वीर संभाजी महाराज: स्वराज्य के रक्षक और छत्रपति शिवाजी की धरोहर
सारांश
Key Takeaways
- संभाजी महाराज का जन्म 14 मई 1657 को हुआ।
- उन्होंने मुगलों और पुर्तगालियों के खिलाफ संघर्ष किया।
- उन्हें 'स्वराज्य रक्षक' का खिताब मिला।
- उनकी पुण्यतिथि 11 मार्च को होती है।
- वे संस्कृत के विद्वान थे और कई रचनाएं कीं।
नई दिल्ली, 10 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। जब भी हम भारतीय इतिहास की किताबों में नज़र डालेंगे, वीरता, संघर्ष और स्वराज्य के प्रतीक संभाजी महाराज का नाम गर्व के साथ लिया जाएगा। उनका नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया है।
छत्रपति संभाजी महाराज, जो मराठा इतिहास के एक महान योद्धा, कुशल शासक और स्वराज्य के सच्चे रक्षक थे, छत्रपति शिवाजी महाराज के ज्येष्ठ पुत्र थे। उन्होंने पिता द्वारा स्थापित हिंदवी स्वराज्य की विरासत को न केवल संभाला, बल्कि उसे और भी मजबूती प्रदान की। अपने शासनकाल में, संभाजी महाराज ने मुगलों और पुर्तगालियों जैसे शत्रुओं के साथ डटकर मुकाबला किया, जिसके चलते उन्हें 'स्वराज्य रक्षक' की उपाधि प्राप्त हुई।
'स्वराज्य रक्षक' की पुण्यतिथि 11 मार्च को मनाई जाती है। सन् 1689 में, औरंगजेब की क्रूर यातनाओं के बावजूद, संभाजी महाराज ने धर्म और स्वराज्य के लिए अपना बलिदान दिया। उनका जन्म 14 मई 1657 को पुरंदर किले (वर्तमान पुणे) में हुआ था। उनकी मां साईबाई, शिवाजी की पहली पत्नी थीं। मात्र दो वर्ष की उम्र में मां का निधन हो गया और दादी जीजाबाई ने उनका पालन-पोषण किया। बचपन से ही वे वीर और बुद्धिमान थे।
शिवाजी एंड हिज टाइम्स में इतिहासकार जदुनाथ सरकार लिखते हैं कि शिवाजी की पहली पत्नी से 14 मई 1657 को संभाजी का जन्म हुआ। उनकी दूसरी पत्नी सोयराबाई थीं, जिनसे छोटे बेटे राजा राम का जन्म 24 फरवरी 1670 को हुआ। आगे चलकर इन्हीं दोनों बेटों के कारण मराठा साम्राज्य में विभाजन हुआ।
शिवाजी महाराज के निधन (1680) के बाद सिंहासन के लिए संघर्ष प्रारंभ हुआ। शिवाजी की दूसरी पत्नी सोयराबाई अपने पुत्र राजाराम को सिंहासन पर बैठाना चाहती थीं। नौ महीने के संघर्ष के बाद, हम्बीरराव मोहिते जैसे सेनापतियों के सहयोग से 1681 में संभाजी का राज्याभिषेक हुआ और वे छत्रपति बने।
अपने शासनकाल में, संभाजी ने योग्य प्रशासकों को नियुक्त किया, आठ मंत्रियों की परिषद को सुदृढ़ किया और मजबूत कानूनी व्यवस्था स्थापित की। उन्होंने सुशासन पर जोर दिया और मराठी भाषा, कला, साहित्य तथा वास्तुकला को बढ़ावा दिया।
जानकारी के अनुसार, वह स्वयं संस्कृत के विद्वान थे और 'बुधभूषण', 'नायिकाभेद', 'सतशतक' जैसी रचनाएं कीं। उनके शासन का अधिकांश समय युद्धों में व्यतीत हुआ। 1682 से 1688 तक, उन्होंने औरंगजेब की विशाल सेना के खिलाफ कई मोर्चों पर लड़ा। गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाते हुए, जिसमें अचानक हमला करना और तेजी से पीछे हटना शामिल था।
1687 में वाई का युद्ध हुआ, जिसमें सेनापति हम्बीरराव मोहिते की मृत्यु हो गई, जिससे मराठा का मनोबल प्रभावित हुआ। दिसंबर 1687 के बाद स्थिति बिगड़ने लगी। 1 फरवरी 1689 को संगमेश्वर में शिरके कबीले के सदस्यों के धोखे से मुगल सेनापति मुकर्रब खान ने उन्हें बंदी बना लिया। उन्हें औरंगजेब के पास ले जाया गया, जिसने कई दिनों तक उन्हें क्रूर यातनाएं दीं, लेकिन वे नहीं झुके।
11 मार्च 1689 को तुलापुर (भीमा नदी तट, पुणे के पास) में उनका सिर कलम कर दिया गया। कई स्रोतों के अनुसार, उन्होंने यातनाओं के दौरान भी 'हर हर महादेव' और 'जय भवानी' का जयकारा लगाया था।