14 अक्टूबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

एपीजे अब्दुल कलाम: गैर-राजनीतिक 'मिसाइल मैन' के वे दुर्लभ फैसले, जिन्होंने सरकारों को चौंकाया

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
एपीजे अब्दुल कलाम: गैर-राजनीतिक 'मिसाइल मैन' के वे दुर्लभ फैसले, जिन्होंने सरकारों को चौंकाया

सारांश

वैज्ञानिक से राष्ट्रपति बने कलाम ने साबित किया कि 'रबर स्टैम्प' होना कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं। ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल लौटाना हो या वाजपेयी की मंत्री पद की पेशकश ठुकराना — उनके हर फैसले ने राजनीतिक परंपराओं को चुनौती दी और लोकतांत्रिक जवाबदेही को नई ऊंचाई दी।

मुख्य बातें

एपीजे अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम, तमिलनाडु में हुआ; वे 25 जुलाई 2002 को भारत के 11वें राष्ट्रपति बने।
उन्होंने 2006 में अनुच्छेद 111 के तहत 'ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल' को पुनर्विचार के लिए संसद को वापस लौटाया — स्वतंत्र संवैधानिक शक्ति का दुर्लभ उदाहरण।
1998 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्री पद के प्रस्ताव को कलाम ने अस्वीकार कर दिया था।
फरवरी 2004 में लोकसभा भंग करने की वाजपेयी की सिफारिश पर कलाम ने तत्काल स्वीकृति नहीं दी; अटॉर्नी-जनरल सोली सोराबजी से परामर्श के बाद निर्णय लिया।
उन्होंने अनुच्छेद 103(2) के तहत वाम मोर्चे के 11 सांसदों सहित कई अयोग्यता याचिकाएँ चुनाव आयोग को भेजने में सक्रिय रुचि दिखाई।

एपीजे अब्दुल कलाम — 'भारत रत्न' और 'मिसाइल मैन' — को दुनिया भर में एक असाधारण वैज्ञानिक के रूप में जाना जाता है। लेकिन 25 जुलाई 2002 से 25 जुलाई 2007 तक भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में उनके कार्यकाल में उन्होंने जो संवैधानिक साहस दिखाया, वह अक्सर चर्चा से बाहर रह जाता है। बिना किसी राजनीतिक या कानूनी पृष्ठभूमि के राष्ट्रपति भवन पहुँचे कलाम ने यह साबित कर दिया कि संवैधानिक प्रमुख महज 'रबर स्टैम्प' नहीं होता।

कौन थे एपीजे अब्दुल कलाम

15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में जन्मे अवुल पकीर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम ने अपना जीवन विज्ञान और रक्षा अनुसंधान को समर्पित किया। उनके नेतृत्व में भारत परमाणु हथियार-संपन्न राष्ट्र बना और 'मिसाइल मैन' की उपाधि उन्हें उनके अदम्य योगदान के लिए मिली। उनकी न कोई राजनीतिक संबद्धता थी, न कानूनी पृष्ठभूमि — और यही उनकी ताकत बनी।

ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल: अनुच्छेद 111 का ऐतिहासिक उपयोग

कलाम के राष्ट्रपतित्व का सबसे चर्चित संवैधानिक प्रसंग 'ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल' से जुड़ा है। 2006 में अलग-अलग दलों के 43 सांसदों और राज्य विधानसभाओं के 200 से अधिक सदस्यों की संसदीय सदस्यता पर अयोग्यता की तलवार लटक रही थी। तत्कालीन कानून मंत्री एचआर भारद्वाज पर सभी दलों की ओर से जल्दबाजी में बिल का मसौदा तैयार करने का दबाव था। अयोग्यता निवारण अधिनियम 1959 में संशोधन किया गया और बिल संसद के पिछले सत्र में पारित कर दिया गया।

25 मई को कलाम के पास यह बिल पहुँचा। संवैधानिक विशेषज्ञों से विस्तृत विचार-विमर्श के बाद उन्होंने अपनी सहमति देने से इनकार कर दिया और संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत बिल को पुनर्विचार के लिए 30 मई को संसद को वापस लौटा दिया। यह राष्ट्रपति की ओर से स्वतंत्र संवैधानिक शक्ति के प्रयोग का एक दुर्लभ उदाहरण था — जो आधुनिक भारतीय संसदीय इतिहास में बहुत कम देखने को मिला है।

वाजपेयी के प्रस्तावों पर कलाम का स्वतंत्र रुख

यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि एपीजे अब्दुल कलाम और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच गहरे व्यक्तिगत संबंध थे। फिर भी कलाम ने कभी भी इन संबंधों को अपने संवैधानिक कर्तव्यों पर हावी नहीं होने दिया। 1998 में वाजपेयी ने उन्हें अपनी एनडीए सरकार में मंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसे कलाम ने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। उन्होंने इस प्रसंग का उल्लेख अपनी पुस्तक 'टर्निंग पॉइंट्स: ए जर्नी थ्रू चैलेंजेज' में किया है।

इसके अलावा, फरवरी 2004 में लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने से छह महीने पहले उसे भंग करने की वाजपेयी की सिफारिश पर भी कलाम ने तत्काल स्वीकृति नहीं दी। लेखों में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने सिफारिश पर गहन विचार किया, तत्कालीन अटॉर्नी-जनरल सोली सोराबजी से परामर्श लिया और राष्ट्रपति की शक्तियों से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का अध्ययन किया। इससे पहले कोई भी राष्ट्रपति अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को इतनी गंभीरता से नहीं निभाता था।

चुनाव आयोग और अयोग्यता के मामले

2006 में राष्ट्रपति को सौंपी गई कई याचिकाओं में सत्ताधारी वर्ग के प्रभावशाली प्रतिनिधियों — जिनमें वाम मोर्चे के 11 सांसद भी शामिल थे — की विधायी सदस्यता को चुनौती दी गई थी। कलाम ने संविधान के अनुच्छेद 103(2) के तहत इन मामलों को चुनाव आयोग को संदर्भित करने में सक्रिय रुचि दिखाई। यह रवैया बताता है कि वे संवैधानिक प्रक्रियाओं को राजनीतिक दबाव से ऊपर रखते थे।

कलाम की विरासत: एक नई परंपरा

कलाम ने साबित किया कि राष्ट्रपति पद केवल औपचारिक अनुमोदन की भूमिका नहीं है — यह एक स्वतंत्र संवैधानिक विवेक की माँग करता है। उनकी वैज्ञानिक सोच, जो हर प्रश्न को तथ्यों और तर्कों की कसौटी पर परखती थी, ने उन्हें एक ऐसे राष्ट्रपति बनाया जिसने राजनीतिक परंपराओं को चुनौती दी और लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत किया। आज उनकी जयंती पर उनके इन कम-चर्चित लेकिन दूरगामी फैसलों को याद करना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वही कलाम की सबसे बड़ी ताकत क्यों बनी — क्योंकि उन पर किसी दल का कर्ज नहीं था। भारतीय संसदीय लोकतंत्र को कलाम-शैली के संवैधानिक विवेक की आज भी उतनी ही ज़रूरत है।
RashtraPress
14 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एपीजे अब्दुल कलाम भारत के राष्ट्रपति कब बने थे?
एपीजे अब्दुल कलाम 25 जुलाई 2002 को भारत के 11वें राष्ट्रपति बने और 25 जुलाई 2007 तक इस पद पर रहे। वे बिना किसी राजनीतिक या कानूनी पृष्ठभूमि के इस सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुँचने वाले अनूठे व्यक्तित्व थे।
ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल पर कलाम ने क्या किया था?
2006 में कलाम ने संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत 'ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल' को अपनी सहमति देने से इनकार करते हुए 30 मई को पुनर्विचार के लिए संसद को वापस लौटा दिया। संवैधानिक विशेषज्ञों से विस्तृत मंत्रणा के बाद लिया गया यह फैसला राष्ट्रपति की स्वतंत्र संवैधानिक शक्ति के प्रयोग का दुर्लभ उदाहरण बना।
कलाम ने अटल बिहारी वाजपेयी का मंत्री पद का प्रस्ताव क्यों ठुकराया?
1998 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एनडीए सरकार में कलाम को मंत्री पद का प्रस्ताव दिया था, जिसे कलाम ने अस्वीकार कर दिया। कलाम ने इसका उल्लेख अपनी पुस्तक 'टर्निंग पॉइंट्स: ए जर्नी थ्रू चैलेंजेज' में किया है; चार साल बाद वे राष्ट्रपति बने।
लोकसभा भंग करने की सिफारिश पर कलाम ने क्या रुख अपनाया था?
फरवरी 2004 में जब वाजपेयी ने लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने से छह महीने पहले उसे भंग करने की सिफारिश की, तो कलाम ने तत्काल स्वीकृति नहीं दी। लेखों के अनुसार उन्होंने तत्कालीन अटॉर्नी-जनरल सोली सोराबजी से परामर्श किया और सर्वोच्च न्यायालय के संबंधित निर्णयों का अध्ययन करने के बाद ही निर्णय लिया।
एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती कब है और उनका जन्म कहाँ हुआ था?
एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती 15 अक्टूबर को मनाई जाती है। उनका जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ था। भारत सरकार उनकी जयंती को 'विश्व छात्र दिवस' के रूप में मनाती है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 महीने पहले
  2. 2 महीने पहले
  3. 2 महीने पहले
  4. 9 महीने पहले
  5. 12 महीने पहले
  6. 12 महीने पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले