शाता है कि झूठे आरोप झेलने वाले लोगों को लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है, जिससे उनकी बदनामी होती है और उन्हें आर्थिक तथा मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि पीड़ित व्यक्ति को झूठे आरोपों के कारण होने वाली बदनामी, लंबी कानूनी लड़ाई और आर्थिक व मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जबकि उसे खुद शिकायतकर्ता के रूप में कार्रवाई करने का अवसर नहीं मिलता।

इस याचिका में बीएनएसएस की धारा २१५ और ३७९ की उद्देश्यपूर्ण और संगठित व्याख्या की मांग की गई है, ताकि पीड़ितों को अदालत की अनुमति से झूठी जानकारी, झूठे सबूत और झूठी गवाही से संबंधित अपराधों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने में सहायता मिल सके।

याचिका में यह भी कहा गया है कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और बीएनएसएस का उद्देश्य मौजूदा कानूनी स्थिति के कारण कमजोर हो रहा है।

यह बताते हुए कि आपराधिक कानून का दुरुपयोग मौलिक अधिकारों के लिए खतरा है, याचिका में सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया गया है कि वह कानूनी प्रक्रियाओं के दुरुपयोग को रोकने और निर्दोष नागरिकों को दुर्भावनापूर्ण मुकदमों से बचाने के लिए हस्तक्षेप करे।

Point of View

NationPress
26/03/2026

Frequently Asked Questions

सुप्रीम कोर्ट ने किस मुद्दे पर नोटिस जारी किया?
सुप्रीम कोर्ट ने झूठे मुकदमों की बढ़ती संख्या पर केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया है।
याचिका में क्या मांग की गई है?
याचिका में आपराधिक न्याय प्रणाली में झूठी शिकायतों और मनगढ़ंत आरोपों के खिलाफ निर्देश देने की मांग की गई है।
इस मामले की अगली सुनवाई कब होगी?
इस मामले की अगली सुनवाई ११ मई को होने की उम्मीद है।
याचिका में किस घटना का जिक्र किया गया है?
याचिका में यूपी के फतेहपुर जिले में एक परिवार के आत्महत्या करने की घटना का उल्लेख किया गया है।
क्या झूठे मुकदमों का दुरुपयोग मौलिक अधिकारों के लिए खतरा है?
हां, याचिका में कहा गया है कि आपराधिक कानून का दुरुपयोग मौलिक अधिकारों के लिए खतरा है।
Nation Press