क्या सिजोफ्रेनिया और अवसाद हृदय रोग और असमय मृत्यु का खतरा बढ़ाते हैं?

सारांश
Key Takeaways
- सिजोफ्रेनिया से हृदय रोग का खतरा 100% तक बढ़ सकता है।
- अवसाद हृदय रोग के जोखिम को 72% तक बढ़ाता है।
- मानसिक बीमारियों का उपचार हृदय स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक है।
- 40% हृदय रोगियों को मानसिक बीमारियों का सामना करना पड़ता है।
- संयुक्त उपचार से रोगियों की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।
नई दिल्ली, 29 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। एक नई रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि मानसिक बीमारियाँ जैसे सिजोफ्रेनिया और अवसाद दिल की बीमारियों (हृदय रोग) तथा असमय मृत्यु के खतरे को अत्यधिक बढ़ा सकती हैं।
यह रिपोर्ट द लैंसेट रीजनल हेल्थ-यूरोप नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई है। इसमें अवसाद, चिंता, सिजोफ्रेनिया, बाइपोलर डिसऑर्डर और पीटीएसडी जैसी बीमारियों से ग्रस्त लोगों में हृदय संबंधी समस्याओं का विश्लेषण किया गया है।
एमरी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने बताया कि सिजोफ्रेनिया से हृदय रोग का खतरा लगभग 100% तक बढ़ जाता है। अवसाद के परिणामस्वरूप यह वृद्धि लगभग 72% होती है। पीटीएसडी से 57% प्रतिशत, बाइपोलर डिसऑर्डर से 61% प्रतिशत, पैनिक डिसऑर्डर से 50% प्रतिशत और फोबिक एंग्जायटी से करीब 70% प्रतिशत तक खतरा बढ़ता है।
शोध में यह भी दर्शाया गया है कि यदि किसी को पहले से हृदय रोग है और साथ में गंभीर अवसाद भी है, तो उसकी मृत्यु का खतरा दोगुने से ज्यादा बढ़ जाता है। अर्थात्, मानसिक बीमारी और हृदय रोग का एक साथ होना स्थिति को और गंभीर बना देता है।
इस रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि मानसिक स्वास्थ्य और हृदय स्वास्थ्य के बीच में एक गहरा संबंध है। उदाहरण के लिए, हृदय रोग वाले 40% लोग मानसिक बीमारियों से भी जूझते हैं। मानसिक बीमारियों से ग्रस्त लोगों को अक्सर सही इलाज और नियमित देखभाल नहीं मिल पाती।
कई बार आर्थिक समस्याएँ, अस्पताल तक पहुँचने में कठिनाई या जानकारी की कमी (हेल्थ लिटरेसी) बड़ी बाधा बनती हैं। इन कारणों से मरीज समय पर अपनी जांच और इलाज नहीं करवा पाते।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल हृदय रोग या केवल मानसिक बीमारी का उपचार पर्याप्त नहीं है। दोनों का एक संयुक्त उपचार आवश्यक है। इसके लिए डॉक्टर, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, नर्सिंग स्टाफ और सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक टीम मिलकर मरीज की देखभाल करें।
एमरी यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर वियोला वैकारिनो ने कहा, “दिल और दिमाग का स्वास्थ्य आपस में गहराई से जुड़ा हुआ है। इसलिए हमें ऐसी स्वास्थ्य प्रणाली की आवश्यकता है जो दोनों समस्याओं का एक साथ समाधान कर सके। इन रोगियों की देखभाल के लिए एक नैदानिक टीम आदर्श होगी जो बहु-विषयक देखभाल और संसाधन प्रदान करने के लिए मिलकर काम करती है।”
यदि इस प्रकार का संयुक्त उपचार और बेहतर स्वास्थ्य प्रणाली विकसित की जाए तो मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोग भी स्वस्थ जीवन जी सकेंगे, हृदय रोग का खतरा कम होगा और वे समाज में पूरी तरह सक्रिय रह पाएंगे।