एपीजे अब्दुल कलाम: गैर-राजनीतिक 'मिसाइल मैन' के वे दुर्लभ फैसले, जिन्होंने सरकारों को चौंकाया
सारांश
मुख्य बातें
एपीजे अब्दुल कलाम — 'भारत रत्न' और 'मिसाइल मैन' — को दुनिया भर में एक असाधारण वैज्ञानिक के रूप में जाना जाता है। लेकिन 25 जुलाई 2002 से 25 जुलाई 2007 तक भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में उनके कार्यकाल में उन्होंने जो संवैधानिक साहस दिखाया, वह अक्सर चर्चा से बाहर रह जाता है। बिना किसी राजनीतिक या कानूनी पृष्ठभूमि के राष्ट्रपति भवन पहुँचे कलाम ने यह साबित कर दिया कि संवैधानिक प्रमुख महज 'रबर स्टैम्प' नहीं होता।
कौन थे एपीजे अब्दुल कलाम
15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में जन्मे अवुल पकीर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम ने अपना जीवन विज्ञान और रक्षा अनुसंधान को समर्पित किया। उनके नेतृत्व में भारत परमाणु हथियार-संपन्न राष्ट्र बना और 'मिसाइल मैन' की उपाधि उन्हें उनके अदम्य योगदान के लिए मिली। उनकी न कोई राजनीतिक संबद्धता थी, न कानूनी पृष्ठभूमि — और यही उनकी ताकत बनी।
ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल: अनुच्छेद 111 का ऐतिहासिक उपयोग
कलाम के राष्ट्रपतित्व का सबसे चर्चित संवैधानिक प्रसंग 'ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल' से जुड़ा है। 2006 में अलग-अलग दलों के 43 सांसदों और राज्य विधानसभाओं के 200 से अधिक सदस्यों की संसदीय सदस्यता पर अयोग्यता की तलवार लटक रही थी। तत्कालीन कानून मंत्री एचआर भारद्वाज पर सभी दलों की ओर से जल्दबाजी में बिल का मसौदा तैयार करने का दबाव था। अयोग्यता निवारण अधिनियम 1959 में संशोधन किया गया और बिल संसद के पिछले सत्र में पारित कर दिया गया।
25 मई को कलाम के पास यह बिल पहुँचा। संवैधानिक विशेषज्ञों से विस्तृत विचार-विमर्श के बाद उन्होंने अपनी सहमति देने से इनकार कर दिया और संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत बिल को पुनर्विचार के लिए 30 मई को संसद को वापस लौटा दिया। यह राष्ट्रपति की ओर से स्वतंत्र संवैधानिक शक्ति के प्रयोग का एक दुर्लभ उदाहरण था — जो आधुनिक भारतीय संसदीय इतिहास में बहुत कम देखने को मिला है।
वाजपेयी के प्रस्तावों पर कलाम का स्वतंत्र रुख
यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि एपीजे अब्दुल कलाम और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच गहरे व्यक्तिगत संबंध थे। फिर भी कलाम ने कभी भी इन संबंधों को अपने संवैधानिक कर्तव्यों पर हावी नहीं होने दिया। 1998 में वाजपेयी ने उन्हें अपनी एनडीए सरकार में मंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसे कलाम ने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। उन्होंने इस प्रसंग का उल्लेख अपनी पुस्तक 'टर्निंग पॉइंट्स: ए जर्नी थ्रू चैलेंजेज' में किया है।
इसके अलावा, फरवरी 2004 में लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने से छह महीने पहले उसे भंग करने की वाजपेयी की सिफारिश पर भी कलाम ने तत्काल स्वीकृति नहीं दी। लेखों में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने सिफारिश पर गहन विचार किया, तत्कालीन अटॉर्नी-जनरल सोली सोराबजी से परामर्श लिया और राष्ट्रपति की शक्तियों से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का अध्ययन किया। इससे पहले कोई भी राष्ट्रपति अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को इतनी गंभीरता से नहीं निभाता था।
चुनाव आयोग और अयोग्यता के मामले
2006 में राष्ट्रपति को सौंपी गई कई याचिकाओं में सत्ताधारी वर्ग के प्रभावशाली प्रतिनिधियों — जिनमें वाम मोर्चे के 11 सांसद भी शामिल थे — की विधायी सदस्यता को चुनौती दी गई थी। कलाम ने संविधान के अनुच्छेद 103(2) के तहत इन मामलों को चुनाव आयोग को संदर्भित करने में सक्रिय रुचि दिखाई। यह रवैया बताता है कि वे संवैधानिक प्रक्रियाओं को राजनीतिक दबाव से ऊपर रखते थे।
कलाम की विरासत: एक नई परंपरा
कलाम ने साबित किया कि राष्ट्रपति पद केवल औपचारिक अनुमोदन की भूमिका नहीं है — यह एक स्वतंत्र संवैधानिक विवेक की माँग करता है। उनकी वैज्ञानिक सोच, जो हर प्रश्न को तथ्यों और तर्कों की कसौटी पर परखती थी, ने उन्हें एक ऐसे राष्ट्रपति बनाया जिसने राजनीतिक परंपराओं को चुनौती दी और लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत किया। आज उनकी जयंती पर उनके इन कम-चर्चित लेकिन दूरगामी फैसलों को याद करना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।