जब साहिर के शब्दों ने मोहम्मद रफी के दिल को छुआ, 'बाबुल की दुआएं' गाते हुए फफक पड़े

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जब साहिर के शब्दों ने मोहम्मद रफी के दिल को छुआ, 'बाबुल की दुआएं' गाते हुए फफक पड़े

सारांश

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और साहिर लुधियानवी की जयंती पर चर्चा करते हुए, जानिए कैसे मोहम्मद रफी ने उनके गाने 'बाबुल की दुआएं' को गाते वक्त अपने आंसू नहीं रोक पाए। एक अनकही भावना जो संगीत में समाई है।

Key Takeaways

  • साहिर लुधियानवी की शायरी ने समाज की भावनाओं को व्यक्त किया।
  • मोहम्मद रफी की आवाज में गहराई और भावनाएं थीं।
  • 'बाबुल की दुआएं' गाना विदाई के पल का प्रतीक बन गया।
  • साहिर ने कई प्रकार के गीतों की रचना की।
  • संगीतकार रवि ने साहिर की प्रतिभा को सराहा।

मुंबई, 7 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस, जो हर साल 8 मार्च को मनाया जाता है, महिलाओं की उपलब्धियों और संघर्ष को सम्मानित करता है, वहीं इस दिन हिंदी सिनेमा के प्रख्यात शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी की जयंती भी होती है। साहिर ने अपनी लेखनी से समाज के दर्द, प्रेम, विद्रोह और मानवीय भावनाओं को अमर कर दिया। उनकी शायरी और गीत आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं। लेकिन सबसे दिल को छू लेने वाली घटना यह है कि उनके एक गीत को गाते समय महान गायक मोहम्मद रफी भी आंसू रोक न सके।

जन्म 8 मार्च 1921 को पंजाब के लुधियाना में, साहिर (जिनका असली नाम अब्दुल हई था) के शब्दों के जादू का जिक्र करते हुए संगीतकार रवि ने बताया कि 1968 में रिलीज फिल्म 'नील कमल' के गाने "बाबुल की दुआएं लेती जा" में साहिर के लिखे बोल इतने भावुक थे कि रिहर्सल के दौरान ही रफी साहब की आंखों में आंसू आ गए। उस समय, रफी को रोता देख रवि घबरा गए और उन्हें बाहर बुलाकर कारण पूछा। रफी ने बताया कि उनकी बेटी की हाल ही में सगाई हुई थी, जिससे वह भावनाओं को रोक नहीं सके और गाने की विदाई और पिता की दुआओं की भावना उनके अपने जीवन से जुड़ गई, जिससे उनका दिल भर आया।

विशेष बात यह है कि रिकॉर्डिंग में भी रफी की आवाज में थरथराहट और रोने का एहसास साफ सुनाई देता है। इस गाने की गहराई इतनी थी कि रफी ने इसे रिकॉर्ड करने के लिए शादी के समारोह को छोड़ दिया और पारिश्रमिक भी नहीं लिया। यह गाना नेशनल अवॉर्ड भी जीत चुका है और आज भी हर शादी में विदाई के पल में बजता है।

साहिर साहब की लेखनी बहुआयामी थी। वे भजन, कव्वाली, रोमांटिक और व्यंग्यात्मक गीत लिखते थे। 'नील कमल' में ही एक और मजेदार गाना था "खाली डब्बा, खाली बोतल", जिसे मन्ना डे ने गाया था। इसके बोल जीवन के खोखलेपन पर गहरा व्यंग्य करते हैं। साहिर ने फिल्मों को ऐसे गीत दिए जो साहित्य की ऊंचाई तक पहुंचे।

"तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा" जैसे बोल सामाजिक एकता का संदेश देते हैं। उनकी शायरी में प्रगतिशीलता और संवेदनशीलता का संतुलन था। संगीतकार रवि ने बताया कि साहिर अक्सर मूडी होते थे, वे सिचुएशन लेकर गायब हो जाते थे, लेकिन परफेक्ट गीत लेकर लौटते थे।

Point of View

जो आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं।
NationPress
08/03/2026

Frequently Asked Questions

साहिर लुधियानवी का असली नाम क्या था?
साहिर लुधियानवी का असली नाम अब्दुल हई था।
कौन सा गाना गाते समय मोहम्मद रफी रो पड़े?
मोहम्मद रफी 'बाबुल की दुआएं लेती जा' गाते समय रो पड़े।
गाने 'बाबुल की दुआएं' ने किस पुरस्कार को जीता?
गाने 'बाबुल की दुआएं' ने नेशनल अवॉर्ड जीता।
साहिर लुधियानवी ने किस प्रकार के गीत लिखे?
साहिर ने भजन, कव्वाली, रोमांटिक और व्यंग्यात्मक गीत लिखे।
गाने में रफी की आवाज में कौन सा एहसास था?
गाने में रफी की आवाज में थरथराहट और रोने का एहसास स्पष्ट था।
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