सुप्रीम कोर्ट ने UP के ACS (गृह) संजय प्रसाद के खिलाफ इलाहाबाद HC की टिप्पणियों पर लगाई रोक
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 11 जून 2026 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसमें उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद के आचरण पर प्रतिकूल टिप्पणियाँ की गई थीं और उनके भविष्य के पदस्थापन के लिए फैसले की प्रति कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेजने का निर्देश दिया गया था। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने संजय प्रसाद द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए पारित किया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 3 जून 2026 के उस फैसले से उपजा है, जो एक नाबालिग लड़की की बरामदगी से जुड़ी बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका में दिया गया था। लड़की की माँ ने यह याचिका दायर की थी, क्योंकि लड़की कथित तौर पर जून 2025 में लापता हो गई थी। उच्च न्यायालय ने माना कि लड़की को बरामद कर उसके माता-पिता को सौंप दिया गया है, परंतु इसके साथ ही राज्य के गृह विभाग की कार्यप्रणाली और वरिष्ठ अधिकारियों के आचरण पर विस्तृत टिप्पणियाँ भी दर्ज कीं।
हाईकोर्ट की टिप्पणियाँ और निर्देश
एकलपीठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा था कि ACS (गृह) संजय प्रसाद के आचरण को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने अपने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया था कि फैसले की प्रमाणित प्रति और 'सुभाष चंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले के निर्णय की प्रति DoPT सचिव को भेजी जाए। इसका उद्देश्य था कि भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के कैडर नियंत्रक प्राधिकरण के रूप में नियुक्ति समिति (ACC) अधिकारी की उपयुक्तता का आकलन करते समय इसे अभिलेख के रूप में रख सके।
सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने SLP दाखिल करने की अनुमति देते हुए प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया। पीठ ने अपने आदेश में कहा, 'नोटिस जारी किया जाता है, जो 10 सप्ताह में प्रत्यावर्तनीय होगा। इस बीच, हाईकोर्ट के विवादित आदेश में दिए गए निर्देशों के अमल पर रोक रहेगी।' इस प्रकार, अब DoPT को फैसले की प्रति भेजने और उसके आधार पर कोई भी कार्रवाई करने पर अंतरिम रोक लागू है।
आम जनता और प्रशासन पर असर
यह मामला न केवल एक वरिष्ठ IAS अधिकारी की सेवा-सुरक्षा से जुड़ा है, बल्कि इससे यह व्यापक प्रश्न भी उठता है कि उच्च न्यायालय किस हद तक अपने फैसलों में प्रशासनिक अधिकारियों के भविष्य के करियर को प्रभावित करने वाले निर्देश दे सकते हैं। गौरतलब है कि ऐसी टिप्पणियाँ, यदि DoPT के अभिलेख में शामिल हो जाएँ, तो अधिकारी के पदोन्नति और नियुक्ति के अवसरों पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती हैं।
आगे क्या होगा
मामले की अगली सुनवाई 10 सप्ताह बाद निर्धारित है। तब तक हाईकोर्ट के सभी विवादित निर्देशों का क्रियान्वयन स्थगित रहेगा। सर्वोच्च न्यायालय का यह अंतरिम हस्तक्षेप उन अधिकारियों के लिए राहत का संकेत है जो न्यायिक टिप्पणियों के आधार पर सेवा-संबंधी कार्रवाई का सामना कर रहे हैं।