सुखबीर बादल का भगवंत मान सरकार पर हमला: खन्ना में कर्मचारियों पर लाठीचार्ज को बताया 'डंडा-तंत्र'
सारांश
मुख्य बातें
शिरोमणि अकाली दल (SAD) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने 15 जुलाई को खन्ना में संविदा कर्मचारियों और मजदूरों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार पर तीखा प्रहार किया। बादल ने आरोप लगाया कि बकाया मजदूरी की माँग को लेकर शांतिपूर्वक 'सतनाम वाहेगुरु' का जाप कर रहे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज, वॉटर कैनन और आंसू गैस के गोलों का इस्तेमाल किया।
मुख्य घटनाक्रम
बादल के अनुसार, यह घटना उस समय हुई जब प्रदर्शनकारी खन्ना में कैबिनेट मंत्री तरुणप्रीत सिंह सोंध के आवास के बाहर अपनी माँगों को लेकर एकत्र हुए थे। कथित तौर पर प्रदर्शन में शामिल लोग संविदा पर कार्यरत कर्मचारी और गरीब मजदूर थे, जो केवल अपनी लंबित मजदूरी के भुगतान की माँग कर रहे थे।
सुखबीर बादल की प्रतिक्रिया
बादल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए इस कार्रवाई को लोकतंत्र के बजाय 'डंडा-तंत्र' करार दिया। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज कराने का अधिकार है और किसी भी सरकार को बल प्रयोग से आवाज दबाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उनके अनुसार, पंजाब सरकार कर्मचारियों और श्रमिकों की समस्याओं का समाधान करने के बजाय दमनात्मक रवैया अपना रही है।
अकाली दल का समर्थन और 2027 का वादा
शिरोमणि अकाली दल की ओर से बादल ने प्रदर्शनकारी कर्मचारियों और मजदूरों के समर्थन का ऐलान किया। उन्होंने भरोसा दिलाया कि यदि 2027 में शिरोमणि अकाली दल की सरकार बनती है, तो लंबित माँगों पर प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई की जाएगी। गौरतलब है कि यह बयान पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले अकाली दल की कर्मचारी-हितैषी छवि बनाने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है।
आम जनता और कर्मचारियों पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब पंजाब में संविदा कर्मचारियों की नियमितीकरण और बकाया भुगतान की माँगें लंबे समय से लंबित हैं। आलोचकों का कहना है कि राज्य सरकार की ओर से इन माँगों पर ठोस कार्रवाई न होने से असंतोष बढ़ रहा है। यह घटना पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) और विपक्षी दलों के बीच टकराव को और तेज कर सकती है।
क्या होगा आगे
शिरोमणि अकाली दल ने संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे को आगे भी उठाता रहेगा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कर्मचारी आंदोलन पंजाब की राजनीति में एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है और 2027 के चुनावी समीकरणों में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।