गुजरात एंटी-रेडिकलाइजेशन एसओपी पर सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने सीएम पटेल को लिखा पत्र, संवैधानिक समीक्षा की माँग
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राज्यसभा सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने 14 जुलाई 2026 को गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को एक औपचारिक पत्र लिखकर राज्य पुलिस के स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो (एसआईबी) की कथित एंटी-रेडिकलाइजेशन स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) की स्वतंत्र संवैधानिक समीक्षा कराने की माँग की है। डॉ. ब्रिटास ने कहा कि यदि मीडिया में सामने आई इस एसओपी की जानकारी सटीक है, तो यह संविधान और नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़े अत्यंत गंभीर सवाल खड़े करती है।
एसओपी में क्या बताया गया है
मीडिया रिपोर्टों में सामने आए एसओपी के अंशों के अनुसार, इसमें किसी व्यक्ति को 'कट्टरपंथी' पहचानने के लिए कई व्यवहारिक संकेत सूचीबद्ध किए गए हैं। इनमें अचानक दाढ़ी रखना, नकाब पहनना, सामान्य बातचीत में अरबी शब्दों का प्रयोग, दुनिया में कहीं भी मुसलमानों से जुड़े घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया देना, धार्मिक कारणों से पढ़ाई या नौकरी छोड़ना, धार्मिक नेताओं से बार-बार मिलना और 'संवेदनशील' मानी गई मस्जिदों या मदरसों में जाना शामिल बताया गया है।
इसके अलावा, एसओपी में कथित तौर पर सोशल मीडिया, ऑनलाइन मंचों, मैसेजिंग ऐप और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म की निगरानी, व्यक्तियों की प्रोफाइलिंग, सामुदायिक नेटवर्क का मानचित्रण तथा धार्मिक संस्थानों व शिक्षकों की प्रोफाइलिंग का भी उल्लेख है।
संवैधानिक आपत्तियाँ
डॉ. ब्रिटास ने अपने पत्र में रेखांकित किया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 25 और 26 नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, गरिमा और निजता की संवैधानिक गारंटी देते हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी नागरिक की प्रोफाइलिंग उसके धर्म, पहनावे, भाषा या धार्मिक गतिविधियों के आधार पर की जाती है, तो यह इन मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान और न्यायपालिका बार-बार यह स्थापित कर चुके हैं कि राज्य किसी समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह या सामूहिक संदेह के आधार पर कार्रवाई नहीं कर सकता। हर नागरिक का आकलन केवल विश्वसनीय सबूतों और गैरकानूनी गतिविधियों के आधार पर होना चाहिए।
सांसद की माँगें
डॉ. ब्रिटास ने मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल से तीन प्रमुख माँगें रखी हैं। पहली — यदि यह एसओपी वास्तव में लागू है, तो समीक्षा पूरी होने तक इसके अमल पर तत्काल रोक लगाई जाए। दूसरी — एसओपी की जाँच संवैधानिक विशेषज्ञों, वरिष्ठ विधि विशेषज्ञों और अनुभवी पुलिस अधिकारियों की एक स्वतंत्र समिति से कराई जाए। तीसरी — जिन प्रावधानों से धर्म, पहनावे, भाषा या अन्य संवैधानिक रूप से संरक्षित आधारों पर प्रोफाइलिंग या निगरानी की आशंका पैदा होती है, उन्हें हटाया या संशोधित किया जाए।
सुरक्षा और अधिकार का संतुलन
डॉ. ब्रिटास ने अपने पत्र में यह भी स्वीकार किया कि राज्य का यह दायित्व है कि वह आतंकवाद, हिंसक उग्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाली गतिविधियों को रोके और इसके लिए मजबूत खुफिया तंत्र जरूरी है। परंतु उन्होंने जोर दिया कि ऐसी सभी कार्रवाइयाँ संविधान, कानून के शासन और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के दायरे में ही होनी चाहिए। उन्होंने माँग की कि सभी एंटी-रेडिकलाइजेशन उपाय केवल ठोस सबूत, गैरकानूनी या हिंसक गतिविधियों और विश्वसनीय खुफिया जानकारी पर आधारित हों। यह मामला अब गुजरात सरकार की प्रतिक्रिया और संभावित संसदीय बहस की दिशा में आगे बढ़ने की संभावना है।