13 सितंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

भारत की स्पेस इकोनॉमी 2033 तक ₹4.22 लाख करोड़ पहुँचने का अनुमान: EY-CII रिपोर्ट

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
भारत की स्पेस इकोनॉमी 2033 तक ₹4.22 लाख करोड़ पहुँचने का अनुमान: EY-CII रिपोर्ट

सारांश

EY और CII की संयुक्त रिपोर्ट का अनुमान है कि भारत की स्पेस इकोनॉमी 2033 तक ₹4.22 लाख करोड़ तक पहुँच सकती है। नीतिगत सुधार, IN-SPACe और NSIL की भूमिका तथा निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी इस बदलाव की धुरी हैं — लेकिन लक्ष्य हासिल करने के लिए अगले 7-8 साल अहम होंगे।

मुख्य बातें

EY-CII की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार भारत की स्पेस इकोनॉमी 2033 तक ₹4.22 लाख करोड़ (44 अरब डॉलर) तक पहुँच सकती है।
भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 , IN-SPACe और NSIL ने सरकारी-केंद्रित व्यवस्था को उद्योग-संचालित इकोसिस्टम में बदलने की नींव रखी है।
रिपोर्ट में स्पेस सेक्टर के विस्तार के लिए छह प्रमुख प्राथमिकता क्षेत्रों की पहचान की गई है, जिसमें घरेलू मैन्युफैक्चरिंग, लॉन्च क्षमता और रक्षा अनुप्रयोग शामिल हैं।
डाउनस्ट्रीम एप्लिकेशंस कृषि, लॉजिस्टिक्स, आपदा प्रबंधन और रक्षा क्षमताओं को सशक्त कर रहे हैं।
लक्ष्य हासिल करने के लिए अगले 7-8 वर्षों में सरकार, उद्योग, स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों के समन्वित प्रयास आवश्यक बताए गए हैं।

भारत की स्पेस इकोनॉमी वर्ष 2033 तक ₹4.22 लाख करोड़ (लगभग 44 अरब डॉलर) के स्तर पर पहुँच सकती है — यह अनुमान EY (अर्न्स्ट एंड यंग) और भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) की एक संयुक्त रिपोर्ट में सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार, नीतिगत सुधारों, निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी और अंतरिक्ष-आधारित सेवाओं की माँग में वृद्धि इस छलांग के प्रमुख चालक हैं। यह अनुमान ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक अंतरिक्ष बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी तेज़ी से बढ़ाने की कोशिश में है।

नीतिगत बदलाव की नींव

भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023, भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) के माध्यम से किए गए सुधारों और न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) की सक्रिय भूमिका ने सरकार-केंद्रित अंतरिक्ष कार्यक्रम को एक उद्योग-संचालित इकोसिस्टम में बदलने की दिशा में ठोस आधार तैयार किया है। रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि इस परिवर्तन ने निजी स्टार्टअप्स और विदेशी निवेशकों के लिए नए अवसर खोले हैं।

गौरतलब है कि बीते कुछ वर्षों में भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप्स ने सैकड़ों करोड़ रुपये का निजी निवेश आकर्षित किया है — एक बदलाव जो पहले की सरकारी एकाधिकार वाली व्यवस्था में संभव नहीं था।

छह प्राथमिकता क्षेत्र

रिपोर्ट में स्पेस सेक्टर को गति देने के लिए छह प्रमुख कार्रवाई क्षेत्रों की पहचान की गई है:

पहला, विभिन्न क्षेत्रों में अंतरिक्ष-आधारित एप्लिकेशन के उपयोग को विस्तार देना। दूसरा, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और लॉन्च क्षमता को सुदृढ़ करना। तीसरा, नियामकीय और वित्तीय माहौल में सुधार। चौथा, व्यावसायिक उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारी माँग का लाभ उठाना। पाँचवाँ, रक्षा और रणनीतिक अंतरिक्ष क्षमताओं को मज़बूत करना। और छठा, भारत को वैश्विक स्पेस पार्टनर तथा स्पेस एक्सपोर्ट हब के रूप में स्थापित करना।

वैल्यू चेन: अपस्ट्रीम से डाउनस्ट्रीम तक

रिपोर्ट में पूरी स्पेस वैल्यू चेन का विश्लेषण किया गया है। अपस्ट्रीम गतिविधियों में सैटेलाइट मैन्युफैक्चरिंग, लॉन्च व्हीकल, प्रोपल्शन सिस्टम और एवियोनिक्स शामिल हैं। मिडस्ट्रीम में ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर और सैटेलाइट ऑपरेशंस आते हैं। वहीं, डाउनस्ट्रीम एप्लिकेशंस में अर्थ ऑब्जर्वेशन, सैटेलाइट कम्युनिकेशन, नेविगेशन सेवाएँ और जियोस्पेशियल एनालिटिक्स शामिल हैं।

डाउनस्ट्रीम एप्लिकेशन कृषि, लॉजिस्टिक्स, आपदा प्रबंधन, इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग, जलवायु परिवर्तन से निपटने और शासन-व्यवस्था को बेहतर बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सुरक्षित संचार और समुद्री निगरानी के ज़रिये ये एप्लिकेशन भारत की रक्षा क्षमताओं को भी सशक्त कर रहे हैं।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

CII नेशनल कमेटी ऑन स्पेस के अध्यक्ष मल्लावरपु अप्पाराव ने कहा कि भारत का स्पेस सेक्टर अब केवल वैज्ञानिक खोज के कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सैटेलाइट-आधारित सेवाओं और एप्लिकेशंस से संचालित एक 'इनोवेशन-ड्रिवन इकोनॉमी' बन चुका है।

EY इंडिया में एयरोस्पेस, डिफेंस एंड स्पेस के पार्टनर सीडीआर गौतम नंदा ने कहा कि विकास के अगले चरण के लिए औद्योगिक क्षमता बढ़ाना, तकनीकों का व्यावसायीकरण, सप्लाई चेन को मज़बूत करना और सैटेलाइट डेटा को व्यावसायिक, सार्वजनिक एवं रणनीतिक क्षेत्रों के लिए उपयोगी सेवाओं में परिवर्तित करना निर्णायक होगा।

क्या होगा आगे

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि इस अनुमानित वृद्धि को वास्तविकता में बदलने के लिए अगले 7-8 वर्षों में सरकारी एजेंसियों, उद्योग, स्टार्टअप्स, निवेशकों, अकादमिक संस्थानों और रणनीतिक उपयोगकर्ताओं को समन्वित प्रयास करने होंगे। साथ ही, सैटेलाइट डेटा का व्यापक उपयोग, उन्नत डेटा एनालिटिक्स क्षमता, कुशल मानव संसाधन और परस्पर जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म को बढ़ावा देना अनिवार्य होगा। यदि ये स्तंभ मज़बूत रहे, तो भारत 2030 के दशक में वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन भारत के स्पेस सेक्टर की असली परीक्षा नीतियों की घोषणा से नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन की गति से तय होगी। IN-SPACe और NSIL के ज़रिये निजी भागीदारी का रास्ता तो खुला है, मगर वैश्विक प्रतिस्पर्धियों — विशेषकर SpaceX और चीन के CASC — की तुलना में भारत की लॉन्च क्षमता और सैटेलाइट उत्पादन अभी भी सीमित है। रिपोर्ट में 'छह प्राथमिकता क्षेत्र' तो चिह्नित किए गए हैं, लेकिन इनके लिए ठोस निवेश रोडमैप और स्वतंत्र मापन तंत्र के बिना ये लक्ष्य महज़ आकाशीय संख्याएँ बनकर रह सकते हैं।
RashtraPress
13 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत की स्पेस इकोनॉमी 2033 तक कितनी बड़ी हो सकती है?
EY और CII की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार भारत की स्पेस इकोनॉमी 2033 तक ₹4.22 लाख करोड़ (44 अरब डॉलर) तक पहुँच सकती है। नीतिगत सुधार, निजी क्षेत्र की भागीदारी और अंतरिक्ष-आधारित सेवाओं की बढ़ती माँग इस वृद्धि के मुख्य आधार हैं।
IN-SPACe और NSIL की भूमिका क्या है?
IN-SPACe (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र) निजी कंपनियों को अंतरिक्ष गतिविधियों की अनुमति और सुविधा देता है, जबकि NSIL (न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड) सरकारी अंतरिक्ष संपत्तियों का व्यावसायीकरण करती है। इन दोनों संस्थाओं ने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को सरकारी नेतृत्व से उद्योग-केंद्रित इकोसिस्टम की ओर ले जाने में अहम भूमिका निभाई है।
भारतीय स्पेस सेक्टर में कौन-से छह प्राथमिकता क्षेत्र चिह्नित किए गए हैं?
रिपोर्ट में छह प्रमुख क्षेत्रों की पहचान की गई है: अंतरिक्ष-आधारित एप्लिकेशंस का विस्तार, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और लॉन्च क्षमता को मज़बूत करना, नियामकीय व वित्तीय माहौल में सुधार, सरकारी माँग का व्यावसायिक उपयोग, रक्षा और रणनीतिक क्षमताओं का विस्तार, और भारत को वैश्विक स्पेस एक्सपोर्ट हब के रूप में स्थापित करना।
स्पेस इकोनॉमी का आम जीवन पर क्या असर पड़ता है?
डाउनस्ट्रीम स्पेस एप्लिकेशंस कृषि, लॉजिस्टिक्स, आपदा प्रबंधन, इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग और जलवायु प्रबंधन में तेज़ी से मदद कर रहे हैं। इसके साथ ही सुरक्षित संचार और समुद्री निगरानी के ज़रिये ये देश की रक्षा क्षमताओं को भी सुदृढ़ कर रहे हैं।
2033 का लक्ष्य हासिल करने के लिए क्या करना होगा?
रिपोर्ट के अनुसार, अगले 7-8 वर्षों में सरकारी एजेंसियों, उद्योग, स्टार्टअप्स, निवेशकों, अकादमिक संस्थानों और रणनीतिक उपयोगकर्ताओं को मिलकर काम करना होगा। सैटेलाइट डेटा का व्यापक उपयोग, उन्नत डेटा एनालिटिक्स, कुशल प्रतिभाएँ और परस्पर जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म इसके लिए अनिवार्य बताए गए हैं।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 सप्ताह पहले
  2. 3 सप्ताह पहले
  3. 1 महीना पहले
  4. 1 महीना पहले
  5. 3 महीने पहले
  6. 4 महीने पहले
  7. 9 महीने पहले
  8. 11 महीने पहले