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सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर लगाई रोक, दो वकीलों पर कार्रवाई टली

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सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर लगाई रोक, दो वकीलों पर कार्रवाई टली

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाई जिसमें दो वकीलों पर आपराधिक और अनुशासनात्मक कार्रवाई का निर्देश था। आरोप है कि वकीलों ने भूमि अधिग्रहण अवार्ड की जाली कॉपी से मुवक्किलों को अनुचित ब्याज दिलाया। मामले की सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।

मुख्य बातें

सुप्रीम कोर्ट ने 24 अगस्त को इलाहाबाद हाईकोर्ट के 30 जुलाई के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई।
वकीलों शिव कांत मिश्रा और कृष्ण कांत मिश्रा पर 26 अप्रैल, 2016 के भूमि अधिग्रहण अवार्ड की टाइप्ड कॉपी में 9% और 15% ब्याज दरें जोड़ने का आरोप है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीआरपीसी धारा 340 के तहत आपराधिक शिकायत और बार काउंसिल को लाइसेंस रद्द करने की शिकायत का निर्देश दिया था।
हाईकोर्ट ने 24 मई, 2024 का अपना पूर्व आदेश भी रद्द किया था और बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी को वसूली का निर्देश दिया था।
मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय में होगी; तब तक सभी निर्देशों पर रोक जारी रहेगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 24 अगस्त को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसमें दो वकीलों — शिव कांत मिश्रा और कृष्ण कांत मिश्रा — के विरुद्ध आपराधिक और अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया गया था। इन वकीलों पर आरोप है कि उन्होंने बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी से जुड़े एक भूमि अधिग्रहण मामले में अवार्ड की जाली टाइप्ड कॉपी पेश कर न्यायालय को गुमराह किया और अपने मुवक्किलों को अनुचित आर्थिक लाभ दिलाया।

मामले का पृष्ठभूमि और मुख्य घटनाक्रम

यह विवाद बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी द्वारा अधिग्रहित भूमि के मुआवजे पर ब्याज भुगतान से जुड़ा है। आरोप है कि 26 अप्रैल, 2016 के मूल अवार्ड की टाइप्ड कॉपी में अतिरिक्त प्रावधान जोड़े गए — पहले वर्ष के लिए 9 प्रतिशत और उसके बाद 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज — जो कथित तौर पर मूल दस्तावेज़ में नहीं था। इसी कॉपी के आधार पर 24 मई, 2024 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक पीठ ने अथॉरिटी को भूमि मालिकों को ब्याज देने का आदेश दिया था।

बाद में बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी को इस कथित धोखाधड़ी का पता चला और उसने समीक्षा याचिका दायर की। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की पीठ ने मूल अवार्ड और टाइप्ड कॉपी की तुलना की और पाया कि अंतर महज टाइपिंग की भूल नहीं, बल्कि एक सुनियोजित कृत्य था।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का निष्कर्ष

उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि 'टाइपिंग की गलती धोखेबाजी के कृत्य से अलग होती है।' पीठ ने माना कि वकीलों को ब्याज दरों के जोड़े जाने की जानकारी थी और उन्होंने मुवक्किलों को आर्थिक लाभ दिलाने के उद्देश्य से यह परिवर्तन किया। न्यायालय ने वकीलों की माफी की अपील भी अस्वीकार कर दी और कहा कि 'हरकत के उजागर होने के बाद मांगी गई माफी को सच्चा पछतावा नहीं माना जा सकता।'

पीठ ने यह भी चेताया कि ऐसे आचरण को हल्के में लेने से वकीलों के समुदाय में यह गलत संदेश जाएगा कि 'चालाकी भरी हरकतें तब तक स्वीकार्य हैं जब तक वे पकड़ी न जाएं।' इसके आधार पर हाईकोर्ट ने अपने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वे सीआरपीसी की धारा 340 के तहत कार्यवाही शुरू करें और बार काउंसिल ऑफ इंडिया तथा राज्य बार काउंसिल के समक्ष दोनों वकीलों के लाइसेंस रद्द करने की शिकायत दर्ज कराएं। साथ ही, 24 मई, 2024 का पूर्व आदेश भी रद्द कर दिया गया और अथॉरिटी को पहले वितरित राशि की वसूली का निर्देश दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और अंतरिम आदेश

जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने वकील शिव कांत मिश्रा की स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 30 जुलाई के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। सर्वोच्च न्यायालय ने एसएलपी पर नोटिस जारी करते हुए मामले को 12 अक्टूबर को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

यह अंतरिम रोक उन सभी निर्देशों पर लागू होगी जो हाईकोर्ट ने दोनों वकीलों के विरुद्ध दिए थे — जिनमें आपराधिक शिकायत और बार काउंसिल को अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए संदर्भित करना भी शामिल है।

आम जनता और कानूनी समुदाय पर असर

यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में दस्तावेज़ी हेरफेर की गंभीरता को रेखांकित करता है। आईपीसी की धारा 199 के तहत न्यायालय में झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करना और धारा 193 के तहत झूठी गवाही देना दंडनीय अपराध है। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी उच्च न्यायालय ने अधिवक्ताओं के कथित कदाचार पर इतनी कड़ी टिप्पणी की हो — लेकिन सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप यह स्पष्ट करता है कि अंतिम निर्णय से पहले दोनों पक्षों को सुना जाएगा।

आगे क्या होगा

मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय में होगी। तब तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक बनी रहेगी और दोनों वकीलों के विरुद्ध कोई आपराधिक या अनुशासनात्मक कदम नहीं उठाया जा सकेगा। इस बीच, बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी को वसूली प्रक्रिया और मूल मुआवजे के मामले में भी स्थिति स्पष्ट होने का इंतज़ार करना होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो यह न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार है। भारत में अधिवक्ताओं के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही ऐतिहासिक रूप से धीमी और परिणामहीन रही है — बार काउंसिल की प्रतिक्रिया इस बार एक परीक्षण होगी। असली सवाल यह है कि क्या न्यायिक तंत्र इस मामले को उस गंभीरता से निपटाएगा जिसकी हाईकोर्ट ने अपेक्षा की थी।
RashtraPress
25 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के किस आदेश पर रोक लगाई?
सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 30 जुलाई के उस आदेश पर रोक लगाई जिसमें वकीलों शिव कांत मिश्रा और कृष्ण कांत मिश्रा के विरुद्ध सीआरपीसी धारा 340 के तहत आपराधिक कार्यवाही और बार काउंसिल को लाइसेंस रद्द करने की शिकायत का निर्देश दिया गया था। यह रोक 12 अक्टूबर को अगली सुनवाई तक लागू रहेगी।
दोनों वकीलों पर क्या आरोप हैं?
आरोप है कि वकीलों ने 26 अप्रैल, 2016 के भूमि अधिग्रहण अवार्ड की टाइप्ड कॉपी में 9% और 15% वार्षिक ब्याज दरों का प्रावधान जोड़ा, जो कथित तौर पर मूल अवार्ड में नहीं था। इस कॉपी के आधार पर हाईकोर्ट ने 24 मई, 2024 को बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी को ब्याज भुगतान का आदेश दिया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में क्या निष्कर्ष निकाला था?
हाईकोर्ट ने पाया कि दस्तावेज़ में बदलाव महज टाइपिंग की भूल नहीं, बल्कि एक जानबूझकर किया गया धोखाधड़ी का कृत्य था। कोर्ट ने वकीलों की माफी की अपील ठुकरा दी और कहा कि ऐसे आचरण को हल्के में लेना कानूनी बिरादरी के लिए गलत मिसाल बनेगा।
बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी का इस मामले में क्या पक्ष है?
अथॉरिटी ने दावा किया कि उसे बाद में इस कथित धोखाधड़ी का पता चला और उसने समीक्षा याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने समीक्षा याचिका स्वीकार करते हुए 24 मई, 2024 का पूर्व आदेश रद्द किया और अथॉरिटी को पहले वितरित राशि की वसूली का निर्देश दिया था।
इस मामले में आगे क्या होगा?
सर्वोच्च न्यायालय में मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को निर्धारित है। तब तक हाईकोर्ट के सभी निर्देशों — आपराधिक शिकायत और बार काउंसिल को संदर्भित करने सहित — पर अंतरिम रोक लागू रहेगी।
राष्ट्र प्रेस
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