गुरमीत राम रहीम बरी मामला: सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस, 16 नवंबर से सुनवाई
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 10 अगस्त 2026 को पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा बरी किए जाने के विरुद्ध दाखिल याचिका पर नोटिस जारी किया। न्यायालय ने गुरमीत राम रहीम और केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) दोनों से जवाब तलब किया है। यह याचिका छत्रपति के पुत्र ने उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देते हुए दाखिल की है, जिसमें राम रहीम को साक्ष्य के अभाव का हवाला देकर बरी किया गया था।
मुख्य घटनाक्रम
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस प्रकरण में राज्य सरकार ने अपील दाखिल नहीं की है — यानी यह लड़ाई अकेले पीड़ित परिवार की ओर से लड़ी जा रही है। अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में निर्धारित की गई है। यह मामला न्यायिक प्रक्रिया और पीड़ित परिवारों के अधिकारों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।
हाईकोर्ट का विवादित फैसला
मार्च 2026 में पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय ने गुरमीत राम रहीम को 2002 के छत्रपति हत्याकांड में बरी कर दिया था। अदालत ने पर्याप्त साक्ष्य न होने का आधार लेते हुए निचली अदालत के आजीवन कारावास के फैसले को पलट दिया। हालाँकि, इसी मामले में दोषी ठहराए गए अन्य तीन अभियुक्तों — कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल — की सजा उच्च न्यायालय ने बरकरार रखी।
मामले की पृष्ठभूमि
अक्टूबर 2002 में रामचंद्र छत्रपति को उनके घर के बाहर मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने गोली मारी थी। 21 नवंबर 2002 को इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। पंचकूला की विशेष CBI अदालत ने जनवरी 2019 में गुरमीत राम रहीम सहित चारों दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। गौरतलब है कि छत्रपति एक स्थानीय समाचार-पत्र के संपादक थे, जो डेरा सच्चा सौदा के कथित कुकृत्यों को उजागर कर रहे थे।
राम रहीम की कानूनी स्थिति
गुरमीत राम रहीम 2017 से बलात्कार के एक अलग मामले में दोषसिद्ध होकर जेल में है। इस दौरान वह कई बार पैरोल और फरलो पर रिहा हुआ, जिस पर व्यापक विवाद हुआ। जेल से बाहर रहने के दौरान वह उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित डेरा के आश्रम में रहता है। सिरसा मुख्यालय वाले डेरा सच्चा सौदा के हरियाणा, पंजाब, राजस्थान सहित कई उत्तरी राज्यों में बड़ी संख्या में अनुयायी हैं।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय की इस सुनवाई से यह तय होगा कि उच्च न्यायालय का बरी करने का फैसला कायम रहेगा या उस पर पुनर्विचार होगा। पीड़ित परिवार के लिए यह अंतिम न्यायिक उम्मीद है। न्यायिक विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य सरकार का अपील न करना इस मामले की राजनीतिक संवेदनशीलता को भी उजागर करता है।