यौन अपराधों में पीड़िता की गरिमा और मानसिक आघात को मिले समान महत्व: NCW अध्यक्ष विजया राहटकर
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की अध्यक्ष विजया राहटकर ने 15 जुलाई 2026 को पटना हाईकोर्ट के एक फैसले के संदर्भ में स्पष्ट किया कि यौन अपराधों की न्यायिक व्याख्या केवल शारीरिक कृत्य तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उनके अनुसार, ऐसे मामलों में पीड़िता की गरिमा, उसकी सहमति, भय और मानसिक आघात को भी समान कानूनी महत्व दिया जाना अनिवार्य है।
मुख्य वक्तव्य
राहटकर ने कहा कि न्याय का उद्देश्य कानून की तकनीकी व्याख्या तक सीमित नहीं हो सकता। उनके शब्दों में, न्यायिक प्रक्रिया को पीड़िता के वास्तविक अनुभवों और कानून की मूल भावना के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए। उन्होंने चेताया कि यदि न्याय व्यवस्था पीड़ितों के अनुभवों से अलग दिखाई देती है, तो इससे आम नागरिकों का न्याय प्रणाली पर विश्वास कमज़ोर हो सकता है।
NCW अध्यक्ष ने यह भी कहा कि लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद भी यदि पीड़िता को न्याय मिलने का वास्तविक अनुभव नहीं होता, तो यह गहरी चिंता का विषय है। उन्होंने रेखांकित किया कि गंभीर यौन अपराधों में दोषियों को प्रभावी सज़ा न मिलने से महिलाओं के न्याय व्यवस्था पर भरोसे पर नकारात्मक असर पड़ता है।
संवैधानिक अधिकारों की प्राथमिकता
राहटकर ने ज़ोर देकर कहा कि महिलाओं की गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा न्याय व्यवस्था की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल होनी चाहिए। इस संदर्भ में उन्होंने मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत के पीड़िता-केंद्रित और संवेदनशील दृष्टिकोण का स्वागत किया और इसे सही दिशा में उठाया गया कदम बताया।
पटना हाईकोर्ट फैसले का संदर्भ
गौरतलब है कि यह प्रतिक्रिया पटना हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद सामने आई है, जिसमें यौन अपराध की व्याख्या को लेकर सवाल उठे थे। राष्ट्रीय महिला आयोग लगातार महिलाओं के अधिकारों, सुरक्षा और न्याय तक उनकी पहुँच को मज़बूत करने के मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। यह पहली बार नहीं है जब आयोग ने किसी अदालती फैसले पर सार्वजनिक रूप से अपनी राय रखी हो — यह उसके संस्थागत जनादेश का हिस्सा है।
आम महिलाओं पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यौन अपराध के मामलों में यदि पीड़िता की मानसिक और भावनात्मक पीड़ा को कानूनी प्रक्रिया में उचित स्थान नहीं मिलता, तो पीड़ित महिलाएँ शिकायत दर्ज कराने से हिचकिचाती हैं। राहटकर ने इसी बिंदु को रेखांकित करते हुए कहा कि न्याय व्यवस्था को संवेदनशीलता के साथ काम करना चाहिए ताकि पीड़ित महिलाओं को न्याय का वास्तविक अनुभव मिल सके।
आगे की राह
राहटकर ने विश्वास जताया कि भारतीय न्याय प्रणाली भविष्य में और अधिक संवेदनशील, पीड़िता-केंद्रित और लैंगिक न्याय आधारित दृष्टिकोण को मज़बूत करेगी। आयोग की यह अपील ऐसे समय में आई है जब देशभर में यौन अपराध के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर बहस तेज़ हो रही है।