बीपीएससी 70वीं परीक्षा में 999वीं रैंक: बक्सर की पूजा कुमारी बनीं डीएसपी, 7 साल की मेहनत लाई रंग
सारांश
मुख्य बातें
बिहार के बक्सर जिले के केसठ गांव की पूजा कुमारी ने 70वीं बीपीएससी परीक्षा में 999वीं रैंक हासिल कर डीएसपी (उप पुलिस अधीक्षक) पद पर चयन पाया है। सात-आठ वर्षों की अथक मेहनत और छह बार की असफलता के बाद मिली यह सफलता प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लाखों छात्रों के लिए एक जीवंत प्रेरणा बन गई है।
संघर्ष की लंबी राह
पूजा ने बताया कि उन्होंने डीएसपी पद के लिए लगभग 7 से 8 वर्षों तक तैयारी की। इस दौरान असफलताओं का सिलसिला लंबा रहा — 64वीं बीपीएससी में वे इंटरव्यू तक पहुंचीं, परंतु अंतिम चयन नहीं हो सका। 65वीं बीपीएससी में प्रारंभिक परीक्षा (प्रीलिम्स) ही पार नहीं हुई। 66वीं बीपीएससी में मुख्य परीक्षा (मेन्स) दी, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके बाद लगातार तीन परीक्षाओं में प्रीलिम्स में ही रुकना पड़ा।
इसके अलावा उन्होंने यूपीएससी की तैयारी भी की, लेकिन वहाँ भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिला। बावजूद इसके, पूजा ने हार नहीं मानी और अंततः 70वीं बीपीएससी परीक्षा में 999वीं रैंक के साथ डीएसपी पद सुनिश्चित किया।
पारिवारिक पृष्ठभूमि और शैक्षणिक सफर
पूजा के पिता किसान हैं और माता गृहिणी हैं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा जवाहर नवोदय विद्यालय, कैमूर से प्राप्त की। इसके बाद इग्नू (IGNOU) से स्नातक (बीए) पूरा किया। उन्होंने कोचिंग संस्थानों पर निर्भर रहने की बजाय स्व-अध्ययन को प्राथमिकता दी, जो उनकी रणनीति का केंद्रीय स्तंभ रहा।
पूजा ने बताया कि परीक्षा के दौरान उनके माता-पिता, बहन और भाई ने हर कठिन घड़ी में साथ दिया। परिवार का यह अटूट प्रोत्साहन ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
सफलता का मूलमंत्र: पूजा की रणनीति
छात्रों को सलाह देते हुए पूजा कुमारी ने कहा, 'कभी उम्मीद न छोड़ें। एनसीईआरटी की किताबें बेसिक्स के लिए बहुत ज़रूरी हैं। पॉलिटी के लिए लक्ष्मीकांत और भूगोल के लिए भास्कर भड़वाल की किताब पढ़ें। पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र अवश्य हल करें। करंट अफेयर्स पर बहुत ज़्यादा समय न लगाएं — रोज़ एक घंटा पर्याप्त है।'
उन्होंने यह भी कहा कि 'परीक्षा का परिणाम कैसा आया, यह देखकर सफर को रोकना नहीं चाहिए, क्योंकि जो रुक गया उसका विकास नहीं होगा — चलने वाले ही विकास कर पाते हैं।'
गांव में उत्सव का माहौल
पूजा की सफलता की खबर फैलते ही केसठ गांव में खुशी की लहर दौड़ गई। परिवार और ग्रामीण अब अपनी बेटियों को पूजा जैसा बनाने के सपने देख रहे हैं। यह सफलता उस सोच को भी चुनौती देती है जो मानती है कि ग्रामीण पृष्ठभूमि और सीमित संसाधन प्रतियोगी परीक्षाओं में आड़े आते हैं।
गौरतलब है कि बिहार में ग्रामीण क्षेत्रों से बीपीएससी में सफल होने वाले अभ्यर्थियों की संख्या हर साल बढ़ रही है, और पूजा जैसी कहानियाँ इस प्रवृत्ति को और गति देती हैं। उनकी यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ संकल्प और परिवार का साथ किसी भी बाधा को पार करने में सक्षम है।