तिब्बत चीन का 'शोपीस' बनकर रह गया: निर्वासित तिब्बती नेता का बड़ा खुलासा

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तिब्बत चीन का 'शोपीस' बनकर रह गया: निर्वासित तिब्बती नेता का बड़ा खुलासा

सारांश

तिब्बत के निर्वासित नेता त्सावांग गिलापो आर्य ने खुलासा किया कि 76 साल के चीनी शासन में एक भी तिब्बती पार्टी सचिव नहीं बना, दस लाख बच्चों को जबरन बोर्डिंग स्कूल भेजा जा रहा है और तिब्बती भाषा बोलने पर गिरफ्तारी होती है। चीन का लोकतंत्र का दावा खोखला है।

Key Takeaways

  • 76 वर्षों के चीनी शासन में एक भी तिब्बती को तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र का पार्टी सचिव नहीं बनाया गया।
  • दलाई लामा के प्रतिनिधि त्सावांग गिलापो आर्य ने जापानी प्रकाशन 'जापान फॉरवर्ड' में चीन के खोखले लोकतंत्र के दावों को उजागर किया।
  • लगभग दस लाख तिब्बती बच्चों को — जिनमें चार साल तक के मासूम हैं — जबरन चीनी बोर्डिंग स्कूलों में भेजा जा रहा है।
  • तिब्बती भाषा को बढ़ावा देने वालों को झूठे आरोपों में गिरफ्तार और यातना दी जाती है।
  • 1959 में दलाई लामा के साथ लगभग 80,000 तिब्बती भारत, नेपाल और भूटान में निर्वासित हुए थे।
  • चीन के मुखपत्र 'ग्लोबल टाइम्स' ने सीटीए के फरवरी 2025 चुनावों को 'संस्थागत भ्रम' बताकर खारिज किया।

टोक्यो/बीजिंग, 25 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। तिब्बत में चीन के तथाकथित लोकतांत्रिक सुधारों की कलई खुलती जा रही है। दलाई लामा के जापान और पूर्व एशिया संपर्क कार्यालय के प्रतिनिधि त्सावांग गिलापो आर्य ने जापानी प्रकाशन 'जापान फॉरवर्ड' में लिखा है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के शासन में तिब्बत एक सजा-संवरा दिखावा मात्र बनकर रह गया है — जिसकी जड़ें कट चुकी हैं और आत्मा छीन ली गई है।

76 साल के 'सुधार' और एक भी तिब्बती पार्टी सचिव नहीं

आर्य ने एक तीखा सवाल उठाया — यदि चीन सच में तिब्बत में लोकतंत्र लाया है, तो 76 वर्षों के तथाकथित लोकतांत्रिक सुधारों के बाद भी किसी तिब्बती को तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र का पार्टी सचिव क्यों नहीं बनाया गया? उन्होंने इसे निरंतर विदेशी दासता की एक कड़वी और अकाट्य सच्चाई बताया।

चीन का आधिकारिक रुख यह है कि उसने तिब्बत को सामंती गुलामी से मुक्त कर लोकतंत्र दिया। लेकिन तथ्य यह है कि तिब्बत की समस्त सत्ता आज भी हान चीनी कैडरों के हाथ में केंद्रित है।

ग्लोबल टाइम्स का निर्वासित सरकार पर हमला और आर्य का जवाब

सीसीपी के मुखपत्र 'द ग्लोबल टाइम्स' ने हाल ही में केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) के फरवरी 2025 में हुए चुनावों को 'बिना जमीन का चुनाव' और 'संस्थागत भ्रम' करार दिया था। आर्य ने इस पर पलटवार करते हुए कहा कि ऐसे बयानों को 'चीनी विशेषज्ञों की राय' के रूप में परोसा जाता है, लेकिन तिब्बती लोकतंत्र की वैश्विक स्वीकार्यता और बढ़ती पहचान इन तथाकथित विशेषज्ञों की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़ा करती है।

उल्लेखनीय है कि सीटीए के चुनावों में दुनिया भर में बसे तिब्बती शरणार्थी मतदान करते हैं और यह प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों द्वारा पारदर्शी मानी जाती है।

तिब्बत की संस्कृति और भाषा पर व्यवस्थित हमला

आर्य ने बताया कि तिब्बती मठों और ननरियों पर अब सीसीपी कैडर का सीधा नियंत्रण है। बच्चों और युवाओं को मठों में प्रवेश से रोका जा रहा है। सभी तिब्बती स्कूल बंद कर दिए गए हैं और उनकी जगह चीनी औपनिवेशिक बोर्डिंग स्कूल खोले गए हैं।

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि लगभग दस लाख तिब्बती बच्चों को — जिनमें से कई मात्र चार वर्ष की आयु के हैं — सरकार की आत्मसातीकरण नीति (Assimilation Policy) के तहत जबरन इन स्कूलों में भर्ती कराया जा रहा है, जहाँ उनकी मातृभाषा, संस्कृति और पहचान को व्यवस्थित रूप से मिटाया जा रहा है।

तिब्बती भाषा को हतोत्साहित किया जा रहा है। जो लोग अपनी भाषा को बचाने की कोशिश करते हैं, उन्हें झूठे आरोपों में गिरफ्तार कर यातना दी जाती है। इसे वैध ठहराने के लिए विशेष कानून भी बनाए गए हैं।

1959 से अब तक: निर्वासन में लोकतंत्र की यात्रा

1959 में दलाई लामा लगभग 80,000 तिब्बतियों के साथ भारत, नेपाल और भूटान में शरण लेने को विवश हुए थे। आर्य ने कहा कि 75 वर्षों से अधिक के इस संघर्ष में तिब्बतियों ने न केवल अपनी संस्कृति और पहचान को जीवित रखा, बल्कि एक जीवंत लोकतांत्रिक समुदाय का निर्माण किया जिसे आज दुनिया भर में सम्मान मिलता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि तिब्बती संघर्ष केवल तिब्बतियों की आजादी तक सीमित नहीं है — यह चीन के भीतर रहने वाले चीनी नागरिकों और अन्य जातीय अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता और गरिमा की लड़ाई भी है।

विश्लेषण: तिब्बत नीति और वैश्विक मानवाधिकार संघर्ष

यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद और कई पश्चिमी देशों की संसदों में तिब्बत में मानवाधिकार उल्लंघनों पर बहस तेज हो रही है। अमेरिका ने हाल के वर्षों में 'तिब्बत नीति और समर्थन अधिनियम' पारित कर चीन पर दबाव बढ़ाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि तिब्बत में हो रहा सांस्कृतिक विनाश उइगर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों के समान एक सुनियोजित पैटर्न का हिस्सा है।

आने वाले महीनों में दलाई लामा की उत्तराधिकार प्रक्रिया और चीन-भारत संबंध इस मुद्दे को और अधिक वैश्विक महत्व देंगे। तिब्बत का भविष्य केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि एशिया की भू-राजनीतिक स्थिरता का एक अहम आयाम बनता जा रहा है।

Point of View

लेकिन एक भी तिब्बती को पार्टी सचिव नहीं बनाया — यह विरोधाभास खुद चीन के दावों की पोल खोलता है। दस लाख बच्चों को जबरन बोर्डिंग स्कूल में डालना और भाषा पर प्रतिबंध लगाना किसी 'मुक्तिदाता' का काम नहीं, बल्कि एक सुनियोजित सांस्कृतिक नरसंहार की रणनीति है। यह वही पैटर्न है जो शिनजियांग में उइगरों के साथ अपनाया गया — और दुनिया अब इसे पहचान रही है। भारत के लिए यह मुद्दा केवल मानवाधिकार का नहीं, बल्कि अपनी उत्तरी सीमाओं की भू-राजनीतिक सुरक्षा का भी है।
NationPress
26/04/2026

Frequently Asked Questions

तिब्बत में चीन के लोकतांत्रिक सुधारों पर निर्वासित नेता ने क्या कहा?
दलाई लामा के प्रतिनिधि त्सावांग गिलापो आर्य ने कहा कि 76 साल के तथाकथित लोकतांत्रिक सुधारों के बावजूद किसी तिब्बती को तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र का पार्टी सचिव नहीं बनाया गया। उन्होंने इसे निरंतर विदेशी दासता का प्रमाण बताया।
तिब्बत में तिब्बती बच्चों के साथ क्या हो रहा है?
चीन की आत्मसातीकरण नीति के तहत लगभग दस लाख तिब्बती बच्चों को, जिनमें चार साल तक के बच्चे शामिल हैं, जबरन चीनी बोर्डिंग स्कूलों में भेजा जा रहा है। सभी तिब्बती स्कूल बंद कर दिए गए हैं और बच्चों को मठों में जाने से रोका जा रहा है।
केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (CTA) क्या है और चीन इसे क्यों खारिज करता है?
केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) दलाई लामा के नेतृत्व में भारत के धर्मशाला में स्थित निर्वासित तिब्बती सरकार है। चीन के सरकारी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने इसे 'बिना जमीन का चुनाव' और 'संस्थागत भ्रम' कहकर खारिज किया है।
तिब्बती भाषा पर चीन में क्या प्रतिबंध हैं?
तिब्बत में तिब्बती भाषा को हतोत्साहित किया जाता है और जो लोग इसे बढ़ावा देते हैं उन्हें झूठे आरोपों में गिरफ्तार कर यातना दी जाती है। इसे वैध ठहराने के लिए विशेष कानून भी बनाए गए हैं।
1959 में दलाई लामा के साथ कितने तिब्बती निर्वासन में गए थे?
1959 में दलाई लामा लगभग 80,000 तिब्बतियों के साथ भारत, नेपाल और भूटान में शरण लेने के लिए विवश हुए थे। तब से निर्वासित तिब्बती समुदाय ने एक जीवंत लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाई है जिसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल रही है।
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