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झारखंड हाई कोर्ट का अहम फैसला: साक्ष्य बिना मानसिक क्रूरता तलाक का आधार नहीं

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झारखंड हाई कोर्ट का अहम फैसला: साक्ष्य बिना मानसिक क्रूरता तलाक का आधार नहीं

सारांश

झारखंड हाई कोर्ट ने साफ कर दिया — घर में अलगाव, बातचीत बंद या परिजनों से दूरी मात्र मानसिक क्रूरता नहीं। डॉ. मयंक बनाम रीमा मामले में फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार; पति की अपील खारिज। यह निर्णय मानसिक क्रूरता के दावों की न्यायिक कसौटी को पुनः परिभाषित करता है।

मुख्य बातें

झारखंड हाई कोर्ट ने 17 सितंबर 2026 को फैसला सुनाया कि मानसिक क्रूरता साबित करने के लिए ठोस, विशिष्ट और विश्वसनीय साक्ष्य अनिवार्य हैं।
एक ही घर में अलग रहना, बातचीत बंद करना या पति के परिजनों से कथित दुर्व्यवहार अकेले तलाक का आधार नहीं बन सकते।
रांची फैमिली कोर्ट ने 20 मार्च 2023 को तलाक याचिका खारिज की थी; हाई कोर्ट ने वही फैसला बरकरार रखा।
मयंक (चिकित्सक) और रीमा (सहायक प्रोफेसर) का है, विवाह 28 जुलाई 2011 को विशेष विवाह अधिनियम के तहत हुआ था।
पत्नी ने अदालत में कहा कि वह अब भी पति के साथ रहना चाहती है; उसने बरियातू थाने में प्रताड़ना का मामला भी दर्ज कराया था।
पति के पास अब सर्वोच्च न्यायालय में SLP दाखिल करने का विकल्प है।

झारखंड हाई कोर्ट ने 17 सितंबर 2026 को वैवाहिक विवाद के एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया कि पत्नी का एक ही घर में पति से अलग रहना, वैवाहिक संबंधों में दूरी बनाना या पति के परिजनों के साथ कथित दुर्व्यवहार — मात्र इन आधारों पर मानसिक क्रूरता सिद्ध नहीं होती। अदालत ने कहा कि तलाक के लिए क्रूरता का आरोप ठोस, विशिष्ट और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित किया जाना अनिवार्य है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला डॉ. मयंक (पति, चिकित्सक) और रीमा (पत्नी, सहायक प्रोफेसर) के बीच के वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। दोनों का विवाह 28 जुलाई 2011 को विशेष विवाह अधिनियम के तहत हुआ था, जिसके पश्चात हिंदू रीति-रिवाज से भी विवाह संपन्न हुआ।

पति ने विशेष विवाह अधिनियम की धारा 27(1)(डी) के तहत क्रूरता को आधार बनाकर रांची फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की थी। फैमिली कोर्ट ने 20 मार्च 2023 को यह याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद पति ने हाई कोर्ट में अपील की।

पति के आरोप और पत्नी का पक्ष

पति का आरोप था कि पत्नी उसके वृद्ध और बीमार माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करती थी, वर्ष 2012 के बाद से उनके बीच कोई वैवाहिक संबंध नहीं रहा, और पत्नी एक ही घर में अलग चूल्हा चलाती थी तथा बातचीत बंद कर चुकी थी। पति ने यह भी कहा कि इन परिस्थितियों से उसकी पढ़ाई और करियर प्रभावित हुआ।

पत्नी ने सभी आरोपों को नकारते हुए कहा कि विवाह के समय उसके पिता ने ₹10 लाख दिए थे और इसके बावजूद पढ़ाई के नाम पर और धन की माँग की गई। उसने पति की पढ़ाई के लिए ऋण लेने और ससुराल की देखभाल करने का भी दावा किया। पत्नी ने बरियातू थाने में प्रताड़ना का मामला भी दर्ज कराया था। उसने अदालत के समक्ष स्पष्ट किया कि वह अब भी पति के साथ रहना चाहती है।

हाई कोर्ट की टिप्पणियाँ

झारखंड हाई कोर्ट की खंडपीठ ने रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों की विस्तृत समीक्षा के बाद पति के आरोपों को सामान्य और अस्पष्ट पाया। अदालत ने कहा कि कोई ऐसी विशिष्ट घटना या ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया, जिससे पत्नी के व्यवहार को वैवाहिक जीवन जारी रखने के दृष्टिकोण से गंभीर मानसिक क्रूरता माना जा सके।

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि वैवाहिक जीवन में सामान्य मतभेद, छोटी-मोटी परेशानियाँ, स्वभावगत असहमति या पति-पत्नी के बीच असंगति को अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। क्रूरता का स्तर इतना गंभीर होना चाहिए कि परिस्थितियों में साथ रहना उचित रूप से असंभव हो जाए।

कानूनी सिद्धांत और फैसले का महत्व

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि तलाक के लिए लगाए गए आरोपों को साबित करने की जिम्मेदारी उस पक्ष की है जो क्रूरता को आधार बनाकर विवाह-विच्छेद की माँग कर रहा है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देशभर की अदालतों में मानसिक क्रूरता को आधार बनाकर दाखिल तलाक याचिकाओं की संख्या बढ़ रही है।

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय भी कई अवसरों पर यह दोहरा चुका है कि मानसिक क्रूरता की परिभाषा व्यापक होते हुए भी साक्ष्य-आधारित होनी चाहिए। खंडपीठ ने रांची फैमिली कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए पति की अपील खारिज कर दी।

आगे की स्थिति

हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब पति के पास सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल करने का विकल्प है। पत्नी का रुख — कि वह वैवाहिक जीवन बहाल करना चाहती है — अदालती रिकॉर्ड में दर्ज है। यह फैसला भविष्य में मानसिक क्रूरता के दावों की न्यायिक कसौटी तय करने में मिसाल बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो इस मामले की जटिलता को उजागर करते हैं। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर ऐसे फैसलों को केवल पुरुष या महिला पक्ष के नजरिए से देखती है; असली सवाल यह है कि 'मानसिक क्रूरता' की परिभाषा संसद या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा और अधिक स्पष्ट की जाए ताकि परिवार अदालतों में एकरूपता आए।
RashtraPress
17 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड हाई कोर्ट ने मानसिक क्रूरता पर क्या फैसला दिया?
झारखंड हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी का अलग रहना, बातचीत बंद करना या पति के परिजनों से दूरी बनाना अकेले मानसिक क्रूरता साबित नहीं करता। तलाक के लिए क्रूरता का आरोप ठोस, विशिष्ट और विश्वसनीय साक्ष्यों से सिद्ध होना जरूरी है।
डॉ. मयंक बनाम रीमा मामला क्या है?
यह मामला रांची के चिकित्सक डॉ. मयंक और उनकी पत्नी रीमा (सहायक प्रोफेसर) के बीच का वैवाहिक विवाद है। दोनों का विवाह 28 जुलाई 2011 को विशेष विवाह अधिनियम के तहत हुआ था। पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक की अर्जी दी थी, जिसे फैमिली कोर्ट और बाद में हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया।
रांची फैमिली कोर्ट ने तलाक की अर्जी कब खारिज की थी?
रांची फैमिली कोर्ट ने 20 मार्च 2023 को पति की तलाक याचिका खारिज की थी। इसके बाद पति ने झारखंड हाई कोर्ट में अपील की, जिसे हाई कोर्ट ने भी खारिज कर दिया।
तलाक के लिए मानसिक क्रूरता साबित करने की जिम्मेदारी किसकी होती है?
अदालत ने स्पष्ट किया कि जो पक्ष क्रूरता को आधार बनाकर तलाक माँग रहा है, उसी पर यह जिम्मेदारी है। क्रूरता का स्तर इतना गंभीर होना चाहिए कि परिस्थितियों में साथ रहना उचित रूप से असंभव हो जाए — सामान्य मतभेद या असंगति पर्याप्त नहीं है।
इस फैसले के बाद पति के पास क्या विकल्प है?
झारखंड हाई कोर्ट की खंडपीठ द्वारा अपील खारिज होने के बाद पति के पास सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल करने का विकल्प बचा है।
राष्ट्र प्रेस
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