केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया, सबरीमाला की पाबंदियां लिंग-भेद पर नहीं
सारांश
Key Takeaways
- सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की सुनवाई चल रही है।
- केंद्र सरकार का कहना है कि पाबंदियां लिंग-भेद पर नहीं हैं।
- धार्मिक परंपराएं विभिन्न मंदिरों में अलग-अलग लागू होती हैं।
- अगली सुनवाई 14 अप्रैल को होगी।
- सामाजिक बंटवारे की चेतावनी दी गई है।
नई दिल्ली, 9 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में दोहराया कि सबरीमाला मंदिर में लागू पाबंदियां लिंग-भेद पर आधारित नहीं हैं। सरकार ने तर्क दिया कि भारतभर में कई ऐसे मंदिर हैं, जहाँ आस्था और परंपरा के अनुसार ऐसी प्रथाएं प्रचलित हैं जो या तो पुरुषों पर केंद्रित हैं या फिर महिलाओं पर।
सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने यह बताया कि 2018 का वह निर्णय, जिसमें सबरीमाला मंदिर में हर आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी गई थी, एक गलत धारणा पर आधारित था कि पुरुषों को श्रेष्ठ माना गया है जबकि महिलाओं को निचले दर्जे पर रखा गया है।
उन्होंने बेंच को बताया कि कई मंदिर ऐसे हैं जहाँ पुरुषों को प्रवेश नहीं मिलता। कुछ मंदिरों में तो यह अनिवार्य है कि पुरुष पुजारी महिलाओं के पैर धोएं। पुष्कर में एक ऐसा मंदिर है, जो देश का एकमात्र ब्रह्मा मंदिर है, जहाँ शादीशुदा पुरुषों को प्रवेश की अनुमति नहीं है। केरल में भी एक मंदिर है जहाँ पुरुष महिलाओें के कपड़े पहनकर जाते हैं। इसलिए यह पुरुष या महिला-केंद्रित विश्वास का मुद्दा नहीं है। इस मामले में, यह महिला-केंद्रित है।
इस बेंच में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य बागची शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट अभी धार्मिक आजादी और मौलिक अधिकारों के बीच परस्पर संबंधों पर गहन विचार कर रहा है। सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने धार्मिक स्थलों पर सभी को शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हर किसी को हर मंदिर और मठ में जाने का अधिकार होना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि उनके विचार सबरीमाला विवाद से अलग हैं।
जस्टिस ने कहा कि यदि आप कहते हैं कि यह मेरी परंपरा है कि केवल मेरे संप्रदाय के लोग ही मेरे मंदिर में आ सकते हैं, तो यह हिंदू धर्म के लिए अच्छा नहीं है।
जस्टिस अरविंद कुमार ने चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसी रोक वाली परंपराओं से समाज में बंटवारा हो सकता है।
सीनियर वकील सी.एस. वैद्यनाथन ने इस पर कहा कि संप्रदाय-विशेष वाले मंदिरों में, खासकर निजी मंदिरों में, ऐतिहासिक रूप से कुछ विशेष समूहों के आगमन पर रोक लगी रही है। उन्होंने तर्क किया कि यदि ऐसी संस्थाएं सरकारी वित्त या आम लोगों की आवाजाही पर निर्भर नहीं हैं, तो यह आवश्यक नहीं कि वे संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करती हों।
उन्होंने कहा, "सवाल यह है कि क्या यह संवैधानिक रोक के खिलाफ है? यदि यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के खिलाफ नहीं है, तो इसके असल नतीजे क्या होंगे?"
केंद्र सरकार ने बार-बार कहा है कि 2018 के सबरीमाला निर्णय पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। सरकार का कहना है कि जिस रोक का उल्लेख किया जा रहा है, वह देवता की अनोखी विशेषता और धार्मिक परंपराओं से संबंधित है, न कि पितृसत्ता या लिंग-भेद से।
एसजी तुषार मेहता ने अपनी लिखित दलीलों में केरल के अट्टुकल मंदिर जैसे उदाहरण दिए, जहाँ कुछ विशेष रस्मों के दौरान पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। उन्होंने चक्कुलथुकावु मंदिर का भी उल्लेख किया, जहाँ पुरुष पुजारी महिला भक्तों के पैर धोते हैं। इसके अलावा, कोट्टनकुलंगारा मंदिर का भी जिक्र किया गया, जहाँ पुरुष अपनी आस्था दिखाने के लिए महिलाओं के कपड़े पहनते हैं।
सबरीमाला मामले पर अगली सुनवाई 14 अप्रैल को होगी।