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अकाली दल का बड़ा आरोप: भगवंत मान का राष्ट्रपति से मुलाकात का फैसला महज 'सियासी ड्रामा'

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अकाली दल का बड़ा आरोप: भगवंत मान का राष्ट्रपति से मुलाकात का फैसला महज 'सियासी ड्रामा'

सारांश

अकाली दल ने पंजाब CM भगवंत मान के राष्ट्रपति से मिलने के फैसले को 'सियासी ड्रामा' बताया। AAP के 7 राज्यसभा सांसदों के भाजपा में जाने पर दलबदल कानून लागू नहीं होगा, क्योंकि दो-तिहाई सदस्यों ने एक साथ पार्टी बदली। चीमा ने AAP से 'बाहरी अमीरों' को टिकट देने पर सवाल किए।

मुख्य बातें

शिरोमणि अकाली दल ने 25 अप्रैल 2025 को पंजाब CM भगवंत मान के राष्ट्रपति से मुलाकात के फैसले को 'सियासी ड्रामा' करार दिया।
AAP के 7 राज्यसभा सांसद — राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, स्वाति मालीवाल और विक्रमजीत साहनी — 24 अप्रैल को भाजपा में शामिल हुए।
संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दो-तिहाई सदस्यों के एक साथ पार्टी बदलने पर अयोग्यता की कार्रवाई नहीं होती, इसलिए इन सांसदों पर कोई खतरा नहीं।
अकाली नेता दलजीत सिंह चीमा ने AAP से सवाल किया कि पंजाब के 'आम आदमी' की बजाय धनी बाहरी चेहरों को राज्यसभा टिकट क्यों दिया गया।
चीमा ने AAP को सुझाया कि यदि जवाबदेही असली मकसद है तो राज्यपाल से ताज़ा चुनाव की मांग करें, न कि राष्ट्रपति से मिलने का नाटक करें।
यह घटनाक्रम 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले AAP के लिए एक बड़े राजनीतिक और संगठनात्मक संकट का संकेत माना जा रहा है।

चंडीगढ़, 25 अप्रैल: शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के उस कदम को महज 'सियासी ड्रामा' करार दिया है, जिसमें उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मिलने का समय मांगा है। मान चाहते हैं कि आम आदमी पार्टी (AAP) छोड़कर भाजपा में शामिल हुए सात राज्यसभा सांसदों को वापस बुलाया जाए। अकाली दल ने इस पूरी कवायद को संवैधानिक रूप से निराधार और राजनीतिक दिखावा बताया है।

अकाली दल का सीधा हमला — संविधान की दुहाई

SAD के वरिष्ठ नेता दलजीत सिंह चीमा ने स्पष्ट किया कि संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के अंतर्गत सांसदों के विरुद्ध कार्रवाई का अधिकार संसद के पास है, न कि यह राष्ट्रपति के विवेकाधिकार का विषय है। उन्होंने कहा कि कानून बिल्कुल स्पष्ट है — यदि किसी दल के दो-तिहाई सदस्य एक साथ किसी अन्य दल में विलय करते हैं, तो उन पर अयोग्यता की कोई कार्रवाई नहीं हो सकती।

चीमा ने यह भी याद दिलाया कि AAP ने खुद SAD के तीन विधायकों में से एक के 'आप' में शामिल होने को न केवल स्वीकार किया, बल्कि उस विधायक को एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम का चेयरमैन भी बना दिया। यह विरोधाभास उजागर करते हुए उन्होंने पूछा कि क्या जवाबदेही का सिद्धांत सिर्फ चुनिंदा मामलों में ही लागू होता है?

AAP पर बड़ा सवाल — 'बाहरी अमीरों' को क्यों मिला राज्यसभा टिकट?

चीमा ने AAP से तीखा सवाल किया कि पार्टी ने पंजाब के असली 'आम आदमी' प्रतिनिधियों की बजाय बेहद धनी 'बाहरी लोगों' को राज्यसभा के लिए क्यों नामित किया? उन्होंने कहा कि यदि जवाबदेही वास्तव में पार्टी का मूल सिद्धांत है, तो क्या आम नागरिकों को भी उन विधायकों को वापस बुलाने का अधिकार मिलना चाहिए जिन्होंने उन्हें निराश किया?

अकाली नेता ने सुझाया कि अगर AAP सच में लोकतांत्रिक नैतिकता में यकीन रखती है, तो उसे पंजाब के लोक भवन जाकर राज्यपाल से नए सिरे से जनादेश यानी ताज़ा चुनाव की मांग करनी चाहिए। केवल इसी रास्ते से जनता का विश्वास बहाल हो सकता है, न कि संवैधानिक दिखावे से।

सात सांसदों का दलबदल — क्या है पूरा घटनाक्रम?

24 अप्रैल 2025 को AAP के सात राज्यसभा सांसदोंराघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, स्वाति मालीवाल और विक्रमजीत साहनी — ने एक साथ पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने की घोषणा की। इनमें स्वाति मालीवाल को छोड़कर शेष छह सांसद राज्यसभा में पंजाब का प्रतिनिधित्व करते हैं।

चूंकि AAP के कुल 10 राज्यसभा सांसदों में से सात ने यानी दो-तिहाई से अधिक ने एक साथ पार्टी बदली है, इसलिए संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत इन पर अयोग्यता का कोई खतरा नहीं है। इसी कानूनी तथ्य को अकाली दल ने भगवंत मान के सामने रखा है।

गहरा राजनीतिक संदर्भ — AAP के लिए बड़ा झटका

यह घटनाक्रम AAP के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े राजनीतिक संकट का संकेत है। 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक बहुमत पाने वाली पार्टी अब अपने ही राज्यसभा सांसदों को रोक पाने में विफल रही है। विश्लेषकों का मानना है कि यह दलबदल न केवल संगठनात्मक कमज़ोरी को उजागर करता है, बल्कि 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी की साख पर भी गहरा असर डाल सकता है।

उल्लेखनीय है कि इसी दौर में दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में AAP को करारी हार का सामना करना पड़ा था, जिसके बाद पार्टी पहले से ही दबाव में है। ऐसे में राज्यसभा में इतने बड़े पैमाने पर दलबदल पार्टी की आंतरिक स्थिति पर सवाल खड़े करता है।

आगे देखना होगा कि राष्ट्रपति भवन भगवंत मान को मुलाकात का समय देता है या नहीं, और यदि देता है तो उस मुलाकात का राजनीतिक और संवैधानिक नतीजा क्या निकलता है। पंजाब की राजनीति में यह घटनाक्रम आने वाले हफ्तों में और गर्म होने के आसार हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो पहले मौके पर ही पाला बदल गए। दिल्ली की हार के बाद यह दलबदल AAP के राष्ट्रीय ढांचे की खोखली नींव को उजागर करता है। अकाली दल का 'ताज़ा चुनाव' वाला सुझाव भले ही विपक्षी चाल हो, लेकिन जवाबदेही का सवाल वाकई ज़रूरी है।
RashtraPress
27 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवंत मान राष्ट्रपति से क्यों मिलना चाहते हैं?
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान AAP छोड़कर भाजपा में शामिल हुए सात राज्यसभा सांसदों को वापस बुलाने की मांग लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मिलना चाहते हैं। वह अपने पार्टी विधायकों के साथ यह पक्ष रखना चाहते हैं।
अकाली दल ने भगवंत मान के फैसले को सियासी ड्रामा क्यों कहा?
अकाली दल का कहना है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत सांसदों पर कार्रवाई का अधिकार राष्ट्रपति को नहीं बल्कि संसद को है। इसलिए राष्ट्रपति से मिलने की यह कवायद संवैधानिक रूप से निराधार और केवल राजनीतिक दिखावा है।
क्या AAP के 7 सांसदों पर दलबदल विरोधी कानून लागू होगा?
नहीं, क्योंकि AAP के कुल 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 यानी दो-तिहाई से अधिक ने एक साथ पार्टी बदली है। संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार ऐसे मामले में अयोग्यता की कार्रवाई नहीं होती।
AAP के कौन से 7 सांसद भाजपा में शामिल हुए?
राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, स्वाति मालीवाल और विक्रमजीत साहनी ने 24 अप्रैल 2025 को AAP छोड़कर भाजपा में शामिल होने की घोषणा की। स्वाति मालीवाल को छोड़कर बाकी छह पंजाब का प्रतिनिधित्व करते हैं।
अकाली दल ने AAP को क्या सुझाव दिया?
अकाली दल के नेता दलजीत सिंह चीमा ने सुझाया कि यदि AAP वास्तव में लोकतांत्रिक नैतिकता में विश्वास रखती है, तो उसे राज्यपाल से नए सिरे से जनादेश यानी ताज़ा चुनाव की मांग करनी चाहिए। केवल इसी तरीके से जनता का भरोसा बहाल हो सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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