क्या जयपाल सिंह मुंडा का ओलंपिक में भारत की कप्तानी से संसद तक आदिवासियों की लड़ाई का सफर अद्वितीय है?

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क्या जयपाल सिंह मुंडा का ओलंपिक में भारत की कप्तानी से संसद तक आदिवासियों की लड़ाई का सफर अद्वितीय है?

सारांश

जयपाल सिंह मुंडा, भारतीय हॉकी के दिग्गज, ने ओलंपिक में भारत की कप्तानी की और आदिवासियों के अधिकारों के लिए राजनीतिक लड़ाई लड़ी। क्या उनका सफर प्रेरणादायक है?

Key Takeaways

  • जयपाल सिंह मुंडा ने भारतीय हॉकी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • वे 1928 के ओलंपिक में भारत के कप्तान रहे।
  • आदिवासियों के अधिकारों के लिए उनकी राजनीतिक लड़ाई महत्वपूर्ण रही।
  • उन्होंने झारखंड पार्टी के माध्यम से आदिवासियों की आवाज उठाई।
  • उनकी यात्रा प्रेरणादायक और संघर्ष से भरी रही।

नई दिल्ली, 2 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय हॉकी का इतिहास स्वर्णिम रहा है। इस इतिहास के महत्वपूर्ण चेहरों में से एक हैं जयपाल सिंह मुंडा। उन्होंने भारतीय हॉकी का प्रतिनिधित्व करते हुए ओलंपिक में टीम की कप्तानी की। एक सफल खिलाड़ी के रूप में अपनी पहचान बनाने के बाद, उन्होंने राजनीति में कदम रखा और आदिवासियों के अधिकारों के लिए एक महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ी।

जयपाल सिंह मुंडा का जन्म 3 जनवरी 1903 को रांची में हुआ। उन्हें प्रमोद पाहन के नाम से भी जाना जाता है। बचपन से ही हॉकी के प्रति उनकी रुचि थी, और अपनी प्रतिभा के बल पर वे भारतीय टीम में शामिल हुए। 1928 में एम्सटर्डम में हुए ओलंपिक में, वे भारतीय टीम के कप्तान बने, जहाँ उनकी कप्तानी में टीम ने 17 लीग मैचों में से 16 में जीत हासिल की। हालांकि, एक विवाद के कारण वे नॉकआउट मैचों में नहीं खेल पाए। अंततः भारत ने फाइनल में हालैंड को हराकर स्वर्ण पदक जीता।

1929 में, उन्होंने अपनी टीम बनाई और विभिन्न प्रतियोगिताओं में उसका नेतृत्व किया। अर्थशास्त्र में स्नातक होने के बाद, वे भारतीय सिविल सेवा के लिए भी चयनित हुए, लेकिन बाद में उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया। 1934 में, घाना के गोल्ड कोस्ट में प्रिंस ऑफ वेल्स कॉलेज में शिक्षक बने। 1937 में, वे रायपुर के राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल के रूप में भारत लौट आए।

1938 में, मुंडा ने पटना और रांची का दौरा किया, जहाँ उन्होंने आदिवासी लोगों की स्थिति को देखकर राजनीति में प्रवेश करने का निर्णय लिया। सक्रिय राजनीति में आने के बाद, उन्होंने आदिवासियों के अधिकारों के लिए एक मजबूत आवाज उठाई।

वे 1939 में आदिवासी महासभा के अध्यक्ष बने और 1946 में भारत की संविधान सभा में चुने गए। छोटानागपुर के आदिवासी उन्हें “मरांग गोमके” (संथाली में महान नेता) के नाम से जानते हैं। स्वतंत्रता के बाद, उनकी आदिवासी महासभा 1949-50 में झारखंड पार्टी के रूप में पुनर्जीवित हुई। उन्होंने झारखंड पार्टी के उम्मीदवार के रूप में रांची से स्वतंत्र भारत का पहला आम चुनाव लड़ा और जीत प्राप्त की।

1952 में, झारखंड पार्टी राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बनी। 1955 में, उन्होंने एक ज्ञापन प्रस्तुत किया जिसमें अलग झारखंड राज्य के निर्माण की मांग की गई। लेकिन क्षेत्र की भाषाई विविधता और जनसंख्या के अल्पसंख्यक स्थिति के कारण प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया गया।

झारखंड पार्टी का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया और 1963 में पार्टी का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय हो गया। उसी वर्ष, वे कांग्रेस पार्टी के टिकट पर लोकसभा में चुने गए और 1970 में अपनी मृत्यु तक संसद सदस्य बने। जयपाल सिंह मुंडा का निधन 20 मार्च 1970 को 67 वर्ष की आयु में नई दिल्ली में हुआ।

Point of View

बल्कि यह हमें सामाजिक न्याय और अधिकारों की लड़ाई में नेतृत्व के महत्व को भी दर्शाती है। उनकी कहानी हम सभी के लिए प्रेरणा है।
NationPress
02/01/2026

Frequently Asked Questions

जयपाल सिंह मुंडा का जन्म कब हुआ था?
उनका जन्म 3 जनवरी 1903 को रांची में हुआ था।
उन्होंने कब ओलंपिक में कप्तानी की?
उन्होंने 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक में भारतीय टीम की कप्तानी की।
जयपाल सिंह मुंडा ने किसके लिए लड़ाई लड़ी?
उन्होंने आदिवासियों के अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी।
वे किन पदों पर रहे?
वे आदिवासी महासभा के अध्यक्ष और भारत की संविधान सभा के सदस्य रहे।
उनका निधन कब हुआ?
उनका निधन 20 मार्च 1970 को हुआ।
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