24 अगस्त 2026
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घरेलू हिंसा पीड़िता को आवास सुरक्षा के लिए ट्रायल खत्म होने का इंतजार नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट का अहम फैसला

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घरेलू हिंसा पीड़िता को आवास सुरक्षा के लिए ट्रायल खत्म होने का इंतजार नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट का अहम फैसला

सारांश

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने साफ कर दिया — घरेलू हिंसा पीड़िता को आवास सुरक्षा के लिए ट्रायल खत्म होने का इंतजार नहीं करना होगा। जस्टिस संजय धर का यह फैसला डीवी एक्ट की धारा 23 की व्याख्या करते हुए निचली अदालतों को तत्काल अंतरिम राहत देने का स्पष्ट अधिकार देता है।

मुख्य बातें

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने 24 अगस्त 2026 को फैसला दिया कि घरेलू हिंसा पीड़िता को अंतरिम आवास सुरक्षा के लिए ट्रायल पूरा होने की प्रतीक्षा नहीं करनी होगी।
जस्टिस संजय धर ने डीवी एक्ट की धारा 23 की व्याख्या करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट प्रथम दृष्टया संतुष्टि के आधार पर अंतरिम आवास आदेश दे सकते हैं।
कुपवाड़ा के प्रिंसिपल सेशंस जज का आदेश — जिसमें ट्रायल के बाद ही राहत देने की शर्त रखी गई थी — हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार जम्मू-कश्मीर में लगभग 10–11 प्रतिशत विवाहित महिलाएँ पति से शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करती हैं।
यह फैसला निचली अदालतों के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन है कि सुरक्षात्मक राहत तत्काल और निवारक होनी चाहिए, दीर्घकालिक प्रक्रिया पर निर्भर नहीं।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने 24 अगस्त 2026 को एक ऐतिहासिक व्याख्या देते हुए स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को साझा घर में अंतरिम आवास सुरक्षा पाने के लिए मुकदमे के अंतिम निर्णय तक प्रतीक्षा करने की कोई बाध्यता नहीं है। जस्टिस संजय धर ने यह फैसला कुपवाड़ा की एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया, जिसने प्रिंसिपल सेशंस जज के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसने ट्रायल कोर्ट का आवास-सुरक्षा निर्देश रद्द कर दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता महिला ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (डीवी एक्ट) के तहत आवेदन किया था, जिस पर ट्रायल कोर्ट ने उसके पति को साझा घर में उसे सुरक्षित आवास देने का निर्देश दिया। कुपवाड़ा के प्रिंसिपल सेशंस जज ने इस निर्देश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि रहने की जगह की राहत केवल ट्रायल पूरा होने के बाद ही दी जा सकती है। इसी आदेश को महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट की कानूनी व्याख्या

जस्टिस धर ने डीवी एक्ट की धारा 23 की विस्तृत समीक्षा की, जो मजिस्ट्रेट को धारा 12 के तहत चल रही कार्यवाही के दौरान अंतरिम राहत — जिसमें अंतरिम आवास आदेश भी शामिल है — देने का अधिकार देती है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 19 के अंतर्गत स्थायी आवास आदेश भले ही अंतिम निर्णय के समय पारित हो, किंतु अंतरिम आवास सुरक्षा कार्यवाही के प्रारंभिक चरण में भी प्रदान की जा सकती है। मजिस्ट्रेट को केवल यह संतुष्टि होनी चाहिए कि प्रस्तुत सामग्री प्रथम दृष्टया घरेलू हिंसा की घटना या उसकी संभावना को दर्शाती है — इसके लिए पूरे ट्रायल की प्रतीक्षा अनिवार्य नहीं है।

फैसले का सार और महत्व

जस्टिस धर ने रेखांकित किया कि डीवी एक्ट के तहत आवास सुरक्षा एक तत्काल और निवारक राहत है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पीड़िता कानूनी प्रक्रिया के दौरान बेघर या असुरक्षित न रहे। हाईकोर्ट ने माना कि सेशंस जज की व्याख्या — कि राहत केवल ट्रायल के बाद मिल सकती है — अधिनियम के विधायी उद्देश्य के विपरीत है।

इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने सेशंस कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट की अंतरिम आवास सुरक्षा को बहाल कर दिया। यह फैसला इस सिद्धांत को और पुख्ता करता है कि सुरक्षात्मक राहत दीर्घकालिक न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर नहीं हो सकती।

जम्मू-कश्मीर में घरेलू हिंसा की स्थिति

जम्मू-कश्मीर में घरेलू हिंसा एक गंभीर और कम रिपोर्ट होने वाली समस्या बनी हुई है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आँकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में लगभग 10 से 11 प्रतिशत विवाहित महिलाओं को अपने पति से शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। हालांकि, स्थानीय महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि सामाजिक बदनामी के भय के कारण वास्तविक आँकड़े इससे कहीं अधिक हो सकते हैं।

पितृसत्तात्मक सामाजिक रीति-रिवाज, आर्थिक तंगी और दशकों के क्षेत्रीय संघर्ष ने इस समस्या को और जटिल बनाया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका से यह अपेक्षा बढ़ रही है कि वह पीड़ित महिलाओं को त्वरित और प्रभावी राहत सुनिश्चित करे।

आगे की राह

यह निर्णय निचली अदालतों के लिए एक स्पष्ट मार्गदर्शन है कि डीवी एक्ट की धारा 23 के तहत अंतरिम आवास आदेश देने में विलंब न किया जाए। विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से जम्मू-कश्मीर में घरेलू हिंसा मामलों में पीड़िताओं को त्वरित राहत मिलने की संभावना बढ़ेगी और ट्रायल की लंबाई को राहत से अलग रखने की प्रवृत्ति को बल मिलेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल क्रियान्वयन का है — जम्मू-कश्मीर में जहाँ सामाजिक दबाव और संसाधनों की कमी के कारण महिलाएँ अक्सर शिकायत ही दर्ज नहीं कराती, वहाँ अदालत का यह निर्देश तब तक अधूरा है जब तक जागरूकता और कानूनी सहायता तंत्र मजबूत नहीं होता। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आँकड़े और स्थानीय कार्यकर्ताओं की चेतावनी बताती है कि रिपोर्ट किए गए मामले वास्तविकता का एक छोटा-सा हिस्सा मात्र हैं। न्यायपालिका ने दरवाज़ा खोला है — अब ज़रूरत है कि सरकार और सिविल सोसाइटी मिलकर पीड़िताओं को उस दरवाज़े तक पहुँचाएँ।
RashtraPress
24 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट का घरेलू हिंसा आवास सुरक्षा पर क्या फैसला आया?
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने 24 अगस्त 2026 को फैसला दिया कि घरेलू हिंसा पीड़िता को अंतरिम आवास सुरक्षा के लिए मुकदमे के अंतिम निर्णय तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। जस्टिस संजय धर ने कुपवाड़ा सेशंस कोर्ट का वह आदेश रद्द कर दिया जिसमें ट्रायल पूरा होने की शर्त रखी गई थी।
डीवी एक्ट की धारा 23 क्या कहती है?
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 23 मजिस्ट्रेट को धारा 12 के तहत चल रही कार्यवाही के दौरान अंतरिम राहत — जिसमें अंतरिम आवास आदेश भी शामिल है — देने का अधिकार देती है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह राहत प्रथम दृष्टया संतुष्टि के आधार पर प्रारंभिक चरण में ही दी जा सकती है।
मजिस्ट्रेट अंतरिम आवास आदेश देने से पहले क्या देखेगा?
हाईकोर्ट के अनुसार, मजिस्ट्रेट को पूरा ट्रायल करने की जरूरत नहीं है। उसे केवल यह संतुष्टि होनी चाहिए कि प्रस्तुत सामग्री प्रथम दृष्टया घरेलू हिंसा की घटना या उसकी संभावना को दर्शाती है, तभी वह अंतरिम आवास सुरक्षा प्रदान कर सकता है।
जम्मू-कश्मीर में घरेलू हिंसा की स्थिति कितनी गंभीर है?
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आँकड़ों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में लगभग 10 से 11 प्रतिशत विवाहित महिलाएँ पति से शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करती हैं। स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि सामाजिक बदनामी के भय के कारण वास्तविक आँकड़े इससे कहीं अधिक हो सकते हैं।
इस फैसले का घरेलू हिंसा पीड़िताओं पर क्या असर होगा?
इस फैसले से घरेलू हिंसा पीड़िताओं को कानूनी प्रक्रिया के दौरान बेघर न होने की गारंटी मिलती है। निचली अदालतें अब ट्रायल की लंबाई का हवाला देकर अंतरिम आवास सुरक्षा देने से इनकार नहीं कर सकतीं, जिससे पीड़िताओं को त्वरित राहत मिलने की संभावना बढ़ेगी।
राष्ट्र प्रेस
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