एशियन पैरा गेम्स 2026: निरंजन मुकुंदन ने 200 मीटर इंडिविजुअल मेडले SM7 में जीता कांस्य पदक
सारांश
मुख्य बातें
पैरा तैराक निरंजन मुकुंदन ने 20 अक्टूबर 2026 को नागोया में जारी एशियन पैरा गेम्स 2026 में पुरुषों की SM7 वर्ग की 200 मीटर व्यक्तिगत मेडले स्पर्धा में कांस्य पदक हासिल कर भारत के पदक खाते में एक और नाम जोड़ा। मुकुंदन ने 2 मिनट 57.01 सेकंड का समय निकालते हुए फाइनल में तीसरा स्थान सुनिश्चित किया।
स्पर्धा का पूर्ण परिणाम
इस फाइनल में स्वर्ण पदक चीन के यिलॉन्ग झांग ने 2:37.69 के गेम्स रिकॉर्ड समय के साथ अपने नाम किया। रजत पदक फिलीपींस के अर्नी गाविलन ने 2:52.72 के समय के साथ जीता। फाइनल में शामिल भारत के एकमात्र अन्य प्रतिभागी सुयश नारायण जाधव 3:03.40 का समय निकालकर पाँचवें स्थान पर रहे।
निरंजन मुकुंदन: एक असाधारण करियर
बेंगलुरु में जन्मे निरंजन मुकुंदन भारत के सबसे सम्मानित पैरा तैराकों में गिने जाते हैं। उनके नाम 107 से अधिक अंतरराष्ट्रीय पदक दर्ज हैं और वे किसी भी भारतीय पैरा तैराक द्वारा बनाए गए सर्वाधिक एशियन रिकॉर्ड के धारक हैं — दो लॉन्ग-कोर्स और पाँच शॉर्ट-कोर्स रिकॉर्ड। इनमें 200 मीटर बैकस्ट्रोक (आईडीएम बर्लिन 2018), 800 मीटर फ्रीस्टाइल (प्राग 2022), और 1500 मीटर फ्रीस्टाइल में नॉर्वे के बर्गन स्विम फेस्टिवल 2023 में 16 साल पुराने एशियन रिकॉर्ड को तोड़ना शामिल है।
उन्होंने टोक्यो 2020 पैरालंपिक गेम्स में पुरुषों की 50 मीटर बटरफ्लाई (S7) स्पर्धा में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। 2015 के IWAS जूनियर वर्ल्ड गेम्स में उन्होंने 10 पदक (सात स्वर्ण, तीन रजत) जीतकर जूनियर वर्ल्ड चैंपियन का खिताब हासिल किया था। इसके बाद 2016 के IWAS अंडर-23 वर्ल्ड गेम्स में उन्होंने 8 पदक अपने नाम किए।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके उल्लेखनीय प्रदर्शनों में 2014 इंचियोन एशियन पैरा गेम्स में 4×100 मीटर मेडले रिले का कांस्य पदक, 2023 बर्लिन वर्ल्ड सीरीज में 6 पदक, और नॉर्वे के 2024 बर्गन स्विम फेस्टिवल में 7 पदक शामिल हैं।
संघर्ष से प्रेरणा तक: मुकुंदन की कहानी
मुकुंदन 'स्पाइना बिफिडा' (रीढ़ की हड्डी का अधूरा विकास) और 'क्लबड फीट' (पैरों की जन्मजात विकृति) के साथ पैदा हुए थे। पाँच साल की उम्र तक उनकी कमर से नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त था और अब तक उनकी 19 सुधारात्मक सर्जरी हो चुकी हैं।
2003 में पैर की एक बड़ी सर्जरी के बाद डॉक्टरों ने उनके माता-पिता को घुड़सवारी या एक्वा थेरेपी की सलाह दी। मुकुंदन ने तैराकी का रास्ता चुना और बेंगलुरु के जयनगर में कोच जॉन क्रिस्टोफर की देखरेख में प्रशिक्षण शुरू किया। सिर्फ तीन महीनों के भीतर वे पुनर्वास तैराकी से प्रतिस्पर्धी पैरा-तैराकी की ओर आ गए — यह बदलाव भारतीय पैरा खेलों के इतिहास में एक प्रेरणादायक अध्याय बन गया।
भारत के पैरा खेलों के लिए महत्व
यह पदक ऐसे समय में आया है जब भारत एशियन पैरा गेम्स में अपनी उपस्थिति लगातार मज़बूत कर रहा है। गौरतलब है कि मुकुंदन जैसे एथलीट न केवल पदक तालिका में योगदान करते हैं, बल्कि पैरा खेलों के प्रति देश की सोच को भी बदलते हैं। आने वाले दिनों में भारतीय दल से और पदकों की उम्मीद है।