31 अगस्त 2026
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छात्र आंदोलन एफआईआर रद्द करने की मांग: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की, मंगलवार को सुनवाई

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छात्र आंदोलन एफआईआर रद्द करने की मांग: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की, मंगलवार को सुनवाई

सारांश

केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अनुच्छेद 142 का सहारा लेते हुए देशभर के छात्र प्रदर्शनकारियों की एफआईआर एक झटके में रद्द कराने की माँग की है — यह कदम 5 सितंबर के प्रस्तावित विरोध मार्च से ठीक पहले आया है। मंगलवार की सुनवाई तय हो गई है।

मुख्य बातें

केंद्र सरकार ने 31 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी देकर देशभर के छात्र प्रदर्शनकारियों की एफआईआर रद्द करने की माँग की।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत 'पूर्ण न्याय' का आग्रह किया।
सीजेआई सूर्यकांत की पीठ मंगलवार, 1 सितंबर को मामले की सुनवाई के लिए सहमत हुई।
सर्वोच्च न्यायालय ने 5 सितंबर के प्रस्तावित विरोध मार्च पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया।
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का इंडिया गेट से दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक मार्च 5 सितंबर को प्रस्तावित है, जिसमें नीट पीड़ित परिवार भी शामिल होंगे।

केंद्र सरकार ने सोमवार, 31 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय में एक अंतरिम अर्जी दाखिल कर जंतर-मंतर सहित देशभर में छात्र प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध दर्ज एफआईआर रद्द करने की माँग की। सरकार ने शीर्ष अदालत से संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए 'पूर्ण न्याय' सुनिश्चित करने का आग्रह किया।

सुनवाई में क्या हुआ

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष यह मामला उठाया। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। मेहता ने तत्काल सुनवाई का अनुरोध करते हुए कहा, "मैं एक अंतरिम अर्जी दाखिल करना चाहता हूँ, अगर आप कल इसकी सुनवाई की इजाज़त दें। यह उस विरोध-प्रदर्शन से जुड़ा है, जिसका मकसद एफआईआर रद्द करवाना वगैरह है। हम संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल कर रहे हैं।"

जब पीठ ने मामले का विवरण माँगा, तो मेहता ने स्पष्ट किया कि अर्जी देशभर में छात्र आंदोलनों के दौरान दर्ज एफआईआर को एक साथ रद्द करने से संबंधित है। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, "अगर पक्ष समझौता कर रहे हैं तो हमें कोई दिक्कत नहीं है।" पीठ मंगलवार, 1 सितंबर को मामले की सुनवाई के लिए सहमत हो गई।

5 सितंबर के प्रस्तावित मार्च की पृष्ठभूमि

यह घटनाक्रम कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा इंडिया गेट से नई दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक 5 सितंबर को प्रस्तावित विरोध मार्च से ठीक पहले सामने आया है। सीजेपी ने 24 अगस्त को इस मार्च की घोषणा की थी। पार्टी का आरोप है कि केंद्र सरकार ने 25 जुलाई को युवाओं से किए गए वादे — जो छात्र आंदोलन वापस लेने की शर्त पर किए गए थे — पूरे नहीं किए।

सीजेपी के अनुसार, प्रस्तावित मार्च का नेतृत्व नीट परीक्षा से जुड़े मृत छात्रों के परिजन और पुलिस कार्रवाई के पीड़ित करेंगे, और इसमें देशभर के छात्र व युवा नागरिक भाग लेंगे। पार्टी ने 18 अगस्त की सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाही का भी हवाला दिया, जिसमें कथित तौर पर अदालत ने देशभर की एफआईआर का विवरण माँगा था।

मार्च पर अंतरिम रोक से इनकार

इससे पहले उसी दिन सर्वोच्च न्यायालय ने 5 सितंबर के प्रस्तावित विरोध मार्च के विरुद्ध कोई अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस चरण में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है जिससे यह माना जाए कि प्रदर्शन से कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होगी। पीठ ने प्रस्तावित मार्च को चुनौती देने वाली एक अर्जी पर नोटिस ज़रूर जारी किया, किंतु 5 सितंबर से पहले इसकी सुनवाई से मना कर दिया।

सर्वोच्च न्यायालय का रुख

अदालत ने कहा कि वह कम से कम इस चरण में यह मानकर चलेगी कि सभी प्रतिभागी जिम्मेदारी से काम करेंगे और शांतिपूर्ण व कानून के दायरे में रहकर हिस्सा लेंगे। साथ ही न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना अंततः पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी है। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में छात्र आंदोलनों से उपजे कानूनी विवाद अभी भी अनसुलझे हैं और मंगलवार की सुनवाई पर सबकी निगाहें टिकी हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

न कि सरकार के अनुरोध पर। यह कदम 5 सितंबर के मार्च से पहले राजनीतिक दबाव को शांत करने की कोशिश जैसा दिखता है, न कि न्यायिक प्रक्रिया में स्वाभाविक विश्वास का प्रतीक। असली सवाल यह है कि क्या एफआईआर रद्द करना उन वादों की पूर्ति का विकल्प बन सकता है जो 25 जुलाई को युवाओं से किए गए थे — जिन पर सीजेपी पहले से ही सवाल उठा रही है। सर्वोच्च न्यायालय की मंगलवार की सुनवाई यह तय करेगी कि यह कदम न्याय की दिशा में है या महज़ टकराव टालने की रणनीति।
RashtraPress
31 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में छात्र एफआईआर रद्द करने की माँग क्यों की?
केंद्र सरकार ने जंतर-मंतर सहित देशभर में छात्र प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध दर्ज एफआईआर को एक साथ रद्द कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी दाखिल की। सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत 'पूर्ण न्याय' सुनिश्चित करने का आग्रह किया।
संविधान का अनुच्छेद 142 क्या है और इसे यहाँ क्यों लागू किया गया?
अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को 'पूर्ण न्याय' के लिए असाधारण आदेश पारित करने की विशेष शक्ति देता है। केंद्र ने इसी प्रावधान का हवाला देते हुए अदालत से देशभर की छात्र आंदोलन से जुड़ी एफआईआर एक साथ रद्द करने का अनुरोध किया।
5 सितंबर का प्रस्तावित विरोध मार्च क्या है?
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने 5 सितंबर को इंडिया गेट से नई दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक मार्च की घोषणा 24 अगस्त को की थी। पार्टी का आरोप है कि सरकार ने 25 जुलाई को छात्रों से किए गए वादे पूरे नहीं किए; मार्च में नीट पीड़ित परिवार और पुलिस कार्रवाई के पीड़ित भी शामिल होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने 5 सितंबर के मार्च पर रोक क्यों नहीं लगाई?
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस चरण में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है जिससे यह माना जाए कि प्रदर्शन से कानून-व्यवस्था की समस्या होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, और उसने मार्च को चुनौती देने वाली अर्जी पर नोटिस जारी किया लेकिन 5 सितंबर से पहले सुनवाई से इनकार किया।
इस मामले में आगे क्या होगा?
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ मंगलवार, 1 सितंबर को केंद्र की एफआईआर रद्द करने की अर्जी पर सुनवाई करेगी। उस सुनवाई का परिणाम 5 सितंबर के प्रस्तावित मार्च और देशभर के छात्र प्रदर्शनकारियों के भविष्य पर असर डाल सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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