बैसाखी: खुशियों का त्योहार और इतिहास की गवाह
सारांश
Key Takeaways
- बैसाखी का त्योहार फसल की कटाई का प्रतीक है।
- यह खालसा पंथ की स्थापना का दिन है।
- बैसाखी को विभिन्न नामों से मनाया जाता है जैसे पुथंडु और पोइला बैसाख।
- इस दिन आयोजित कार्यक्रमों में कीर्तन और लंगर शामिल हैं।
- बैसाखी भारतीय संस्कृति की समृद्धि का प्रतीक है।
नई दिल्ली, १३ अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारत एक समृद्ध संस्कृति, परंपरा, आस्था और विविधता का देश है। विभिन्न भाषाओं और बोलियों वाले इस अद्भुत देश में कई प्रकार के त्योहार मनाए जाते हैं, जिन्हें विशेष परिस्थितियों, वातावरण और समय के अनुसार उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। ऐसे ही त्योहारों में से मैं भी एक हूं... मैं बैसाखी हूं। क्योंकि मेरा अस्तित्व बैसाख के महीने में छिपा है, इसलिए मुझे बैसाखी के रूप में मनाया जाता है, जो वैसाखी का एक रूपांतर है।
यद्यपि त्योहार का अर्थ खुशियों और उत्साह से जुड़ा है, यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे फसल (रबी) की कटाई के अवसर पर मनाया जाता है, जो देश के अन्नदाता की मेहनत का प्रतीक है। भारत एक कृषि प्रधान देश है और एक किसान अपने परिश्रम से तैयार की गई फसल के पकने का सालभर इंतजार करता है। ऐसे में फसल की कटाई के समय उसका मनोदशा क्या होती है, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। खेतों में सुनहरी गेहूं की बालियों को देखकर किसान अपनी सारी मेहनत को भूलकर मन में मुस्कुराता है... बस मैं उसकी इस उमंग और उत्साह की अभिव्यक्ति हूं।
चूंकि मैं कृषि श्रमिकों की समृद्धि से जुड़ी हूं, मुझे पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में पूरे जोश के साथ मनाए जाने का गर्व प्राप्त है, लेकिन देश के विभिन्न हिस्सों में मुझे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। तमिलनाडु में मैं पुथंडु के नाम से जानी जाती हूं, जो नव वर्ष और समृद्धि का प्रतीक है, वहीं बंगाल में मुझे पोइला बैसाख के नाम से मनाया जाता है, जो नई शुरुआत और उत्सव का प्रतीक है।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से, मैं ही वह त्योहार हूं जिसके पावन दिन पंजाब में खालसा पंथ की स्थापना हुई। यह वह समय था जब देश मुगलों के द्वारा दिए गए घावों से कराह रहा था। कट्टरपंथियों द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न के कारण इज्जत और जीवन का कोई सुरक्षात्मक ठिकाना नहीं था। इस स्थिति के खिलाफ सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने १६९९ में खालसा पंथ की स्थापना की। यह सोचकर मेरा सीना गर्व से चौड़ा होता है कि सिख इतिहास में इस घटना को एक क्रांतिकारी मोड़ के रूप में देखा जाता है, जिसने बुराई के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान दिया और सिखों को एक नई पहचान दी। इसलिए मुझे खालसा पंथ के स्थापना दिवस के रूप में भी याद किया जाता है। इस दिन गुरुद्वारों में कीर्तन, अरदास और लंगर का आयोजन होते हैं, जिससे मेरी आत्मा को शांति मिलती है।
हालांकि, मैं कुछ ऐसी घटनाओं की गवाह भी हूं, जिनके बारे में सोचकर मेरा दिल आज भी दुख से भर जाता है। १३ अप्रैल १९१९ की घटना मैं कैसे भूल सकती हूं, जब अंग्रेजी हुकूमत द्वारा मेरा मान-मर्दन किया गया? अमृतसर के जलियांवाला बाग में डायर की गोलियों की आवाज आज भी मेरी आत्मा को कंपा देती है।
उस घटना के बाद मेरी गोद में पड़े सैकड़ों लोगों के शवों का बोझ मैं आज तक ढो रही हूं। यह विभत्स घटना मेरे अस्तित्व से जुड़ी है। यही कारण है कि जब-जब जलियांवाला बाग नरसंहार का जिक्र आता है, तो मेरा दुख मेरी आंखों से आंसू बनकर बहने लगता है।
लेकिन अपने अस्तित्व और पहचान से जुड़ी इन खट्टी-मिठी यादों के साथ, मैं हर क्षण भारतवासियों की खुशियों और समृद्धि की कामना करती हूं। इस देश के हर व्यक्ति की हंसी मेरे चेहरे पर मुस्कान लाती है। इसलिए हे जम्बूद्वीप...हे आर्यवर्त...हे भारतवर्ष, तेरी भूमि ऐसे पकी फसलों से लहलाती रहे, तेरा आकाश हमेशा खुशियों के बादल बरसाता रहे...तेरे छतनार वृक्ष हमेशा रसदार फलों से लदे रहें, बस यही मेरी कामना है।