रोशिबिना देवी का एशियन गेम्स 2026 में वुशु सिल्वर, करियर का तीसरा एशियाई पदक
सारांश
मुख्य बातें
मणिपुर की वुशु स्टार रोशिबिना देवी ने एशियन गेम्स 2026 में महिलाओं के 60 किलोग्राम सांडा इवेंट में सिल्वर मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया है। यह एशियाई खेलों में उनका तीसरा पदक है, जो उन्हें भारत की सबसे सफल वुशु एथलीटों में शुमार करता है। बिष्णुपुर, मणिपुर की इस बेटी की यात्रा एक साधारण किसान परिवार से शुरू होकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँची है।
मेडल का सफर: तीन एशियाई खेल, तीन पदक
रोशिबिना देवी ने महज 17 साल की उम्र में 2018 जकार्ता-पालेमबांग एशियन गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ी थी। इसके बाद हांगझोऊ एशियन गेम्स 2023 में उन्होंने रजत पदक हासिल किया। अब एशियन गेम्स 2026 में एक बार फिर सिल्वर मेडल जीतकर उन्होंने अपनी निरंतरता साबित की है। गौरतलब है कि लगातार तीन एशियाई खेलों में पदक जीतना किसी भी भारतीय वुशु खिलाड़ी के लिए असाधारण उपलब्धि है।
बचपन और परवरिश: किसान परिवार से अंतरराष्ट्रीय मंच तक
30 दिसंबर 2000 को मणिपुर के बिष्णुपुर जिले के क्वासिफाई मायाई लीकाई गाँव में जन्मीं रोशिबिना तीन भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर हैं। बचपन से ही उनमें बॉक्सिंग और मार्शल आर्ट्स जैसे कॉम्बैट स्पोर्ट्स के प्रति गज़ब का जुनून था। खेलों के साथ-साथ वे पढ़ाई में भी अव्वल रहती थीं और अक्सर कक्षा में प्रथम स्थान हासिल करती थीं।
माता-पिता की चिंता स्वाभाविक थी — किसान परिवार होने के कारण खेलों के लिए आवश्यक पोषण, उपकरण और यात्रा का खर्च उठाना आसान नहीं था। बावजूद इसके, रोशिबिना का जुनून कम नहीं हुआ और उन्होंने अपने पड़ोस की वरिष्ठ वुशु एथलीट थोउदाम मालेमंगनबी से मार्गदर्शन लेना शुरू किया।
प्रशिक्षण और करियर की शुरुआत
रोशिबिना ने डॉ. सिफु नोरेंद्रो थोकचोम और कोच मोइरांगथेम रोनाल्ड की देखरेख में बिष्णुपुर जिला वुशु चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। इसके बाद कोच प्रेम और वरिष्ठ खिलाड़ी थोउदाम मालेमंगनबी के मार्गदर्शन में उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
कश्मीर नेशनल गेम्स में 28 किलोग्राम भार वर्ग में राष्ट्रीय डेब्यू करते हुए उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल जीता। 2016 में 6वीं वर्ल्ड जूनियर चैंपियनशिप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदार्पण के साथ उनके वैश्विक करियर की नींव पड़ी।
परिवार की भावनाएँ और गर्व
बेटी की उपलब्धि पर रोशिबिना के पिता नाओरेम धामू भावुक हो उठे। उन्होंने कहा, 'वह गोल्ड जीतने की जबरदस्त इच्छा के साथ इन एशियन गेम्स में गई थीं। हमें पता है कि गोल्ड का सपना पूरा न हो पाने से उन्हें थोड़ा दुख हुआ होगा, लेकिन माता-पिता के तौर पर हमें गर्व है। अपनी मातृभूमि, मणिपुर के लिए इंटरनेशनल मेडल जीतना एक बेमिसाल उपलब्धि है।'
माँ नाओरेम रोमिला ने कहा, 'मुझे बहुत खुशी है कि मेरी बेटी ने एशियन गेम्स में सिल्वर मेडल जीता है। हमारे परिवार के लिए यह बहुत गर्व का पल है, क्योंकि उन्होंने हमारे राज्य का नाम रोशन किया है।' पिता ने सफलता का श्रेय कोचों, स्थानीय विधायक, क्वाशिफाई यूथ वॉलंटरी ऑर्गनाइजेशन और क्वाशिफाई न्यू यूथ क्लब को दिया, जिन्होंने मुश्किल समय में आर्थिक और नैतिक सहयोग दिया।
ओलंपिक का सपना और आगे की राह
पिता नाओरेम धामू ने कहा कि अगर कभी ओलंपिक गेम्स में वुशु सांडा को शामिल किया जाता है, तो ओलंपिक गोल्ड की तलाश में रोशिबिना को उनका पूरा और बिना शर्त समर्थन मिलेगा। यह ऐसे समय में आया है जब भारत वुशु में अपनी अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति मज़बूत कर रहा है और रोशिबिना जैसी खिलाड़ियाँ इस खेल को मुख्यधारा में लाने की सबसे बड़ी उम्मीद हैं।