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गुजरात एंटी-रेडिकलाइजेशन एसओपी पर सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने सीएम पटेल को लिखा पत्र, संवैधानिक समीक्षा की माँग

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गुजरात एंटी-रेडिकलाइजेशन एसओपी पर सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने सीएम पटेल को लिखा पत्र, संवैधानिक समीक्षा की माँग

सारांश

सीपीआई (एम) सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने गुजरात के एसआईबी की कथित एंटी-रेडिकलाइजेशन एसओपी को लेकर सीएम भूपेंद्र पटेल को पत्र लिखा है। एसओपी में दाढ़ी, नकाब और अरबी शब्दों के प्रयोग को 'संदेह के संकेत' बताए जाने की रिपोर्ट पर उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 25 और 26 के उल्लंघन की आशंका जताते हुए स्वतंत्र समिति से समीक्षा और तत्काल रोक की माँग की है।

मुख्य बातें

सीपीआई (एम) के राज्यसभा सांसद डॉ.
जॉन ब्रिटास ने 14 जुलाई 2026 को गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को पत्र लिखा।
पत्र में गुजरात एसआईबी की कथित एंटी-रेडिकलाइजेशन एसओपी की स्वतंत्र संवैधानिक समीक्षा की माँग की गई है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार एसओपी में दाढ़ी रखना, नकाब पहनना, अरबी शब्दों का प्रयोग और 'संवेदनशील' मस्जिदों में जाना 'कट्टरपंथ के संकेत' बताए गए हैं।
ब्रिटास ने संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 25 और 26 के तहत समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और निजता के अधिकारों के उल्लंघन की आशंका जताई।
सांसद ने माँग की कि समीक्षा पूरी होने तक एसओपी के अमल पर तत्काल रोक लगाई जाए और जाँच के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित हो।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राज्यसभा सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने 14 जुलाई 2026 को गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को एक औपचारिक पत्र लिखकर राज्य पुलिस के स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो (एसआईबी) की कथित एंटी-रेडिकलाइजेशन स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) की स्वतंत्र संवैधानिक समीक्षा कराने की माँग की है। डॉ. ब्रिटास ने कहा कि यदि मीडिया में सामने आई इस एसओपी की जानकारी सटीक है, तो यह संविधान और नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़े अत्यंत गंभीर सवाल खड़े करती है।

एसओपी में क्या बताया गया है

मीडिया रिपोर्टों में सामने आए एसओपी के अंशों के अनुसार, इसमें किसी व्यक्ति को 'कट्टरपंथी' पहचानने के लिए कई व्यवहारिक संकेत सूचीबद्ध किए गए हैं। इनमें अचानक दाढ़ी रखना, नकाब पहनना, सामान्य बातचीत में अरबी शब्दों का प्रयोग, दुनिया में कहीं भी मुसलमानों से जुड़े घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया देना, धार्मिक कारणों से पढ़ाई या नौकरी छोड़ना, धार्मिक नेताओं से बार-बार मिलना और 'संवेदनशील' मानी गई मस्जिदों या मदरसों में जाना शामिल बताया गया है।

इसके अलावा, एसओपी में कथित तौर पर सोशल मीडिया, ऑनलाइन मंचों, मैसेजिंग ऐप और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म की निगरानी, व्यक्तियों की प्रोफाइलिंग, सामुदायिक नेटवर्क का मानचित्रण तथा धार्मिक संस्थानों व शिक्षकों की प्रोफाइलिंग का भी उल्लेख है।

संवैधानिक आपत्तियाँ

डॉ. ब्रिटास ने अपने पत्र में रेखांकित किया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 25 और 26 नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, गरिमा और निजता की संवैधानिक गारंटी देते हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी नागरिक की प्रोफाइलिंग उसके धर्म, पहनावे, भाषा या धार्मिक गतिविधियों के आधार पर की जाती है, तो यह इन मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान और न्यायपालिका बार-बार यह स्थापित कर चुके हैं कि राज्य किसी समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह या सामूहिक संदेह के आधार पर कार्रवाई नहीं कर सकता। हर नागरिक का आकलन केवल विश्वसनीय सबूतों और गैरकानूनी गतिविधियों के आधार पर होना चाहिए।

सांसद की माँगें

डॉ. ब्रिटास ने मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल से तीन प्रमुख माँगें रखी हैं। पहली — यदि यह एसओपी वास्तव में लागू है, तो समीक्षा पूरी होने तक इसके अमल पर तत्काल रोक लगाई जाए। दूसरी — एसओपी की जाँच संवैधानिक विशेषज्ञों, वरिष्ठ विधि विशेषज्ञों और अनुभवी पुलिस अधिकारियों की एक स्वतंत्र समिति से कराई जाए। तीसरी — जिन प्रावधानों से धर्म, पहनावे, भाषा या अन्य संवैधानिक रूप से संरक्षित आधारों पर प्रोफाइलिंग या निगरानी की आशंका पैदा होती है, उन्हें हटाया या संशोधित किया जाए।

सुरक्षा और अधिकार का संतुलन

डॉ. ब्रिटास ने अपने पत्र में यह भी स्वीकार किया कि राज्य का यह दायित्व है कि वह आतंकवाद, हिंसक उग्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाली गतिविधियों को रोके और इसके लिए मजबूत खुफिया तंत्र जरूरी है। परंतु उन्होंने जोर दिया कि ऐसी सभी कार्रवाइयाँ संविधान, कानून के शासन और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के दायरे में ही होनी चाहिए। उन्होंने माँग की कि सभी एंटी-रेडिकलाइजेशन उपाय केवल ठोस सबूत, गैरकानूनी या हिंसक गतिविधियों और विश्वसनीय खुफिया जानकारी पर आधारित हों। यह मामला अब गुजरात सरकार की प्रतिक्रिया और संभावित संसदीय बहस की दिशा में आगे बढ़ने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

नकाब, भाषा — को संदेह के आधार के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, जो भारतीय न्यायशास्त्र में 'अनुमानित संदेह' की उस अवधारणा के करीब है जिसे सर्वोच्च न्यायालय बार-बार असंवैधानिक ठहरा चुका है। असली सवाल यह नहीं कि एंटी-रेडिकलाइजेशन नीति होनी चाहिए या नहीं — बल्कि यह है कि क्या ऐसी नीति साक्ष्य-आधारित है या समुदाय-आधारित। यदि एसओपी वास्तव में उस रूप में है जैसा मीडिया में बताया गया है, तो यह सुरक्षा तंत्र और संवैधानिक मर्यादा के बीच की रेखा को धुंधला करती है — और इसका जवाब गुजरात सरकार को देना होगा।
RashtraPress
14 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गुजरात की एंटी-रेडिकलाइजेशन एसओपी क्या है?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह गुजरात पुलिस के स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो (एसआईबी) की एक कथित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर है, जिसमें किसी व्यक्ति को 'कट्टरपंथी' पहचानने के लिए व्यवहारिक और धार्मिक संकेत सूचीबद्ध बताए गए हैं। गुजरात सरकार ने अभी तक इस एसओपी की आधिकारिक पुष्टि या खंडन नहीं किया है।
डॉ. जॉन ब्रिटास ने सीएम भूपेंद्र पटेल को पत्र क्यों लिखा?
सीपीआई (एम) के राज्यसभा सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने 14 जुलाई 2026 को यह पत्र इसलिए लिखा क्योंकि मीडिया में सामने आए एसओपी के अंश, उनके अनुसार, धार्मिक पहचान और पहनावे को पुलिस निगरानी का आधार बनाते हैं, जो संविधान के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।
एसओपी में किन बातों को 'कट्टरपंथ के संकेत' बताया गया है?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, एसओपी में अचानक दाढ़ी रखना, नकाब पहनना, सामान्य बातचीत में अरबी शब्दों का प्रयोग, धार्मिक कारणों से पढ़ाई या नौकरी छोड़ना, धार्मिक नेताओं से बार-बार मिलना और 'संवेदनशील' मस्जिदों या मदरसों में जाना जैसे बिंदु शामिल बताए गए हैं। ये सभी दावे मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं; गुजरात सरकार की आधिकारिक स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।
डॉ. ब्रिटास ने किन संवैधानिक अनुच्छेदों का हवाला दिया?
डॉ. ब्रिटास ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 21 (जीवन, गरिमा और निजता का अधिकार), अनुच्छेद 25 और 26 (धार्मिक स्वतंत्रता) का हवाला देते हुए कहा कि धार्मिक पहचान के आधार पर प्रोफाइलिंग इन अधिकारों का उल्लंघन है।
सांसद ने गुजरात सरकार से क्या कदम उठाने की माँग की है?
डॉ. ब्रिटास ने तीन माँगें रखी हैं — समीक्षा पूरी होने तक एसओपी के अमल पर तत्काल रोक, संवैधानिक विशेषज्ञों और विधि विशेषज्ञों की स्वतंत्र समिति से जाँच, और धर्म व पहनावे पर आधारित प्रोफाइलिंग के प्रावधानों को हटाना या संशोधित करना।
राष्ट्र प्रेस
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