दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: संजीव गोयनका की पर्सनैलिटी राइट्स को AI-डीपफेक से मिली सुरक्षा
सारांश
Key Takeaways
- दिल्ली हाई कोर्ट ने 25 अप्रैल 2025 को संजीव गोयनका के पक्ष में अंतरिम आदेश जारी किया।
- जस्टिस तुषार राव गेडेला की सिंगल बेंच ने यह फैसला सुनाया।
- AI, डीपफेक, मशीन लर्निंग और चैटबॉट से बनाया गया कंटेंट भी प्रतिबंध के दायरे में है।
- गूगल, मेटा प्लेटफॉर्म और X कॉर्प को आपत्तिजनक URL हटाने और अकाउंट जानकारी देने के निर्देश दिए गए।
- अगली सुनवाई 16 जुलाई (जॉइंट रजिस्ट्रार) और 18 सितंबर (दिल्ली हाई कोर्ट) को निर्धारित है।
- यह आदेश भारत में डिजिटल पर्सनैलिटी राइट्स की रक्षा के लिए एक नई कानूनी मिसाल स्थापित करता है।
नई दिल्ली, 25 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। पर्सनैलिटी राइट्स से जुड़े एक अहम मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने लखनऊ सुपर जायंट्स (एलएसजी) के मालिक और प्रसिद्ध उद्योगपति संजीव गोयनका को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गोयनका की अनुमति के बिना उनके नाम, फोटो, आवाज या किसी भी पहचान का उपयोग नहीं किया जा सकता — यहां तक कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) या डीपफेक तकनीक से बनाया गया कंटेंट भी इस प्रतिबंध के दायरे में आता है।
क्या है पूरा मामला?
जस्टिस तुषार राव गेडेला की सिंगल बेंच ने यह अंतरिम आदेश सुनाया। संजीव गोयनका ने गूगल और अन्य प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म के विरुद्ध यह याचिका दायर की थी। उनका आरोप था कि सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में ऐसे पोस्ट, वीडियो और AI-जनित कंटेंट फैलाए जा रहे हैं जो उनकी छवि को क्षति पहुंचाते हैं और आम लोगों को भ्रमित करते हैं।
कोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई में ही माना कि गोयनका का पक्ष मजबूत है। अदालत ने रेखांकित किया कि रिकॉर्ड में मौजूद कई पोस्ट और वीडियो पूरी तरह असत्य हैं, उनमें अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया है और वे सामान्य व्यंग्य या पैरोडी की सीमा से कहीं आगे हैं।
कोर्ट के अंतरिम आदेश की मुख्य बातें
अदालत ने जॉन डो यानी अज्ञात व्यक्तियों सहित सभी को निर्देश दिया कि वे संजीव गोयनका या एस. गोयनका जैसे नामों, उनकी तस्वीर, आवाज या किसी भी पहचान-चिह्न का बिना अनुमति उपयोग न करें। यह प्रतिबंध AI, मशीन लर्निंग, डीपफेक और चैटबॉट से निर्मित सामग्री पर भी समान रूप से लागू होगा।
कोर्ट ने पब्लिसिटी राइट की व्याख्या करते हुए कहा कि यह अधिकार किसी व्यक्ति को यह सुनिश्चित करता है कि कोई अन्य उसकी पहचान का व्यावसायिक दोहन न कर सके। AI और डीपफेक तकनीक के बढ़ते दुरुपयोग को देखते हुए अदालत ने इस मामले को विशेष गंभीरता से लिया।
गूगल, मेटा और X कॉर्प को निर्देश
दिल्ली हाई कोर्ट ने गूगल, मेटा प्लेटफॉर्म और X कॉर्प को आदेश दिया कि वे सभी आपत्तिजनक URL तत्काल हटाएं और संबंधित अकाउंट्स की बुनियादी जानकारी अदालत को उपलब्ध कराएं। भविष्य में ऐसी सामग्री की जानकारी मिलते ही उसे तुरंत ब्लॉक करने का भी निर्देश दिया गया है।
यह आदेश ऐसे समय में आया है जब भारत में डीपफेक और AI-जनित फर्जी कंटेंट की शिकायतें तेजी से बढ़ रही हैं। गौरतलब है कि इससे पहले भी कई बॉलीवुड हस्तियों और उद्योगपतियों ने डीपफेक के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की मांग उठाई थी, लेकिन किसी उद्योगपति द्वारा इस स्तर पर अदालत से राहत प्राप्त करना एक नई मिसाल है।
आगे की सुनवाई और व्यापक प्रभाव
जस्टिस गेडेला ने मामले को 16 जुलाई को जॉइंट रजिस्ट्रार के समक्ष दलीलें पूरी करने के लिए और 18 सितंबर को दिल्ली हाई कोर्ट में अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
यह फैसला भारत में डिजिटल पर्सनैलिटी राइट्स के कानूनी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश न केवल उद्योगपतियों और सार्वजनिक हस्तियों के लिए बल्कि आम नागरिकों के लिए भी AI-जनित दुरुपयोग के विरुद्ध एक मजबूत कानूनी आधार तैयार कर सकता है।
-राष्ट्र प्रेस