आकृति चौधरी NSA मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को UP सरकार देगी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश सरकार ने 9 सितंबर 2026 को स्पष्ट किया कि वह छात्रा एवं एक्टिविस्ट आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत रद्द करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देगी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की पीठ को सूचित किया कि हाईकोर्ट के फैसले के विरुद्ध शीघ्र अपील दाखिल की जाएगी।
हाईकोर्ट का फैसला और मुआवजे का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में आकृति चौधरी की NSA हिरासत को अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया था और राज्य को ₹5 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया था। विशेष रूप से, अदालत ने यह मुआवजा उन अधिकारियों के वेतन से वसूलने का आदेश दिया जो इस हिरासत के लिए जिम्मेदार थे। इनमें गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम और अन्य संबंधित अधिकारी शामिल हैं।
अदालत की कड़ी टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने नोएडा में श्रमिकों के प्रदर्शन में आकृति चौधरी की कथित भूमिका को आधार बनाकर लगाए गए NSA को सिर्फ 'अनुमान पर आधारित' और 'पर्याप्त साक्ष्य के अभाव वाला' करार दिया। अदालत ने प्रशासन की इस कार्रवाई को 'उपहास के योग्य' बताया और संबंधित अधिकारियों के सेवा अभिलेख में न्यायालय की नाराजगी दर्ज करने का भी निर्देश दिया।
गौरतलब है कि NSA एक निवारक निरोध कानून है जिसके तहत किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है। इसका उपयोग सामान्यतः राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरे की स्थिति में किया जाता है, और आलोचकों का कहना है कि इसका अक्सर दुरुपयोग होता है।
कौन हैं आकृति चौधरी
आकृति चौधरी मूल रूप से पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की निवासी हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज से इतिहास में स्नातक किया है और वर्तमान में DU से ही विधि की पढ़ाई कर रही हैं। वह अपने कॉलेज के दिनों से ही छात्र आंदोलनों से जुड़ी रही हैं।
कुछ महीने पहले नोएडा में 40,000 से अधिक मजदूर अपनी माँगों को लेकर सड़कों पर उतरे थे। उस प्रदर्शन में आकृति चौधरी का नाम सामने आने के बाद उन पर NSA के तहत कार्रवाई की गई थी, जिसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाद में रद्द कर दिया।
आम जनता और नागरिक अधिकारों पर असर
यह मामला इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि NSA जैसे कड़े कानूनों का उपयोग छात्र एक्टिविस्टों और श्रमिक आंदोलनों के संदर्भ में किस हद तक उचित है — यह प्रश्न न्यायिक और नागरिक समाज दोनों स्तरों पर बहस का विषय बना हुआ है। यह ऐसे समय में आया है जब देश में श्रमिक अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर कानूनी लड़ाइयाँ तेज हो रही हैं।
आगे क्या होगा
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में अपील दाखिल होने के बाद शीर्ष अदालत तय करेगी कि हाईकोर्ट का आदेश — जिसमें मुआवजा और सेवा अभिलेख में नाराजगी दर्ज करने का निर्देश शामिल है — बरकरार रहेगा या नहीं। इस मामले का फैसला भविष्य में NSA के उपयोग और अधिकारियों की जवाबदेही के लिए एक महत्वपूर्ण नज़ीर बन सकता है।