ओलंपिक मेडलिस्ट गुरबख्श सिंह ग्रेवाल नहीं रहे, हॉकी इंडिया ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि
सारांश
Key Takeaways
- गुरबख्श सिंह ग्रेवाल का 84 वर्ष की आयु में निधन हो गया, वे 1968 मेक्सिको सिटी ओलंपिक के ब्रॉन्ज मेडल विजेता भारतीय हॉकी टीम के सदस्य थे।
- हॉकी इंडिया के अध्यक्ष दिलीप टिर्की और महासचिव भोला नाथ सिंह ने गहरा शोक व्यक्त किया।
- 1968 के ओलंपिक में उन्होंने अपने भाई बलबीर सिंह ग्रेवाल के साथ खेला — यह भारतीय हॉकी इतिहास में पहली बार था जब दो सगे भाई एक साथ ओलंपिक में उतरे।
- उनका जन्म 1 अप्रैल 1942 को लायलपुर (अब पाकिस्तान) में हुआ था और वे करियर के लिए मुंबई आए थे।
- वेस्टर्न रेलवे में स्पोर्ट्स ऑफिसर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी वे मुंबई हॉकी एसोसिएशन के मानद सचिव के रूप में सक्रिय रहे।
- उनकी विरासत एक खिलाड़ी, कोच और प्रशासक तीनों रूपों में भारतीय हॉकी को समृद्ध करती रही।
नई दिल्ली, 25 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय हॉकी के गौरवशाली इतिहास का एक अध्याय बंद हो गया — 1968 मेक्सिको सिटी ओलंपिक में भारत को ब्रॉन्ज मेडल दिलाने वाली टीम के सदस्य गुरबख्श सिंह ग्रेवाल का 84 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके जाने से भारतीय हॉकी जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। हॉकी इंडिया ने शनिवार को उनके निधन पर गहरी संवेदनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।
एक युग का अंत — ओलंपिक पदक विजेता का निधन
गुरबख्श सिंह ग्रेवाल का जन्म 1 अप्रैल 1942 को ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के लायलपुर (अब पाकिस्तान में स्थित फैसलाबाद) में हुआ था। लगभग 20 वर्ष की आयु में करियर संवारने के लिए उन्होंने मुंबई का रुख किया और वेस्टर्न रेलवे की टीम का प्रतिनिधित्व किया।
उनकी तेज-तर्रार फॉरवर्ड खेल शैली ने राष्ट्रीय चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा और उन्हें 1968 के मेक्सिको सिटी ओलंपिक में जगह मिली, जहां भारत ने ब्रॉन्ज मेडल जीता।
भारतीय हॉकी इतिहास का अनूठा अध्याय — दो भाई, एक ओलंपिक
1968 के ओलंपिक में गुरबख्श सिंह ग्रेवाल अपने सगे भाई बलबीर सिंह ग्रेवाल के साथ भारतीय दल का हिस्सा थे। यह भारतीय हॉकी के इतिहास में पहली बार था जब दो सगे भाइयों ने एक ही ओलंपिक खेलों में एक साथ देश का प्रतिनिधित्व किया।
यह वह दौर था जब भारतीय हॉकी विश्व पटल पर अपना दबदबा बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही थी। 1964 के टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक के बाद 1968 में कांस्य पर संतोष करना पड़ा, लेकिन उस टीम के हर सदस्य ने देश का मान ऊंचा रखा।
हॉकी इंडिया के अध्यक्ष और महासचिव ने जताया शोक
हॉकी इंडिया के अध्यक्ष दिलीप टिर्की ने कहा, गुरबख्श सिंह ग्रेवाल जी भारत की ओलंपिक पदक विजेता टीम के सम्मानित सदस्य और खेल के सच्चे सेवक थे, जिनका योगदान मैदान तक ही सीमित नहीं था बल्कि उससे कहीं आगे तक फैला हुआ था।
हॉकी इंडिया के महासचिव भोला नाथ सिंह ने कहा कि एक खिलाड़ी और प्रशासक के तौर पर गुरबख्श सिंह ग्रेवाल जी ने भारतीय हॉकी पर एक गहरा और स्थायी प्रभाव छोड़ा है तथा उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
खिलाड़ी से प्रशासक तक — एक समृद्ध विरासत
सक्रिय खेल जीवन से संन्यास लेने के बाद गुरबख्श सिंह ग्रेवाल ने वेस्टर्न रेलवे में स्पोर्ट्स ऑफिसर के पद पर सेवाएं दीं। रिटायरमेंट के बाद भी उन्होंने हॉकी से नाता नहीं तोड़ा और मुंबई की कई टीमों को वर्षों तक कोचिंग दी।
इसके अलावा उन्होंने मुंबई हॉकी एसोसिएशन के मानद सचिव के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका यह समर्पण दर्शाता है कि वे केवल एक खिलाड़ी नहीं बल्कि हॉकी के एक निस्वार्थ सेवक थे।
भारतीय हॉकी और ओलंपिक परंपरा का ऐतिहासिक संदर्भ
गौरतलब है कि 2020 टोक्यो ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम ने 41 साल बाद कांस्य पदक जीतकर नई पीढ़ी को प्रेरित किया। ऐसे में ग्रेवाल जैसे दिग्गजों की विरासत और भी प्रासंगिक हो जाती है जिन्होंने उस परंपरा की नींव रखी थी।
उनके जाने से उस स्वर्णिम पीढ़ी का एक और स्तंभ हमसे दूर हो गया। हॉकी इंडिया और भारतीय खेल जगत उनके परिवार के साथ इस दुख की घड़ी में खड़ा है और आने वाले समय में उनकी स्मृति में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाने की संभावना है।