दिल्ली हाई कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न की FIR रद्द की, दंपत्ति में खुला तलाक से हुआ समझौता
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 30 सितंबर 2026 को दहेज उत्पीड़न और क्रूरता के एक मामले में दर्ज एफआईआर संख्या 362/2024 को रद्द कर दिया, जब दोनों पक्षों ने साकेत कोर्ट मध्यस्थता केंद्र के ज़रिए अपने वैवाहिक विवाद का सौहार्दपूर्ण निपटारा कर लिया और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत खुला तलाक प्राप्त किया। न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा की एकल-न्यायाधीश पीठ ने पाया कि विवाद मुख्यतः निजी प्रकृति का था और इसमें कोई जनहित निहित नहीं था, इसलिए आपराधिक कार्रवाई जारी रखने का कोई औचित्य नहीं बचा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह प्रकरण मोहम्मद कासिम और उनके परिवार के सदस्यों द्वारा दायर याचिका से संबंधित था। शिकायतकर्ता और याचिकाकर्ता संख्या 1 का विवाह 11 मार्च 2023 को मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था। इस विवाह से कोई संतान नहीं हुई।
दहेज की मांग को लेकर शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के आरोपों के बाद दोनों पक्ष 28 सितंबर 2023 से अलग रहने लगे। 1 अक्टूबर 2024 को जामिया नगर पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए, 506, 406, 509, 354सी और 34 के साथ-साथ दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत एफआईआर दर्ज की गई और बाद में आरोप पत्र भी दाखिल किया गया।
मध्यस्थता और समझौते की प्रक्रिया
उच्च न्यायालय की कार्यवाही के दौरान दोनों पक्षों को साकेत कोर्ट स्थित मध्यस्थता केंद्र भेजा गया, जहाँ उन्होंने अपने विवादों का सौहार्दपूर्ण निपटारा किया। यह समझौता 7 फरवरी 2026 को लिखित रूप में दर्ज किया गया।
इसके पश्चात 7 मार्च 2026 को दोनों पक्षों ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (खुला) के अंतर्गत तलाक प्राप्त किया। याचिकाकर्ता ने समझौते के अनुसार शिकायतकर्ता को ₹1.50 लाख की पूरी समझौता राशि का भुगतान भी किया।
अदालत में शिकायतकर्ता का बयान
दोनों पक्ष दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुए। शिकायतकर्ता ने अदालत को बताया कि मामला स्वेच्छा से, बिना किसी बल, भय या दबाव के सुलझाया गया है और उसे सामान सहित पूरी समझौता राशि प्राप्त हो चुकी है। उसने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध एफआईआर रद्द किए जाने पर उसे कोई आपत्ति नहीं है।
न्यायालय का निर्णय और कानूनी आधार
न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए एफआईआर रद्द करना न्याय के हित में उचित पाया। न्यायमूर्ति दुदेजा ने अपने आदेश में कहा कि जब विवाद में कोई जनहित शामिल न हो और वह मुख्यतः निजी प्रकृति का हो, तो आपराधिक कार्रवाई जारी रखने का कोई लाभ नहीं होता।
गौरतलब है कि उच्च न्यायालय ऐसे मामलों में जहाँ पक्षकार आपसी सहमति से समझौता कर लेते हैं और शिकायतकर्ता स्वेच्छा से एफआईआर रद्द करने की सहमति देता है, बीएनएसएस की धारा 528 के तहत हस्तक्षेप करते हैं। तदनुसार, जामिया नगर पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 498ए, 406 और 34 के तहत दर्ज एफआईआर संख्या 362/2024 और उससे संबंधित सभी कार्रवाई को रद्द कर याचिका स्वीकार कर ली गई।
आगे का परिदृश्य
यह निर्णय उन वैवाहिक विवादों में मध्यस्थता की भूमिका को रेखांकित करता है जहाँ दोनों पक्ष सुलह के लिए तैयार हों। विधि विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में अदालतें तब हस्तक्षेप करती हैं जब निजी विवाद का समाधान हो चुका हो और आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायसंगत न रहे। भविष्य में इस तरह के मामलों में मध्यस्थता केंद्रों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने की संभावना है।