अखिल गोगोई का आरोप: रकीबुल हुसैन की संपत्ति 8 साल में ₹4.38 करोड़ से बढ़कर ₹25.29 करोड़ हुई
सारांश
मुख्य बातें
रायजोर दल के प्रमुख और शिवसागर के विधायक अखिल गोगोई ने कांग्रेस सांसद रकीबुल हुसैन की घोषित संपत्ति में 2016 से 2024 के बीच हुई भारी बढ़ोतरी को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। गोगोई के अनुसार, हुसैन के चुनावी हलफनामों में दर्ज संपत्ति ₹4.38 करोड़ से बढ़कर ₹25.29 करोड़ हो गई — यानी आठ वर्षों में लगभग 477 प्रतिशत की वृद्धि।
मुख्य आरोप और आंकड़े
गोगोई ने दावा किया कि 2016 के विधानसभा चुनाव के हलफनामे में हुसैन की घोषित संपत्ति ₹4.38 करोड़ थी, जो 2024 के लोकसभा चुनाव के हलफनामे में बढ़कर ₹25.29 करोड़ दर्ज की गई। रायजोर दल के विधायक द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में कुल ₹20.91 करोड़ की बढ़ोतरी हुई।
गोगोई ने इस वृद्धि को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के कार्यकाल से जोड़ते हुए कहा कि इस 'अनकही कहानी' की जाँच होनी चाहिए। उन्होंने संपत्ति बढ़ोतरी के स्रोत पर स्पष्टीकरण माँगा है।
हलफनामों की सीमाएँ
यह ध्यान देना ज़रूरी है कि चुनावी हलफनामे उम्मीदवार द्वारा स्वघोषित संपत्ति का विवरण होते हैं। इनसे अपने आप किसी गड़बड़ी का संकेत नहीं मिलता और न ही ये संपत्ति के किसी अवैध स्रोत का प्रमाण होते हैं। संपत्ति वृद्धि के वास्तविक कारणों की पुष्टि के लिए संबंधित वित्तीय और संपत्ति रिकॉर्ड की स्वतंत्र जाँच आवश्यक होगी।
इन आरोपों पर रकीबुल हुसैन की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।
रकीबुल हुसैन कौन हैं
असम में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रकीबुल हुसैन 2024 के आम चुनाव में धुबरी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से संसद के लिए निर्वाचित हुए थे। वे असम कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं।
रायजोर दल-कांग्रेस में बढ़ता टकराव
गोगोई की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब रायजोर दल और कांग्रेस के बीच संबंध पहले से ही तनावपूर्ण हैं। गौरतलब है कि दोनों दलों ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) का मुकाबला करने के लिए एक विपक्षी गठबंधन बनाया था, परंतु बाद में कांग्रेस ने रायजोर दल से अपना गठबंधन तोड़ लिया।
गोगोई पहले भी कांग्रेस नेतृत्व की राजनीतिक और संगठनात्मक कमज़ोरियों पर सवाल उठाते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यह हमला राज्य में आगामी राजनीतिक मुकाबलों से पहले दोनों पूर्व सहयोगियों के बीच की खाई को और गहरा कर सकता है।
आगे क्या
फिलहाल इस मामले में कोई औपचारिक शिकायत या जाँच की जानकारी सामने नहीं आई है। असम की राजनीति में यह विवाद आने वाले चुनावी मौसम में और प्रमुखता पा सकता है, खासतौर पर तब जब दोनों पक्ष अलग-अलग राजनीतिक ज़मीन तलाश रहे हैं।