मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला: फतवे के आधार पर तलाक की घोषणा मान्य नहीं
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 6 अगस्त 2026 को स्पष्ट किया कि किसी मदरसे या धार्मिक संस्थान द्वारा जारी फतवा तलाक की वैध घोषणा का आधार नहीं बन सकता। जस्टिस विवेक जैन की एकल-पीठ ने एक महिला की सिविल रिविजन याचिका स्वीकार करते हुए पति की उस अर्जी को खारिज कर दिया, जिसमें भोपाल की दारुल-इफ्ता मस्जिद कमेटी के फतवे के आधार पर विवाह समाप्त घोषित करने की मांग की गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
पति ने 29 अक्टूबर 2024 को दारुल-इफ्ता मस्जिद कमेटी द्वारा जारी फतवे का हवाला देते हुए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी और विवाह समाप्त होने की न्यायिक घोषणा की मांग की थी। पत्नी ने इस याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि कोई भी धार्मिक संस्थान तलाक देने का अधिकार नहीं रखता और उक्त फतवे में केवल उन परिस्थितियों का उल्लेख है जिनमें इस्लामी कानून के तहत तलाक माँगा जा सकता है।
हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ
पत्नी के तर्क से सहमति जताते हुए जस्टिस जैन ने कहा, 'कोर्ट ने उक्त फतवे को देखा है और उसमें कहीं भी तलाक देने का जिक्र नहीं है। असल में कोई भी धार्मिक संस्थान किसी मुस्लिम पुरुष को तलाक का अधिकार नहीं दे सकता।'
न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि उक्त फतवे में केवल इस्लामी धर्मग्रंथों के उन प्रावधानों का उल्लेख है जो पत्नी के क्रूर व्यवहार जैसी स्थितियों में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। कोर्ट ने यह भी पाया कि पति ने इस गलतफहमी में मुकदमा दायर किया था कि नियमित तलाक याचिका दायर नहीं की जा सकती।
कानूनी स्थिति का स्पष्टीकरण
हाई कोर्ट ने डिविजन बेंच के पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मुस्लिम पुरुषों द्वारा तलाक की कार्यवाही शुरू करने की वैधता अब कोई अनसुलझा प्रश्न नहीं है। पूर्व निर्णय में कहा गया था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ी कार्यवाही फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 7 के तहत फैमिली कोर्ट में की जा सकती है और किसी मुस्लिम पुरुष को न्यायिक मंच तक पहुँचने से नहीं रोका जा सकता।
जस्टिस जैन ने अपने आदेश में तलाक की डिक्री माँगने और धार्मिक राय के आधार पर घोषणा माँगने के बीच का अंतर रेखांकित किया। उन्होंने कहा, 'तलाक का मुकदमा दायर किया जा सकता है, लेकिन फतवे के आधार पर तलाक की घोषणा नहीं की जा सकती।'
याचिका खारिज करने का आधार
न्यायालय ने पाया कि शिकायत में कार्रवाई का कोई वैध कानूनी आधार नहीं बताया गया था। इसके आधार पर कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता के ऑर्डर 7 नियम 11 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए याचिका खारिज कर दी। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति के पास कानूनी उपाय उपलब्ध हैं और वह फैमिली कोर्ट में विधिसम्मत तलाक याचिका दायर कर सकता है।
आगे की राह
यह निर्णय मुस्लिम पर्सनल लॉ और न्यायिक प्रक्रिया के बीच की सीमा-रेखा को और अधिक स्पष्ट करता है। विधि विशेषज्ञों के अनुसार, इस फैसले से उन मामलों में मार्गदर्शन मिलेगा जहाँ पक्षकार धार्मिक निकायों की राय को न्यायालय के आदेश का विकल्प मान बैठते हैं।