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कांग्रेस सांसद का बयान: अरावली केवल पहाड़ नहीं, यह सुरक्षा की दीवार भी है

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कांग्रेस सांसद का बयान: अरावली केवल पहाड़ नहीं, यह सुरक्षा की दीवार भी है

सारांश

कांग्रेस सांसद नीरज डांगी ने राज्यसभा में अरावली पर्वत श्रृंखला के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह सुरक्षा की दीवार का काम भी करती है।

मुख्य बातें

अरावली पर्वत श्रृंखला का संरक्षण आवश्यक है।
यह विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन का प्रतीक है।
अवैध खनन के कारण कई पहाड़ियां गायब हो चुकी हैं।
भूजल रिचार्ज के लिए छोटी पहाड़ियों का भी महत्व है।
सुप्रीम कोर्ट ने संरक्षण के लिए नई परिभाषा तय करने का निर्देश दिया है।

नई दिल्ली, 10 मार्च (राष्ट्र प्रेस) राज्यसभा में पर्यावरण वन एवं जलवायु मंत्रालय की गतिविधियों पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद नीरज डांगी ने कहा कि मंत्रालय को विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने में कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि बुनियादी ढांचे के लिए जंगलों का अत्यधिक उपयोग, आदिवासियों के अधिकारों का कार्यान्वयन में धीमी प्रगति, और जंगल की आग एवं जलवायु परिवर्तन का बढ़ता खतरा महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। डांगी ने इस मौके पर अरावली पर्वत श्रृंखला के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह पर्वत श्रृंखला दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है।

अरावली लगभग 2 अरब वर्ष पुरानी है और इसकी लंबाई लगभग 670 किलोमीटर है। यह पर्वत श्रृंखला गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है। इसका महत्व केवल पहाड़ के रूप में नहीं है, बल्कि यह थार रेगिस्तान और उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों के बीच एक प्राकृतिक दीवार का काम करती है। यह मानसून को रोककर बारिश में सहायता करती है और चट्टानें भूजल रिचार्ज करने में मदद करती हैं, साथ ही धूल भरी आंधियों को भी रोकती हैं।

नीरज डांगी ने चेतावनी दी कि यदि अरावली का विनाश होता है, तो पूर्वी राजस्थान में बारिश की मात्रा कम हो सकती है और खेती प्रभावित होगी। भूजल स्तर में गिरावट आ सकती है और धूल भरी आंधियां दिल्ली तक पहुंच सकती हैं। उन्होंने उल्लेख किया कि 2018 में एक सरकारी समिति ने पाया कि 128 पहाड़ियों में से 31 पहाड़ियां गायब हो चुकी हैं और इसका मुख्य कारण अवैध खनन है।

डांगी ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने मई 2024 में निर्देश दिया था कि अरावली की एक समान परिभाषा तय की जाए ताकि संरक्षण स्पष्ट हो सके, जिसके लिए एक समिति का गठन किया गया। उन्होंने कहा कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने पहले से एक परिभाषा दी थी, जिसमें पूरी पर्वत श्रृंखला को एक इकाई मानकर संरक्षण की बात की गई थी। लेकिन समिति ने नई सिफारिश दी कि केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भू-आकृतियों को ही अरावली माना जाए।

राजस्थान में मैप की गई 12,081 पहाड़ी संरचनाओं में से केवल 1048 (लगभग 8.7 प्रतिशत) ही इस परिभाषा में आती हैं। बाकी 90 प्रतिशत से अधिक पहाड़ियां संरक्षण से बाहर हो जाती हैं, जिससे वहां खनन की संभावनाएं बनती हैं।

डांगी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में एमिकस क्यूरी ने बताया कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की विस्तृत रिपोर्ट दबा दी गई थी, जिसमें कहा गया था कि छोटी पहाड़ियां भी पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण हैं। उन पहाड़ियों की घाटियां प्रति हेक्टेयर लगभग 20 लाख लीटर भूजल रिचार्ज कर सकती हैं।

डांगी ने सवाल उठाया कि क्या पर्यावरण मंत्रालय ने अपनी ही संस्था की रिपोर्ट दबा दी और क्या सुप्रीम कोर्ट को गलत जानकारी प्रदान की गई।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक मुद्दा भी है।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अरावली पर्वत श्रृंखला का महत्व क्या है?
अरावली पर्वत श्रृंखला न केवल प्राकृतिक दीवार का कार्य करती है, बल्कि यह बारिश में मदद करती है और भूजल रिचार्ज करने में सहायक है।
अरावली का विनाश किस प्रकार के प्रभाव डाल सकता है?
यदि अरावली का विनाश होता है, तो पूर्वी राजस्थान में बारिश की मात्रा कम हो सकती है और खेती प्रभावित हो सकती है।
क्या अरावली के संरक्षण के लिए कोई पहल की गई है?
हाँ, सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की एक समान परिभाषा तय करने के लिए एक समिति का गठन किया है।
अवैध खनन का क्या प्रभाव है?
अवैध खनन के कारण कई पहाड़ियां गायब हो चुकी हैं, जो पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा है।
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में क्या बताया गया है?
रिपोर्ट में कहा गया है कि छोटी पहाड़ियां भी पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण हैं और उनकी घाटियां भूजल रिचार्ज कर सकती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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