एम्स नागपुर बच्चों की गैर-संचारी बीमारियों के लिए राष्ट्रव्यापी उपचार मॉडल विकसित कर रहा है: डॉ. प्रशांत जोशी
सारांश
मुख्य बातें
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नागपुर पश्चिमी और मध्य भारत के बच्चों में तेज़ी से बढ़ रही गैर-संचारी बीमारियों (एनसीडी) से निपटने के लिए एक ऐसा उपचार मॉडल विकसित कर रहा है, जिसे पूरे देश में लागू किया जा सके। 14 जुलाई को नागपुर में आयोजित एक विशेष कार्यशाला में विशेषज्ञों ने बताया कि बच्चों में एनसीडी की पहचान अक्सर तब होती है जब बीमारी गंभीर रूप ले चुकी होती है।
मुख्य घटनाक्रम
यूनिसेफ इंडिया, प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पश्चिमी जोन) और एम्स नागपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यशाला में पश्चिमी भारत के बच्चों में एनसीडी की पहचान, उपचार और प्रबंधन पर विस्तृत चर्चा हुई। एम्स नागपुर के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. प्रशांत जोशी ने कहा कि बच्चों में होने वाली गैर-संचारी बीमारियों का इनक्यूबेशन पीरियड लंबा होता है और ये बचपन से ही शुरू हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि इसीलिए शुरुआती पहचान, लगातार देखभाल और मज़बूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की माँग करना ज़रूरी और अहम है।
ग्रामीण और शहरी — दोनों क्षेत्रों की चुनौतियाँ
विशेषज्ञों ने बताया कि पश्चिमी और मध्य भारत के आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में बच्चों में एनसीडी के मामले सीमित जाँच सुविधाओं और विशेषज्ञ देखभाल की कमी के साथ सामने आते हैं। दूसरी ओर, शहरी क्षेत्रों में बच्चों में मोटापा, डायबिटीज और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ बढ़ रही हैं, जिसकी मुख्य वजह सुस्त जीवनशैली, अत्यधिक स्क्रीन टाइम और खान-पान में बदलाव है। गौरतलब है कि चाहे ग्रामीण हो, आदिवासी हो या शहरी — बच्चों में ये बीमारियाँ अक्सर तब तक नज़र नहीं आतीं जब तक स्थिति गंभीर न हो जाए।
मीडिया और जागरूकता की भूमिका
सूचना और प्रसारण मंत्रालय के प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (वेस्टर्न जोन) की डायरेक्टर जनरल स्मिता वत्स शर्मा ने कार्यशाला में कहा, 'पब्लिक हेल्थ रिपोर्टिंग से जागरूकता और लोगों की कार्रवाई तय होती है। पत्रकारों की यह अहम ज़िम्मेदारी है कि वे सबूतों पर आधारित जानकारी दें और ऐसी कहानियाँ सुनाएँ, जिनसे नागरिकों को बच्चों पर असर डालने वाली नई स्वास्थ्य चुनौतियों को समझने में मदद मिले।'
आम जनता पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब भारत में बाल स्वास्थ्य नीति का ध्यान मुख्यतः संक्रामक बीमारियों पर केंद्रित रहा है। एनसीडी का बढ़ता बोझ — जो पहले मुख्यतः वयस्कों से जुड़ा माना जाता था — अब बच्चों में भी स्पष्ट रूप से दिख रहा है। एम्स नागपुर का यह मॉडल, यदि सफल रहा, तो सार्वजनिक स्वास्थ्य ढाँचे में बाल एनसीडी को मुख्यधारा में लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
क्या होगा आगे
डॉ. जोशी के अनुसार, एम्स नागपुर देखभाल के ऐसे मॉडल विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर दोहराया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल की सफलता के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की क्षमता वृद्धि और जन-जागरूकता अभियानों की आवश्यकता होगी।