घरेलू हिंसा पीड़िता को आवास सुरक्षा के लिए ट्रायल खत्म होने का इंतजार नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट का अहम फैसला
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने 24 अगस्त 2026 को एक ऐतिहासिक व्याख्या देते हुए स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को साझा घर में अंतरिम आवास सुरक्षा पाने के लिए मुकदमे के अंतिम निर्णय तक प्रतीक्षा करने की कोई बाध्यता नहीं है। जस्टिस संजय धर ने यह फैसला कुपवाड़ा की एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया, जिसने प्रिंसिपल सेशंस जज के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसने ट्रायल कोर्ट का आवास-सुरक्षा निर्देश रद्द कर दिया था।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता महिला ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (डीवी एक्ट) के तहत आवेदन किया था, जिस पर ट्रायल कोर्ट ने उसके पति को साझा घर में उसे सुरक्षित आवास देने का निर्देश दिया। कुपवाड़ा के प्रिंसिपल सेशंस जज ने इस निर्देश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि रहने की जगह की राहत केवल ट्रायल पूरा होने के बाद ही दी जा सकती है। इसी आदेश को महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट की कानूनी व्याख्या
जस्टिस धर ने डीवी एक्ट की धारा 23 की विस्तृत समीक्षा की, जो मजिस्ट्रेट को धारा 12 के तहत चल रही कार्यवाही के दौरान अंतरिम राहत — जिसमें अंतरिम आवास आदेश भी शामिल है — देने का अधिकार देती है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 19 के अंतर्गत स्थायी आवास आदेश भले ही अंतिम निर्णय के समय पारित हो, किंतु अंतरिम आवास सुरक्षा कार्यवाही के प्रारंभिक चरण में भी प्रदान की जा सकती है। मजिस्ट्रेट को केवल यह संतुष्टि होनी चाहिए कि प्रस्तुत सामग्री प्रथम दृष्टया घरेलू हिंसा की घटना या उसकी संभावना को दर्शाती है — इसके लिए पूरे ट्रायल की प्रतीक्षा अनिवार्य नहीं है।
फैसले का सार और महत्व
जस्टिस धर ने रेखांकित किया कि डीवी एक्ट के तहत आवास सुरक्षा एक तत्काल और निवारक राहत है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पीड़िता कानूनी प्रक्रिया के दौरान बेघर या असुरक्षित न रहे। हाईकोर्ट ने माना कि सेशंस जज की व्याख्या — कि राहत केवल ट्रायल के बाद मिल सकती है — अधिनियम के विधायी उद्देश्य के विपरीत है।
इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने सेशंस कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट की अंतरिम आवास सुरक्षा को बहाल कर दिया। यह फैसला इस सिद्धांत को और पुख्ता करता है कि सुरक्षात्मक राहत दीर्घकालिक न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर नहीं हो सकती।
जम्मू-कश्मीर में घरेलू हिंसा की स्थिति
जम्मू-कश्मीर में घरेलू हिंसा एक गंभीर और कम रिपोर्ट होने वाली समस्या बनी हुई है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आँकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में लगभग 10 से 11 प्रतिशत विवाहित महिलाओं को अपने पति से शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। हालांकि, स्थानीय महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि सामाजिक बदनामी के भय के कारण वास्तविक आँकड़े इससे कहीं अधिक हो सकते हैं।
पितृसत्तात्मक सामाजिक रीति-रिवाज, आर्थिक तंगी और दशकों के क्षेत्रीय संघर्ष ने इस समस्या को और जटिल बनाया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका से यह अपेक्षा बढ़ रही है कि वह पीड़ित महिलाओं को त्वरित और प्रभावी राहत सुनिश्चित करे।
आगे की राह
यह निर्णय निचली अदालतों के लिए एक स्पष्ट मार्गदर्शन है कि डीवी एक्ट की धारा 23 के तहत अंतरिम आवास आदेश देने में विलंब न किया जाए। विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से जम्मू-कश्मीर में घरेलू हिंसा मामलों में पीड़िताओं को त्वरित राहत मिलने की संभावना बढ़ेगी और ट्रायल की लंबाई को राहत से अलग रखने की प्रवृत्ति को बल मिलेगा।