क्या उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज होना सही है?

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क्या उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज होना सही है?

सारांश

दिल्ली दंगों के आरोपियों उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज होने से पीड़ित परिवारों में राहत की लहर। जानें इस फैसले पर उनका क्या कहना है और क्यों इसे न्याय के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं।

Key Takeaways

  • जमानत याचिकाएं खारिज होना पीड़ितों के लिए राहत का कारण है।
  • दंगों में मारे गए लोगों के परिवारों का संतोष स्पष्ट है।
  • भड़काऊ भाषणों पर नियंत्रण की आवश्यकता।
  • जमानत मिलने से सुरक्षा पर खतरा हो सकता था।
  • कड़ी सजा का समर्थन।

नई दिल्ली, 5 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। दिल्ली दंगों में शामिल उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जाने पर दंगा पीड़ित परिवारों ने संतोष और राहत का अनुभव किया है। दंगे में अपनी जान गंवाने वाले राहुल सोलंकी के पिता हरि सोलंकी ने इस निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वे अदालत के फैसले के लिए आभारी हैं, क्योंकि ऐसे आरोपियों को जमानत मिलना न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि सभी पीड़ितों के लिए एक बड़ा अन्याय होगा।

उन्होंने कहा कि जमानत मिलने की स्थिति में पीड़ित परिवारों की सुरक्षा को गंभीर खतरा हो सकता था।

हरि सोलंकी ने कहा कि दंगों के दौरान आम जनता को इस बात का अंदाजा नहीं था कि हिंसा की तैयारी पहले से ही की गई थी और यह पूरी तरह से एक साजिश के तहत अंजाम दी गई थी।

उन्‍होंने कहा कि इस हिंसा में शामिल सभी लोग दोषी हैं और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने तो यहां तक कहा कि ऐसे अपराधियों को फांसी की सजा दी जानी चाहिए। भड़काऊ भाषणों के मामले में उन्होंने कहा कि उन्हें किसी विशेष नेता का नाम तो नहीं पता, लेकिन इस तरह के भाषण समाज को आग में झोंकने का काम करते हैं और इन्हें रोकना चाहिए।

हरि सोलंकी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भरोसा जताते हुए कहा कि अगर अपराधियों को जमानत दी जाती है तो यह न्याय की भावना के खिलाफ होगा। हरि सोलंकी ने भावुक होते हुए कहा कि जिसने अपना जवान बेटा या भाई खोया है, वही जान सकता है कि उसके दिल पर क्या गुजरती है।

उन्होंने बताया कि इस दंगे में उनका जवान बेटा मारा गया। साथ ही, उन्होंने एक और पीड़ा साझा की कि वर्ष 2019 से अब तक उनके भाई की विधवा की ज़मीन पर भू-माफियाओं ने कब्जा कर लिया है। यह ज़मीन अनुसूचित जाति की होने के बावजूद अवैध तरीके से खरीदी गई और प्रशासन ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

वहीं, दिल्ली दंगों में मारे गए दिनेश के भाई सुरेश ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अगर ऐसे लोगों को जमानत मिलती, तो भविष्य में फिर से दंगे भड़कने का खतरा रहता।

उनके अनुसार, जमानत मिलने से न केवल साजिशें दोबारा रची जा सकती हैं, बल्कि निर्दोष लोगों की जान भी फिर से खतरे में पड़ सकती है। ऐसे आरोपियों को जमानत नहीं मिलनी चाहिए और अगर उन्हें मौत की सजा नहीं दी जा सकती, तो कम से कम उम्रकैद की सजा तो जरूर दी जानी चाहिए।

Point of View

यह एक संवेदनशील विषय है, और सभी पक्षों को सुनना आवश्यक है।
NationPress
06/01/2026

Frequently Asked Questions

उमर खालिद और शरजील इमाम कौन हैं?
उमर खालिद और शरजील इमाम दिल्ली दंगों के आरोपियों में शामिल हैं, जिनकी जमानत याचिकाएं हाल ही में खारिज हुईं।
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत क्यों खारिज की?
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत खारिज करने का निर्णय पीड़ितों की सुरक्षा और न्याय की भावना को ध्यान में रखते हुए लिया।
इस फैसले का पीड़ित परिवारों पर क्या असर है?
इस फैसले से पीड़ित परिवारों में संतोष और राहत का माहौल बना है, क्योंकि जमानत मिलने से उनकी सुरक्षा को खतरा हो सकता था।
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