क्या असम की गणतंत्र दिवस झांकी धुबरी के अशारिकांडी की टेराकोटा विरासत और आत्मनिर्भरता का जश्न मनाएगी?

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क्या असम की गणतंत्र दिवस झांकी धुबरी के अशारिकांडी की टेराकोटा विरासत और आत्मनिर्भरता का जश्न मनाएगी?

सारांश

असम की गणतंत्र दिवस झांकी इस बार धुबरी के अशारिकांडी की टेराकोटा विरासत का जश्न मनाने जा रही है। यह झांकी आत्मनिर्भरता की भावना को प्रदर्शित करती है। धुबरी का यह शिल्प गांव अपनी अद्भुत कलाकारी के लिए प्रसिद्ध है। जानें इस झांकी के प्रमुख आकर्षण और सांस्कृतिक महत्व के बारे में।

Key Takeaways

  • अशारिकांडी की टेराकोटा विरासत असम की सांस्कृतिक पहचान है।
  • गणतंत्र दिवस झांकी में आत्मनिर्भरता का संदेश है।
  • टेराकोटा कला कारीगरों का सामूहिक प्रयास है।
  • 19वीं सदी से चली आ रही इस कला ने असम को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

दिसपुर, 22 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। असम की गणतंत्र दिवस झांकी इस वर्ष धुबरी जिले के प्रसिद्ध शिल्प गांव अशारिकांडी की टेराकोटा विरासत को समर्पित की जाएगी। यह झांकी कर्तव्य पथ पर 26 जनवरी को प्रदर्शित की जाएगी। नई दिल्ली के राष्ट्रीय रंगशाला कैंप में गुरुवार को इसकी झलक मीडियाकर्मियों को दिखाई गई। इस अवसर पर असम सरकार के सांस्कृतिक मामलों के विभाग के अधिकारी और नोडल अधिकारी बिक्रम नेवार उपस्थित थे।

झांकी का मुख्य आकर्षण एक ऊंची टेराकोटा गुड़िया है, जो गोलाकार पैटर्न में मिट्टी के दीये थामे हुए है। यह प्रकाश, निरंतरता और परंपरा का प्रतीक बनकर झांकी का केंद्र बिंदु बनी हुई है। ट्रैक्टर पर लगे ढांचे की दोनों तरफ बांस की बाड़ लगाई गई है, जिसमें मिट्टी के सराई (बर्तन) सजाए गए हैं। यह असम के प्रचुर बांस संसाधनों और उनके सामाजिक-आर्थिक योगदान को दर्शाता है।

झांकी का पिछला हिस्सा मयूरपंखी नाव के रूप में तैयार किया गया है, जो असम की समृद्ध नदी संस्कृति को जीवंत रूप से प्रस्तुत करता है। कारीगरों को मिट्टी (हीरामाटी) से गणेश, कार्तिक, दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाते हुए दिखाया गया है। यह टेराकोटा शिल्प की जीवंत प्रक्रिया को उजागर करता है। नाव के पीछे पारंपरिक पाल (कपड़ा) लगा है, जो असम के सांस्कृतिक जीवन में नदियों की महत्वपूर्ण भूमिका को और मजबूत करता है।

यह झांकी आत्मनिर्भर भारत की भावना पर आधारित है। अशारिकांडी को सांस्कृतिक उद्यमिता के जरिए आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताया गया है। यह गांव दिखाता है कि सदियों पुराने कौशल को संरक्षित रखकर और नई शैली में पेश करके आजीविका चलाई जा सकती है तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।

अशारिकांडी को असम में सबसे बड़ा टेराकोटा और मिट्टी के बर्तन शिल्प क्लस्टर माना जाता है। धुबरी जिले में बसा यह गांव कई कारीगर परिवारों का घर है, जो एक सदी से अधिक समय से यह कला संभाल रहे हैं। यहां पुत्तोला कहे जाने वाले टेराकोटा खिलौने और मूर्तियां बनती हैं, जैसे हातिमा गुड़िया, गणेश, कार्तिक, मां दुर्गा आदि। ये लोक कला और धार्मिक प्रतीकों का सुंदर मिश्रण हैं।

इस परंपरा की शुरुआत 19वीं सदी में हुई, जब मिट्टी के बर्तन बनाने वाले परिवार पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से आकर यहां बसे। उन्होंने अपने पुराने कौशल को बनाए रखा और स्थानीय प्रभाव से असम की खास टेराकोटा शैली विकसित की। स्वर्गीय सरला बाला देवी ने इस गांव को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। 1982 में उन्हें हाथिमा गुड़िया (एक महिला की मूर्ति जो बच्चे को गोद में लिए है) के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, जो अब गांव का प्रतीक है।

मार्च 2024 में धुबरी जिले के टेराकोटा शिल्प को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग मिला, जिससे यह असम का छठा जीआई-टैग प्राप्त पारंपरिक शिल्प बन गया। यह टैग इसकी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आर्थिक अहमियत को और बढ़ाता है। असम की इस झांकी से अशारिकांडी की कलात्मक विरासत और उसके कारीगरों की आत्मनिर्भरता की भावना राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचेगी। यह असम की सांस्कृतिक धरोहर और ग्रामीण कारीगरों के योगदान का जश्न है।

Point of View

बल्कि आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक मजबूत संदेश देता है। इस तरह की पहलें देश की विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि को उजागर करने में मदद करती हैं।
NationPress
22/01/2026

Frequently Asked Questions

अशारिकांडी क्या है?
अशारिकांडी धुबरी जिले का एक प्रसिद्ध शिल्प गांव है, जो टेराकोटा कला के लिए जाना जाता है।
गणतंत्र दिवस झांकी में क्या दिखाया जाएगा?
इस बार झांकी में अशारिकांडी की टेराकोटा विरासत और आत्मनिर्भरता का जश्न मनाया जाएगा।
अशारिकांडी का सांस्कृतिक महत्व क्या है?
यह गांव टेराकोटा शिल्प के लिए एक प्रमुख केंद्र है और यहां के कारीगरों की कला सदियों पुरानी परंपराओं को जीवित रखती है।
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