उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन: भारत को शक्तिशाली बनाना लक्ष्य, किसी पर प्रभुत्व नहीं
सारांश
मुख्य बातें
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने 12 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय (NDC) के 66वें पाठ्यक्रम के प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि भारत का लक्ष्य विश्व का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बनना है — परंतु किसी देश पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई भी देश भारत पर अनैतिक शर्तें न थोप सके। उन्होंने 'भारत के मूल मूल्य, राष्ट्रीय हित और राष्ट्रीय उद्देश्य' विषय पर दिए इस संबोधन में रणनीतिक सोच, एकीकृत नीति निर्माण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की अनिवार्यता को रेखांकित किया।
संबोधन की पृष्ठभूमि और प्रतिभागी
इस कार्यक्रम में भारतीय सशस्त्र बलों, सिविल सेवाओं, पुलिस और अन्य सरकारी संगठनों के अधिकारियों सहित मित्र देशों के 41 अधिकारी भी शामिल थे — कुल मिलाकर 122 प्रतिभागी। यह ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी कूटनीतिक और सैन्य उपस्थिति को नए आयाम दे रहा है।
भारत के मूल मूल्य और 'वसुधैव कुटुंबकम'
राधाकृष्णन ने कहा कि किसी देश के मूल मूल्य ही उसकी पहचान की नींव होते हैं। उन्होंने 'वसुधैव कुटुंबकम' — अर्थात 'पूरी दुनिया एक परिवार है' — की भावना को भारत की विदेश नीति का केंद्रबिंदु बताया। उन्होंने कोविड महामारी के दौरान अन्य देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराने, आपदा राहत और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों में भारत की सक्रिय भूमिका को इस मूल्य का व्यावहारिक उदाहरण बताया।
राष्ट्रीय हित: पाँच व्यापक प्राथमिकताएँ
उपराष्ट्रपति ने भारत के राष्ट्रीय हितों को संवैधानिक मूल्यों — संप्रभुता, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व — से प्रेरित बताया। उन्होंने पाँच प्राथमिकताएँ रेखांकित कीं: (1) संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा, (2) लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और संघीय स्वरूप को बनाए रखना, (3) रणनीतिक, राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य उद्देश्यों को आगे बढ़ाना, (4) विकास के लिए स्थिर और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना, तथा (5) अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता में योगदान देना।
सुरक्षा चुनौतियाँ और वैश्विक सहयोग
राधाकृष्णन ने आतंकवाद, साइबर खतरों, महामारियों, जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय अपराध जैसी बहुआयामी चुनौतियों का उल्लेख करते हुए अधिक अंतरराष्ट्रीय सहयोग का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा और साझा वैश्विक हितों को आगे बढ़ाना प्रायः परस्पर सहायक उद्देश्य होते हैं, जिनके लिए समन्वित कार्रवाई, सूचना साझाकरण और राष्ट्रों के बीच आपसी विश्वास अनिवार्य है। गौरतलब है कि उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में भूमि, हवाई क्षेत्र, समुद्री हितों और साइबर क्षेत्र — सभी आयामों — को शामिल बताया।
विकसित भारत 2047 और वैश्विक दक्षिण से जुड़ाव
वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्रमुख राष्ट्रीय संकल्प बताते हुए उपराष्ट्रपति ने उपलब्ध संसाधनों, सुदृढ़ नीतिगत विकल्पों और दीर्घकालिक दृष्टिकोण के बीच तालमेल पर बल दिया। उन्होंने वैश्विक दक्षिण के साथ पारस्परिक सम्मान, संप्रभु समानता और साझा विकास प्राथमिकताओं के आधार पर मजबूत जुड़ाव का आह्वान किया। साथ ही उन्होंने भ्रष्टाचार को वैश्विक दक्षिण के लिए बड़ी बाधा बताते हुए इसे समाप्त करने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता जताई।
उपराष्ट्रपति ने भावी रणनीतिक नेताओं के रूप में उपस्थित प्रतिभागियों से अपील की कि वे संस्थागत सीमाओं से परे एकीकृत और दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाएँ, राष्ट्रीय संकल्पों को मूर्त परिणामों में बदलें और प्रौद्योगिकी, व्यापार, शिक्षा और नवाचार के क्षेत्रों में सहयोग को सुदृढ़ करें।