विजया रहाटकर का पटना हाई कोर्ट फैसले पर बयान: न्याय केवल कानूनी तकनीक तक सीमित नहीं
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की अध्यक्ष विजया रहाटकर ने 15 जुलाई 2026 को पटना उच्च न्यायालय के एक फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यौन अपराधों में न्याय का दायरा केवल कानून की तकनीकी व्याख्या तक सीमित नहीं रहना चाहिए — पीड़िता की गरिमा, सहमति और मानसिक आघात को समान महत्व मिलना अनिवार्य है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब महिलाओं के विरुद्ध यौन अपराधों में न्यायिक दृष्टिकोण और सज़ा की पर्याप्तता पर राष्ट्रीय बहस तेज़ हो रही है।
पीड़िता-केंद्रित न्याय की ज़रूरत
रहाटकर ने स्पष्ट किया कि यौन अपराधों की व्याख्या करते समय न्यायालयों को केवल शारीरिक कृत्य को ही आधार नहीं बनाना चाहिए। उनके अनुसार, पीड़िता की गरिमा, उसकी सहमति, मन में उत्पन्न भय और घटना से हुए मानसिक आघात को भी न्यायिक विचार में समान स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि न्याय की प्रक्रिया पीड़िता के वास्तविक अनुभव और कानून की मूल भावना से दूर हो जाए, तो न्याय व्यवस्था पर समाज का विश्वास स्वाभाविक रूप से प्रभावित होता है।
18 वर्षों की न्यायिक प्रक्रिया पर चिंता
NCW अध्यक्ष ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि यदि कोई पीड़िता 18 वर्षों की लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद भी पूर्ण न्याय से वंचित रह जाए और गंभीर यौन अपराधों में दोषियों को प्रभावी दंड न मिले, तो इससे महिलाओं के आत्मविश्वास और न्याय व्यवस्था पर उनके भरोसे को गहरी ठेस पहुँचती है। गौरतलब है कि भारत में यौन अपराध मामलों में लंबित मुकदमों की संख्या और सज़ा की दर लंबे समय से चिंता का विषय रही है।
संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता
रहाटकर ने ज़ोर देकर कहा कि महिलाओं की गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा न्याय व्यवस्था की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा अपनाए गए स्पष्ट, संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण का स्वागत किया और विश्वास जताया कि न्याय व्यवस्था इस दिशा में और सुदृढ़ होगी।
व्यापक संदर्भ और आगे की राह
यह बयान ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालय यौन अपराध मामलों में पीड़ित-संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने पर बल दे रहे हैं। NCW ने यह भी संकेत दिया कि वह इस मामले में संबंधित पक्षों के साथ आगे संवाद जारी रखेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायिक प्रशिक्षण में लैंगिक संवेदनशीलता को और मजबूत किए जाने की आवश्यकता है।