सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर लगाई रोक, दो वकीलों पर कार्रवाई टली
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 24 अगस्त को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसमें दो वकीलों — शिव कांत मिश्रा और कृष्ण कांत मिश्रा — के विरुद्ध आपराधिक और अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया गया था। इन वकीलों पर आरोप है कि उन्होंने बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी से जुड़े एक भूमि अधिग्रहण मामले में अवार्ड की जाली टाइप्ड कॉपी पेश कर न्यायालय को गुमराह किया और अपने मुवक्किलों को अनुचित आर्थिक लाभ दिलाया।
मामले का पृष्ठभूमि और मुख्य घटनाक्रम
यह विवाद बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी द्वारा अधिग्रहित भूमि के मुआवजे पर ब्याज भुगतान से जुड़ा है। आरोप है कि 26 अप्रैल, 2016 के मूल अवार्ड की टाइप्ड कॉपी में अतिरिक्त प्रावधान जोड़े गए — पहले वर्ष के लिए 9 प्रतिशत और उसके बाद 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज — जो कथित तौर पर मूल दस्तावेज़ में नहीं था। इसी कॉपी के आधार पर 24 मई, 2024 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक पीठ ने अथॉरिटी को भूमि मालिकों को ब्याज देने का आदेश दिया था।
बाद में बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी को इस कथित धोखाधड़ी का पता चला और उसने समीक्षा याचिका दायर की। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की पीठ ने मूल अवार्ड और टाइप्ड कॉपी की तुलना की और पाया कि अंतर महज टाइपिंग की भूल नहीं, बल्कि एक सुनियोजित कृत्य था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का निष्कर्ष
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि 'टाइपिंग की गलती धोखेबाजी के कृत्य से अलग होती है।' पीठ ने माना कि वकीलों को ब्याज दरों के जोड़े जाने की जानकारी थी और उन्होंने मुवक्किलों को आर्थिक लाभ दिलाने के उद्देश्य से यह परिवर्तन किया। न्यायालय ने वकीलों की माफी की अपील भी अस्वीकार कर दी और कहा कि 'हरकत के उजागर होने के बाद मांगी गई माफी को सच्चा पछतावा नहीं माना जा सकता।'
पीठ ने यह भी चेताया कि ऐसे आचरण को हल्के में लेने से वकीलों के समुदाय में यह गलत संदेश जाएगा कि 'चालाकी भरी हरकतें तब तक स्वीकार्य हैं जब तक वे पकड़ी न जाएं।' इसके आधार पर हाईकोर्ट ने अपने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वे सीआरपीसी की धारा 340 के तहत कार्यवाही शुरू करें और बार काउंसिल ऑफ इंडिया तथा राज्य बार काउंसिल के समक्ष दोनों वकीलों के लाइसेंस रद्द करने की शिकायत दर्ज कराएं। साथ ही, 24 मई, 2024 का पूर्व आदेश भी रद्द कर दिया गया और अथॉरिटी को पहले वितरित राशि की वसूली का निर्देश दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और अंतरिम आदेश
जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने वकील शिव कांत मिश्रा की स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 30 जुलाई के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। सर्वोच्च न्यायालय ने एसएलपी पर नोटिस जारी करते हुए मामले को 12 अक्टूबर को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
यह अंतरिम रोक उन सभी निर्देशों पर लागू होगी जो हाईकोर्ट ने दोनों वकीलों के विरुद्ध दिए थे — जिनमें आपराधिक शिकायत और बार काउंसिल को अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए संदर्भित करना भी शामिल है।
आम जनता और कानूनी समुदाय पर असर
यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में दस्तावेज़ी हेरफेर की गंभीरता को रेखांकित करता है। आईपीसी की धारा 199 के तहत न्यायालय में झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करना और धारा 193 के तहत झूठी गवाही देना दंडनीय अपराध है। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी उच्च न्यायालय ने अधिवक्ताओं के कथित कदाचार पर इतनी कड़ी टिप्पणी की हो — लेकिन सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप यह स्पष्ट करता है कि अंतिम निर्णय से पहले दोनों पक्षों को सुना जाएगा।
आगे क्या होगा
मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय में होगी। तब तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक बनी रहेगी और दोनों वकीलों के विरुद्ध कोई आपराधिक या अनुशासनात्मक कदम नहीं उठाया जा सकेगा। इस बीच, बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी को वसूली प्रक्रिया और मूल मुआवजे के मामले में भी स्थिति स्पष्ट होने का इंतज़ार करना होगा।