उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन बोले: सुशासन ही स्थायी समृद्धि का आधार, विधिक सुधार अनिवार्य
सारांश
मुख्य बातें
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने 22 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में भारतीय विधि आयोग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए स्पष्ट कहा कि केवल सत्ता का प्रयोग नहीं, बल्कि सुशासन ही किसी राष्ट्र की स्थायी सफलता और समृद्धि की बुनियाद है। यह सम्मेलन 'सहकारी संघवाद और विधिक सुधार: राष्ट्रीय एवं राज्य परिप्रेक्ष्य' विषय पर केंद्रित था।
भारतीय संघवाद की शक्ति
राधाकृष्णन ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता में एकता है। उन्होंने रेखांकित किया कि भारतीय संविधान केंद्र की शक्तियों और राज्यों की जिम्मेदारियों एवं वैध स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाने की रूपरेखा प्रदान करता है। उनके अनुसार, भारतीय संघवाद की वास्तविक सामर्थ्य विविधताओं का सम्मान करते हुए साझा राष्ट्रीय लक्ष्यों की ओर मिलकर काम करने में निहित है।
उपराष्ट्रपति ने यह भी स्पष्ट किया कि सहकारी संघवाद का अर्थ हर मामले में एकरूपता नहीं है — जहाँ केंद्र और राज्यों की संवैधानिक जिम्मेदारियाँ आपस में जुड़ती हैं, वहाँ समन्वय जरूरी है; लेकिन राज्यों की विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उनकी वैध स्वतंत्रताएँ भी संरक्षित रहनी चाहिए।
टीम इंडिया की परिकल्पना
सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद की अहमियत बताते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 'टीम इंडिया' की परिकल्पना केंद्र और राज्यों के बीच परामर्श, समन्वय और साझा दायित्व की भावना पर आधारित है। उन्होंने कहा कि व्यापक जनहित में मिलकर काम करने की राह में राजनीतिक मतभेदों को कभी बाधा नहीं बनने देना चाहिए।
विधिक सुधारों पर जोर
राधाकृष्णन ने विकसित भारत @2047 के लक्ष्य को पाने में विधिक सुधारों की भूमिका को अपरिहार्य बताया। उन्होंने कहा कि विकास के लिए सुदृढ़ कानूनों, पारदर्शी संस्थाओं, कुशल प्रशासन और सबके लिए न्याय का आधार जरूरी है। गौरतलब है कि पिछले बारह वर्षों में औपनिवेशिक काल के तीन प्रमुख आपराधिक कानूनों को प्रतिस्थापित किया गया और 1,700 से अधिक अप्रचलित कानूनों को निरस्त किया जा चुका है — जिसे उन्होंने आधुनिकीकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम करार दिया।
उन्होंने राज्यों के विधि आयोगों से आग्रह किया कि वे पुराने और अप्रासंगिक कानूनों की पहचान कर उन्हें संशोधित या निरस्त करने की सिफारिश करें, ताकि जीवनयापन में सुगमता और कुशल शासन को बल मिले। उन्होंने भारतीय विधि आयोग, राज्य विधि आयोगों और राज्य विधि विभागों के बीच अंतरराज्यीय परामर्श, सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों के आदान-प्रदान और पुराने कानूनों की व्यवस्थित समीक्षा के जरिए बेहतर समन्वय का आह्वान किया।
तिरुवल्लुवर और सेंगोल का संदर्भ
उपराष्ट्रपति ने संसद में स्थापित सेंगोल — जो धर्मसम्मत सत्ता और नैतिक शासन का प्रतीक माना जाता है — का उल्लेख करते हुए तमिल संत-कवि तिरुवल्लुवर की शाश्वत शिक्षाओं को याद किया। उन्होंने कहा कि तिरुवल्लुवर ने सुशासन और विधि के शासन को सर्वोच्च मानवीय मूल्य बताया था — और यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
सम्मेलन में प्रमुख उपस्थिति
इस अवसर पर केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल, भारतीय विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, सदस्य-सचिव डॉ. अंजू राठी राणा और सदस्य प्रो. डीपी वर्मा सहित अनेक विधि विशेषज्ञ उपस्थित रहे। उपराष्ट्रपति ने आशा जताई कि इस सम्मेलन से एक सुसंगत, उत्तरदायी और नागरिक-केंद्रित विधिक व्यवस्था के निर्माण की दिशा में ठोस और क्रियान्वयन योग्य सिफारिशें सामने आएंगी।