विक्रम-1 की सफलता से भारत का प्राइवेट स्पेस सेक्टर मज़बूत, 2030 तक वैश्विक हिस्सेदारी 8% करने का लक्ष्य
सारांश
मुख्य बातें
भारत के पहले निजी क्षेत्र में विकसित ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 की कक्षा तक सफल पहुँच ने देश के अंतरिक्ष उद्योग में एक नए युग की शुरुआत की है। एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, यह उपलब्धि सरकारी एकाधिकार से हटकर 'मल्टी-एक्टर स्पेस इकोसिस्टम' की दिशा में भारत के निर्णायक कदम का प्रमाण है। नीति-निर्माता 2021 में वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की लगभग 2 प्रतिशत हिस्सेदारी को 2030 तक 8 प्रतिशत और 2047 तक 15 प्रतिशत तक ले जाने की योजना पर काम कर रहे हैं।
विक्रम-1 की ऐतिहासिक भूमिका
इंडिया नैरेटिव की रिपोर्ट में कहा गया है कि विक्रम-1 उस कहानी को आगे बढ़ाता है जो चंद्रयान-3 की चंद्र-लैंडिंग और आदित्य-एल1 के सौर मिशन से शुरू हुई थी। रिपोर्ट के शब्दों में, "भारत अब सिर्फ इसरो का कम लागत वाला विस्तार नहीं रह गया है, बल्कि एक ऐसा देश बन गया है जो कई तरह के खिलाड़ियों वाला स्पेस इकोसिस्टम तैयार कर रहा है — जिसके पास अपने रॉकेट, सैटेलाइट और भविष्य में क्रू मिशन तथा स्पेस स्टेशन भी होंगे।"
इन-स्पेस और सुधारों की भूमिका
रिपोर्ट के अनुसार, 2020 के आसपास शुरू हुए नीतिगत सुधारों और इन-स्पेस (IN-SPACe) के गठन ने इस मिशन की सफलता में निर्णायक योगदान दिया। इन-स्पेस ने हैदराबाद स्थित स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस को अपना हार्डवेयर परीक्षण करने और श्रीहरिकोटा में इसरो की लॉन्च रेंज से उड़ान भरने में मदद की। इन-स्पेस प्राइवेट लॉन्चर निर्माताओं, सैटेलाइट बनाने वालों और डाउनस्ट्रीम सेवा प्रदाताओं को एक समन्वित राष्ट्रीय इकोसिस्टम से जोड़ता है।
उन्नत तकनीक का प्रदर्शन
स्काईरूट एयरोस्पेस ने विक्रम-1 मिशन में कई अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग किया — इनमें ऑल-कार्बन कम्पोजिट मोटर केसिंग, हाई-परफॉर्मेंस सॉलिड मोटर्स और 3डी-प्रिंटेड प्रोपल्शन कंपोनेंट्स शामिल हैं। रिपोर्ट में उल्लेख है कि हाल तक ये तकनीकें केवल इसरो और विश्व की चुनिंदा बड़ी एयरोस्पेस कंपनियों तक ही सीमित थीं।
अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों का भरोसा
विक्रम-1 के पेलोड में भारत की ग्रहा स्पेस, कॉस्मोसर्व, जर्मनी की डीक्यूबेड और स्वयं स्काईरूट के तकनीकी प्रदर्शन पेलोड शामिल थे। रिपोर्ट में इसे भारतीय प्राइवेट लॉन्च क्षमता की विश्वसनीयता का प्रमाण बताया गया है — ये ऐसे ग्राहक थे जिनके पास दुनिया में कहीं भी जाने का विकल्प मौजूद था।
स्टार्टअप उछाल और निवेश
नीतिगत सुधारों के परिणामस्वरूप भारत में स्पेस स्टार्टअप्स की संख्या 2022 में मात्र एक से बढ़कर 2024 तक लगभग 200 हो गई। रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र ने 2023 के केवल आठ महीनों में लगभग ₹1,000 करोड़ का निवेश आकर्षित किया — यह आँकड़ा इस क्षेत्र में निवेशकों के बढ़ते विश्वास को दर्शाता है। विक्रम-1 की सफलता यह संकेत देती है कि भारत के पास वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने के लिए ज़रूरी औद्योगिक आधार वास्तव में तैयार हो रहा है।