30 सितंबर 2026
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दिल्ली हाई कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न की FIR रद्द की, दंपत्ति में खुला तलाक से हुआ समझौता

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दिल्ली हाई कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न की FIR रद्द की, दंपत्ति में खुला तलाक से हुआ समझौता

सारांश

दिल्ली उच्च न्यायालय ने दहेज उत्पीड़न के एक मामले में एफआईआर रद्द कर दी, जब दंपत्ति ने साकेत मध्यस्थता केंद्र के ज़रिए सुलह की, ₹1.50 लाख का भुगतान हुआ और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत खुला तलाक लिया गया। न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा ने बीएनएसएस की धारा 528 के तहत कार्रवाई रद्द की।

मुख्य बातें

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 30 सितंबर 2026 को जामिया नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर संख्या 362/2024 रद्द की।
मामला आईपीसी की धारा 498ए, 406 और 34 (दहेज उत्पीड़न और क्रूरता) से संबंधित था।
दंपत्ति ने साकेत कोर्ट मध्यस्थता केंद्र में 7 फरवरी 2026 को लिखित समझौता किया।
याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता को ₹1.50 लाख की पूरी समझौता राशि चुकाई।
7 मार्च 2026 को मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (खुला) के तहत तलाक संपन्न हुआ।
न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा ने बीएनएसएस की धारा 528 के तहत अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग कर एफआईआर रद्द की।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 30 सितंबर 2026 को दहेज उत्पीड़न और क्रूरता के एक मामले में दर्ज एफआईआर संख्या 362/2024 को रद्द कर दिया, जब दोनों पक्षों ने साकेत कोर्ट मध्यस्थता केंद्र के ज़रिए अपने वैवाहिक विवाद का सौहार्दपूर्ण निपटारा कर लिया और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत खुला तलाक प्राप्त किया। न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा की एकल-न्यायाधीश पीठ ने पाया कि विवाद मुख्यतः निजी प्रकृति का था और इसमें कोई जनहित निहित नहीं था, इसलिए आपराधिक कार्रवाई जारी रखने का कोई औचित्य नहीं बचा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह प्रकरण मोहम्मद कासिम और उनके परिवार के सदस्यों द्वारा दायर याचिका से संबंधित था। शिकायतकर्ता और याचिकाकर्ता संख्या 1 का विवाह 11 मार्च 2023 को मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था। इस विवाह से कोई संतान नहीं हुई।

दहेज की मांग को लेकर शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के आरोपों के बाद दोनों पक्ष 28 सितंबर 2023 से अलग रहने लगे। 1 अक्टूबर 2024 को जामिया नगर पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए, 506, 406, 509, 354सी और 34 के साथ-साथ दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत एफआईआर दर्ज की गई और बाद में आरोप पत्र भी दाखिल किया गया।

मध्यस्थता और समझौते की प्रक्रिया

उच्च न्यायालय की कार्यवाही के दौरान दोनों पक्षों को साकेत कोर्ट स्थित मध्यस्थता केंद्र भेजा गया, जहाँ उन्होंने अपने विवादों का सौहार्दपूर्ण निपटारा किया। यह समझौता 7 फरवरी 2026 को लिखित रूप में दर्ज किया गया।

इसके पश्चात 7 मार्च 2026 को दोनों पक्षों ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (खुला) के अंतर्गत तलाक प्राप्त किया। याचिकाकर्ता ने समझौते के अनुसार शिकायतकर्ता को ₹1.50 लाख की पूरी समझौता राशि का भुगतान भी किया।

अदालत में शिकायतकर्ता का बयान

दोनों पक्ष दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुए। शिकायतकर्ता ने अदालत को बताया कि मामला स्वेच्छा से, बिना किसी बल, भय या दबाव के सुलझाया गया है और उसे सामान सहित पूरी समझौता राशि प्राप्त हो चुकी है। उसने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध एफआईआर रद्द किए जाने पर उसे कोई आपत्ति नहीं है।

न्यायालय का निर्णय और कानूनी आधार

न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए एफआईआर रद्द करना न्याय के हित में उचित पाया। न्यायमूर्ति दुदेजा ने अपने आदेश में कहा कि जब विवाद में कोई जनहित शामिल न हो और वह मुख्यतः निजी प्रकृति का हो, तो आपराधिक कार्रवाई जारी रखने का कोई लाभ नहीं होता।

गौरतलब है कि उच्च न्यायालय ऐसे मामलों में जहाँ पक्षकार आपसी सहमति से समझौता कर लेते हैं और शिकायतकर्ता स्वेच्छा से एफआईआर रद्द करने की सहमति देता है, बीएनएसएस की धारा 528 के तहत हस्तक्षेप करते हैं। तदनुसार, जामिया नगर पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 498ए, 406 और 34 के तहत दर्ज एफआईआर संख्या 362/2024 और उससे संबंधित सभी कार्रवाई को रद्द कर याचिका स्वीकार कर ली गई।

आगे का परिदृश्य

यह निर्णय उन वैवाहिक विवादों में मध्यस्थता की भूमिका को रेखांकित करता है जहाँ दोनों पक्ष सुलह के लिए तैयार हों। विधि विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में अदालतें तब हस्तक्षेप करती हैं जब निजी विवाद का समाधान हो चुका हो और आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायसंगत न रहे। भविष्य में इस तरह के मामलों में मध्यस्थता केंद्रों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

किंतु आलोचकों का कहना है कि धारा 498ए जैसे प्रावधान महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने हैं और वित्तीय समझौते के दबाव में एफआईआर रद्द होने से उनकी प्रभावशीलता कमज़ोर पड़ सकती है। यह ऐसे समय में आया है जब दहेज उत्पीड़न के मामलों में सज़ा दर राष्ट्रीय स्तर पर बेहद कम बनी हुई है। असली सवाल यह है कि क्या मध्यस्थता-आधारित समाधान पीड़िता की स्वेच्छा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त संस्थागत जाँच के साथ आते हैं — इस मामले में शिकायतकर्ता ने स्वयं सहमति दी, लेकिन हर मामले में यह स्थिति नहीं होती।
RashtraPress
30 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिल्ली हाई कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न की यह FIR क्यों रद्द की?
दिल्ली उच्च न्यायालय ने एफआईआर इसलिए रद्द की क्योंकि दोनों पक्षों ने साकेत कोर्ट मध्यस्थता केंद्र के ज़रिए अपने विवाद का सौहार्दपूर्ण निपटारा कर लिया था और शिकायतकर्ता ने स्वेच्छा से एफआईआर रद्द करने की सहमति दी। न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा ने पाया कि विवाद निजी प्रकृति का था और इसमें कोई जनहित नहीं था, इसलिए आपराधिक कार्रवाई जारी रखना उचित नहीं था।
इस मामले में समझौते की शर्तें क्या थीं?
समझौते के तहत याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता को ₹1.50 लाख की पूरी समझौता राशि और सामान लौटाया। इसके अलावा 7 मार्च 2026 को मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (खुला) के अंतर्गत तलाक भी संपन्न हुआ।
खुला तलाक क्या होता है और यह मामले से कैसे जुड़ा है?
खुला मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत तलाक का वह प्रकार है जिसमें पत्नी की पहल पर विवाह विच्छेद होता है। इस मामले में दोनों पक्षों ने 7 मार्च 2026 को आपसी सहमति से खुला के ज़रिए तलाक लिया, जो समझौते का एक अनिवार्य हिस्सा था।
बीएनएसएस की धारा 528 के तहत अदालत को FIR रद्द करने का अधिकार कैसे मिलता है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 उच्च न्यायालय को अंतर्निहित शक्तियाँ देती है, जिनका उपयोग न्याय के हित में किया जा सकता है। जब विवाद निजी प्रकृति का हो, पक्षकार सुलह कर चुके हों और आपराधिक कार्यवाही जारी रखने से कोई सार्वजनिक हित न जुड़ा हो, तो अदालत इन शक्तियों का प्रयोग कर एफआईआर रद्द कर सकती है।
इस मामले में धारा 498ए के तहत क्या आरोप लगाए गए थे?
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि दहेज की मांग को लेकर उसे शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। 1 अक्टूबर 2024 को जामिया नगर पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 498ए, 506, 406, 509, 354सी, 34 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 व 4 के तहत एफआईआर दर्ज हुई थी।
राष्ट्र प्रेस
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