सावन बरवाल का मैराथन सफर: हिमाचल की पहाड़ियों से भारत का 48 साल पुराना नेशनल रिकॉर्ड तोड़ा
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय सेना के एथलीट सावन बरवाल ने 2025 की शुरुआत में 48 साल पुराना राष्ट्रीय मैराथन रिकॉर्ड तोड़कर देश के लंबी दूरी के दौड़ के इतिहास में नया अध्याय जोड़ा। हिमाचल प्रदेश के जोगिंदर नगर की पहाड़ियों में पले-बढ़े इस धावक की यात्रा सीमित संसाधनों, गंभीर चोटों और वर्षों के अनुशासन से होकर गुज़री है। यह उपलब्धि उन्हें भारत के सबसे चर्चित मैराथन रनर की पंक्ति में खड़ा करती है।
पहाड़ों की ट्रेनिंग और शारीरिक बढ़त
सावन के अनुसार, जोगिंदर नगर की ऊँचाई और भौगोलिक परिस्थितियों ने उनकी सहनशक्ति को स्वाभाविक रूप से विकसित किया। उन्होंने बताया, 'पहाड़ों पर जाना थोड़ा चैलेंजिंग होता है, और वहाँ बहुत सारी फिजिकल एक्टिविटी की जरूरत होती है। ऐसे में निश्चित रूप से अगर आप वहाँ रहते हैं तो धैर्य और सहनशक्ति शुरू से ही विकसित होती है।' ऊँचाई पर ट्रेनिंग का लाभ बाद में मैदानी प्रतियोगिताओं में स्पष्ट रूप से मिला।
हालाँकि, पहाड़ों में ट्रेनिंग की अपनी सीमाएँ भी थीं। सावन ने स्वीकार किया कि शुरुआती दिनों में उनके जिले में रिकवरी और न्यूट्रिशन की सुविधाएँ नहीं थीं। जब वे शहर के एक्सीलेंस सेंटर में पहुँचे, तब उन्हें पेशेवर ढाँचे का पहला अनुभव हुआ।
मानसिक लड़ाई और चोट का दौर
2023 में सावन को एक गंभीर चोट लगी, जिससे उबरने में उन्हें छह से सात महीने लगे। उन्होंने बताया कि उस दौरान मन में नकारात्मक विचार आना स्वाभाविक था — कि शायद वे दोबारा पहले जैसे नहीं हो पाएँगे। 'उन विचारों को कंट्रोल करना मेरे लिए बहुत मुश्किल था,' उन्होंने कहा। इसके अलावा, जूनियर से सीनियर स्तर पर जाने के संक्रमण काल में भी उन्हें खुद को साबित करने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।
उनका मानना है कि लंबी दूरी की दौड़ केवल शारीरिक नहीं, बल्कि उतनी ही मानसिक चुनौती है। वे ट्रेनिंग से एक-दो दिन पहले ही अगले सत्र का लक्ष्य तय कर लेते हैं — और उसी लक्ष्य को पाने की खुशी उन्हें आगे बढ़ाती है। 'हमें ट्रेनिंग की रुकावटों को तोड़ना होगा,' यह उनका मूल मंत्र है।
परिवार का त्याग और सपोर्ट सिस्टम
सावन के बड़े भाई ने उनकी यात्रा में निर्णायक भूमिका निभाई। जब सावन के पास नौकरी नहीं थी और वे आर्थिक रूप से अस्थिर थे, तब उनके भाई ने अपनी बचत से उन्हें ट्रेनिंग जूते, स्पाइक शूज़ और प्रतियोगिता के जूते दिलाए, जिनकी कीमत लगभग ₹20,000 थी। सावन के अनुसार परिवार ने अपनी ज़रूरतें कम करके उनकी ट्रेनिंग को प्राथमिकता दी।
उन्होंने यह भी बताया कि उनके कोच, टीम के साथी और स्पोर्ट्सवियर ब्रांड ASICS के सहयोग ने उनके लक्ष्यों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाई। उनके अनुसार आधुनिक कार्बन-फाइबर प्लेट वाले प्रतियोगिता जूते एथलीट के प्रदर्शन को 20-30 प्रतिशत तक आसान बना सकते हैं।
भारत में मैराथन का बदलता परिदृश्य
सावन ने माना कि हिमाचल में परंपरागत रूप से एथलेटिक्स को करियर के रूप में नहीं देखा जाता था — अधिकांश युवा अंततः सेना में शामिल हो जाते थे। छह-सात साल पहले मैराथन को लेकर उतना उत्साह नहीं था, लेकिन अब बड़ी संख्या में लोग इसमें भाग लेने लगे हैं। यह बदलाव उन्हें उत्साहित करता है।
युवा एथलीटों को उनका संदेश स्पष्ट है: जूनियर से सीनियर स्तर तक पहुँचने में चार से छह साल लगते हैं। इस दौरान धैर्य और निरंतर अभ्यास ही एकमात्र रास्ता है। जो एथलीट बीच में हार मान लेते हैं, वे अक्सर उस मुकाम से ठीक पहले छोड़ते हैं जब सफलता मिलने वाली होती है।