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क्या पॉकेट डायनेमो खाशाबा दादासाहेब जाधव स्वतंत्र भारत के पहले व्यक्तिगत ओलंपिक पदक विजेता हैं?

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क्या पॉकेट डायनेमो खाशाबा दादासाहेब जाधव स्वतंत्र भारत के पहले व्यक्तिगत ओलंपिक पदक विजेता हैं?

सारांश

खाशाबा दादासाहेब जाधव, जिन्हें 'पॉकेट डायनेमो' कहा जाता है, ने स्वतंत्र भारत के पहले व्यक्तिगत ओलंपिक पदक को जीता। उनका सफर एक छोटे से गांव से लेकर अंतरराष्ट्रीय कुश्ती तक पहुंचने का है। आइए जानते हैं उनकी प्रेरणादायक कहानी और संघर्ष के बारे में।

मुख्य बातें

खाशाबा दादासाहेब जाधव का जीवन संघर्ष और सफलता की कहानी है।
उन्हें 'पॉकेट डायनेमो' कहा जाता है।
1952 में उन्होंने स्वतंत्र भारत का पहला व्यक्तिगत ओलंपिक पदक जीता।
उनकी प्रेरणा से कई युवा पहलवान आगे बढ़े हैं।
उनकी उपलब्धियों को आज भी याद किया जाता है।

नई दिल्ली, 14 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत के महान कुश्ती खिलाड़ी खाशाबा दादासाहेब जाधव को विश्व में 'पॉकेट डायनेमो' के नाम से जाना जाता है। उन्होंने एक छोटे से गांव से निकलकर उस समय अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन किया, जब सुविधाएं बहुत कम थीं। संघर्ष, जज्बे और देशभक्ति की मिसाल खाशाबा जाधव की कहानी आज भी भारतीय खेलों में प्रेरणा का प्रतीक बनी हुई है।

15 जनवरी 1926 को महाराष्ट्र के सातारा जिले के कराड तालुका के गोलेस्वर गांव में एक साधारण दलित परिवार में जन्मे खाशाबा के पिता दादासाहेब जाधव खुद एक प्रसिद्ध पहलवान थे। बचपन से ही कुश्ती के अखाड़ों में पले-बढ़े खाशाबा ने पांच साल की उम्र से पारंपरिक भारतीय पहलवानी शुरू की। उनकी छोटी कद-काठी (करीब 5 फुट 5 इंच) और तेज फुटवर्क ने उन्हें अलग बना दिया, जिसके कारण उन्हें 'पॉकेट डायनेमो' कहना शुरू किया गया।

खाशाबा की कुश्ती यात्रा कॉलेज के दिनों में और तेज हुई। राजाराम कॉलेज, कोल्हापुर में जब वे स्पोर्ट्स टीम में शामिल होना चाहते थे, तो शिक्षक ने उनकी कमजोर कद-काठी देखकर मना कर दिया। लेकिन जिद्दी खाशाबा ने प्रिंसिपल से अनुमति ली और इंटर-कॉलेज प्रतियोगिता में बड़े-बड़े पहलवानों को हराकर सबको चौंका दिया। उन्होंने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कई बार कमाल दिखाया।

1948 में लंदन ओलंपिक में स्वतंत्र भारत की पहली भागीदारी में खाशाबा फ्लाईवेट कैटेगरी में छठे स्थान पर रहे। यह उपलब्धि तब बड़ी थी जब वे मिट्टी के अखाड़ों पर प्रशिक्षित थे, जबकि अंतरराष्ट्रीय कुश्ती मैट पर होती थी। इस हार से प्रेरित होकर उन्होंने अगले चार साल कड़ी मेहनत की, जिसमें रोज 300 पुश-अप्स और 1000 सिट-अप्स तक शामिल थे। वे बैंटमवेट (57 किलो से कम) कैटेगरी में शिफ्ट हुए।

1952 हेलसिंकी ओलंपिक में खाशाबा ने इतिहास रचा। 23 जुलाई 1952 को उन्होंने कनाडा, मैक्सिको और जर्मनी के पहलवानों को हराकर कांस्य पदक जीता। यह स्वतंत्र भारत का पहला व्यक्तिगत ओलंपिक पदक था (नॉर्मन प्रिचर्ड 1900 में औपनिवेशिक भारत के लिए रजत जीते थे)।

हेलसिंकी से लौटने पर गांव वालों ने 151 बैलों की गाड़ियों के जुलूस से उनका स्वागत किया। बाद में उन्होंने पुलिस विभाग में अपनी सेवाएं दी। 14 अगस्त 1984 को एक रोड एक्सीडेंट में उनकी मृत्यु हो गई। जीवनभर आर्थिक तंगी और उपेक्षा झेलने के बावजूद उन्होंने कई युवा पहलवानों को प्रेरित किया।

मरणोपरांत 2000 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड, 1993 में शिव छत्रपति पुरस्कार और अन्य सम्मान मिले। 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए दिल्ली में नया कुश्ती स्टेडियम उनके नाम पर रखा गया। 2023 में उनकी 97वीं जयंती पर गूगल डूडल ने उन्हें याद किया। उनकी जीवनी पर फिल्म 'खाशाबा' भी बन रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारतीय खेलों में संघर्ष और सफलता की मिसाल है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची मेहनत और दृढ़ संकल्प से किसी भी बाधा को पार किया जा सकता है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

खाशाबा दादासाहेब जाधव कौन हैं?
खाशाबा दादासाहेब जाधव एक प्रसिद्ध भारतीय कुश्ती खिलाड़ी हैं, जिन्हें 'पॉकेट डायनेमो' कहा जाता है।
खाशाबा जाधव ने कब ओलंपिक में कांस्य पदक जीता?
खाशाबा जाधव ने 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में कांस्य पदक जीता।
खाशाबा जाधव का जन्म कब हुआ?
खाशाबा जाधव का जन्म 15 जनवरी 1926 को हुआ था।
खाशाबा जाधव को कौन सा पुरस्कार मिला?
उन्हें मरणोपरांत अर्जुन अवॉर्ड , शिव छत्रपति पुरस्कार और अन्य सम्मान मिले।
खाशाबा जाधव की कहानी का महत्व क्या है?
उनकी कहानी संघर्ष और प्रेरणा का प्रतीक है, जो युवा खिलाड़ियों को प्रेरित करती है।
राष्ट्र प्रेस
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