एशियन पैरा गेम्स 2026: हिमांशु नंदल ने नागोया में जीते 3 कांस्य पदक, 100 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक बताई सबसे कठिन रेस
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय पैरा-तैराक हिमांशु नंदल ने एशियन पैरा गेम्स 2026 में जापान के आइची-नागोया में कांस्य पदकों की हैट्रिक लगाकर इतिहास रच दिया। 22 वर्षीय इस दृष्टिहीन तैराक ने पुरुषों की 400 मीटर फ्रीस्टाइल एस11, 100 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक एस11 और 100 मीटर फ्रीस्टाइल एस11 — तीनों स्पर्धाओं में कांस्य पदक हासिल किए। यह उपलब्धि इसलिए और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इन खेलों की शुरुआत उनके लिए एक गहरी निराशा के साथ हुई थी।
बैकस्ट्रोक की निराशा से शुरू हुई कहानी
पुरुषों की 100 मीटर बैकस्ट्रोक स्पर्धा में चौथे स्थान पर रहने के बाद नंदल को गहरा धक्का लगा। यह इवेंट उनके मुख्य इवेंट्स में से एक था और वह पिछले दो वर्षों से इसके लिए तैयारी कर रहे थे। उन्होंने बताया, 'उस दिन मेरा शरीर जैसे साथ ही नहीं दे रहा था। सब कुछ ठीक से नहीं हो पाया, मैं अपना पर्सनल बेस्ट नहीं दे सका और उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा।'
हालांकि अभियान में अभी भी पाँच इवेंट बाकी थे। नंदल ने अगले दिन मानसिक रूप से खुद को संभाला और आगे के इवेंट्स पर ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा, 'मन में कहीं न कहीं वह निराशा बनी रही, लेकिन मैंने अगले इवेंट्स के लिए और ज़्यादा मेहनत की।'
तीन पदकों का सफर
नंदल ने मंगलवार को 400 मीटर फ्रीस्टाइल में 5 मिनट 10.91 सेकंड के समय के साथ पहला कांस्य पदक जीता। इसके बाद 100 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक में दूसरा कांस्य पदक आया। तीसरा और आखिरी पदक शुक्रवार को 100 मीटर फ्रीस्टाइल में 1 मिनट 5.90 सेकंड के समय के साथ तीसरे स्थान पर रहते हुए मिला।
इस अंतिम रेस में जापान के उचु टोमिता ने 58.22 सेकंड के गेम्स-रिकॉर्ड समय के साथ स्वर्ण पदक जीता, जबकि चीन के चुआनझेन सन ने 58.70 सेकंड के समय के साथ रजत पदक हासिल किया।
ब्रेस्टस्ट्रोक — सबसे यादगार रेस
अपने तीनों पोडियम फिनिश को याद करते हुए नंदल ने बताया कि 100 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक सबसे कठिन और यादगार रेस रही। उन्होंने कहा, 'मेरे हिसाब से सबसे बेहतरीन और चुनौतीपूर्ण रेस 100 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक थी, क्योंकि ब्रॉन्ज और चौथे स्थान के बीच का अंतर बहुत कम था — बस कुछ माइक्रो सेकंड का, मानो बाल-बाल का फासला हो।'
गौरतलब है कि 400 मीटर फ्रीस्टाइल को भी वह कम चुनौतीपूर्ण नहीं मानते, क्योंकि वह पहले दिन की निराशा से उबरते हुए इसमें उतरे थे।
जूडो से तैराकी तक का सफर
नंदल की यात्रा असाधारण रही है। हरियाणा के रोहतक में जन्मे नंदल ऑप्टिक नर्व फेल होने के कारण जन्म से ही दृष्टिहीन हैं। उनके पिता राष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी रहे हैं। चार वर्ष की आयु में वह दिल्ली आए और नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड से जुड़े। शुरुआत में उन्होंने जूडो में राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीते, लेकिन 2021 में तैराकी की ओर मुड़ गए।
इस बदलाव के दौरान उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिनमें पानी से होने वाली एलर्जी भी शामिल थी। 2024 में वह पेरिस पैरालंपिक के लिए मिनिमम क्वालिफिकेशन स्टैंडर्ड हासिल करने वाले पहले भारतीय दृष्टिहीन तैराक बने। इसके बाद उन्होंने सिंगापुर में आयोजित 2025 वर्ल्ड पैरा स्विमिंग चैंपियनशिप में दो फाइनल तक का सफर तय किया।
ट्रेनिंग और भविष्य की योजना
एस11 क्लासिफिकेशन में प्रतिस्पर्धा करने वाले नंदल की ट्रेनिंग अन्य तैराकों जैसी ही होती है। फर्क केवल यह है कि पूल के दोनों छोर पर दो 'टैपर' खड़े होते हैं, जो उन्हें दीवार के करीब आने का संकेत देते हैं। नंदल ने बताया, 'हम हर तीसरे या चौथे स्ट्रोक के बाद लेन की लाइनों को छूते हुए चलते हैं — बस यही मुख्य अंतर है।'
दिल्ली विश्वविद्यालय के आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातक नंदल अब स्पोर्ट्स मैनेजमेंट में उच्च शिक्षा लेने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने कहा, 'मेरा अगला बड़ा लक्ष्य अपने ही पर्सनल बेस्ट को पीछे छोड़ना है — अगर मैं लगातार इसे बेहतर करता रहूँगा, तो गोल्ड मेडल के और करीब पहुँच जाऊँगा।'