क्या बुला चौधरी ने 'भारतीय जलपरी' का खिताब पाने के लिए समुद्री जल से एलर्जी के बावजूद इंग्लिश चैनल पार किया?
सारांश
Key Takeaways
- बुला चौधरी की उपलब्धियाँ भारतीय तैराकी के लिए प्रेरणा हैं।
- समुद्री पानी से एलर्जी के बावजूद उन्होंने इंग्लिश चैनल पार किया।
- उनका संघर्ष महिलाओं के लिए एक उदाहरण है।
- तैराकी में उनके योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले हैं।
- वर्तमान में वे युवाओं को तैराकी सिखा रही हैं।
नई दिल्ली, 1 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत में तैराकी को एक पारंपरिक कला के रूप में माना जाता है, जिसका उल्लेख हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी किया गया है। आज के समय में, यह एक खेल के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुका है, जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सबसे उत्कृष्ट माना जाता है। तैराकी में भारत की वर्तमान स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकासशील अवस्था में है, और भारतीय महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है।
भारतीय लड़कियों को तैराकी में आगे बढ़ने का प्रेरणा देने वाली प्रमुख महिला तैराकों में से एक हैं बुला चौधरी।
बुला चौधरी का जन्म 2 जनवरी, 1970 को हुगली, पश्चिम बंगाल में हुआ। महज दो साल की उम्र में उन्होंने तैराकी की शुरुआत की, जब उनके पिता उन्हें पहली बार हुगली नदी के किनारे ले गए। पांच साल की उम्र में उन्हें एक स्विमिंग अकादमी में दाखिला दिलवाया गया। नौ साल की उम्र में, उन्होंने भागीरथी नदी पार कर सबसे कम उम्र की तैराक बनने का गौरव हासिल किया। 1979 में, उन्होंने अपनी पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता में छह स्वर्ण पदक जीते।
1984 में, बुला ने 100 मीटर बटरफ्लाई में राष्ट्रीय रिकॉर्ड स्थापित किया। 1986 में सियोल में हुए एशियन गेम्स में, बुला ने 100 मीटर और 200 मीटर बटरफ्लाई में रिकॉर्ड तोड़े। 1989 में, 19 साल की उम्र में, वह इंग्लिश चैनल (इंग्लैंड से फ्रांस) पार करने वाली पहली एशियाई महिला बनीं, जिसे उन्होंने लगभग 10-11 घंटे में पूरा किया। उन्होंने 1999 में इस उपलब्धि को दोबारा हासिल किया। 1991 में, श्रीलंका में आयोजित दक्षिण एशियाई खेल में उन्होंने 50 मीटर, 100 मीटर फ्रीस्टाइल और 100 मीटर, 200 मीटर बटरफ्लाई में स्वर्ण पदक जीते।
बुला चौधरी ने 1996 में 81 किलोमीटर की मुर्शिदाबाद लॉन्ग डिस्टेंस स्विम जीती। उन्होंने स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर (2000), टायरहेनियन सी (2001), कैटालिना चैनल (2002), टोरोनियोस गल्फ (2002), कुक स्ट्रेट (2003), पाल्क स्ट्रेट (2004, श्रीलंका से भारत तक लगभग 14 घंटे में) और केप टाउन के पास एक चैनल (2005) पार किया। 2005 में, वह पांच महाद्वीपों के समुद्री चैनलों को तैरकर पार करने वाली दुनिया की पहली महिला बनीं, जिससे उन्हें 'सात समुद्र' जीतने का नाम मिला।
हालांकि बुला चौधरी को समुद्री पानी से एलर्जी थी। डॉक्टरों ने कई बार उन्हें तैराकी छोड़ने की सलाह दी, लेकिन उनकी दृढ़ संकल्प ने उन्हें आगे बढ़ने से नहीं रोका। समुद्री पानी से एलर्जी के बावजूद उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें 'समुद्रों की रानी' और 'भारतीय जलपरी' के नाम से भी जाना जाता है।
तैराकी में उनके योगदान के लिए उन्हें 1990 में अर्जुन पुरस्कार, 2002 में तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार और 2009 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। तैराकी से संन्यास के बाद, उन्होंने राजनीति में भी कदम रखा और वर्तमान में युवाओं को तैराकी की कला सिखा रही हैं। बुला चौधरी की यात्रा तैराकी में करियर बनाने वाले युवाओं के लिए प्रेरणादायक है।