NEET प्रदर्शनकारियों पर FIR: सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का वादा, 18 अगस्त को अगली सुनवाई
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष 3 अगस्त को हुई सुनवाई में केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि NEET परीक्षा लीक विरोधी प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर के निपटारे को लेकर वह अपने वादे पर पूरी तरह गंभीर है। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में पेश होकर यह आश्वासन दिया। अगली सुनवाई 18 अगस्त को निर्धारित की गई है।
सरकार का रुख
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा, 'मुझे सरकार की ओर से यह कहने के निर्देश मिले हैं कि वह अपने वादे को पूरा करने के लिए गंभीर है।' उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि मुकदमों के निपटारे को लेकर पहले गलतफहमी थी, लेकिन अब सरकार इस पर सक्रिय रूप से काम कर रही है।
मेहता ने कहा कि यदि प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले लोग सरकार से संपर्क करें, तो कोई रास्ता निकाला जा सकता है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिनका आपराधिक रिकॉर्ड रहा है, उन्हें छोड़कर बाकी सभी प्रदर्शनकारियों के मामलों पर विचार किया जा सकता है। उनके शब्दों में, 'यह एफआईआर छात्रों के सिर पर लटकी नहीं रह सकती।'
पटना एफआईआर और कानूनी पेचीदगियाँ
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील वृंदा ग्रोवर ने पटना में दर्ज एफआईआर का विशेष उल्लेख किया, जिसमें 152 नामज़द व्यक्तियों के अलावा 5,000 अज्ञात लोगों के नाम दर्ज हैं। उन्होंने चिंता जताई कि इस व्यापक दायरे के कारण किसी को भी गिरफ्तार किया जा सकता है।
ग्रोवर ने सुझाव दिया कि इस समस्या के समाधान के लिए राज्य सरकार के साथ मिलकर एक तंत्र विकसित करना होगा, और संभावित रूप से इन एफआईआर को रद्द भी किया जा सकता है। गौरतलब है कि यह मामला केवल केंद्र से नहीं, बल्कि राज्य-स्तरीय पुलिस कार्रवाई से भी जुड़ा है।
फेशियल सर्विलांस पर गंभीर सवाल
याचिकाकर्ता के एक अन्य वकील हरिहरन ने प्रदर्शनों के दौरान बड़े पैमाने पर किए गए फेशियल सर्विलांस को लेकर गंभीर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि प्रदर्शनकारियों से कोई सहमति नहीं ली गई थी, जिससे उनके निजता के अधिकार का उल्लंघन हुआ और यह प्रक्रिया गैर-कानूनी है।
यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत में सार्वजनिक स्थानों पर निगरानी तकनीक के उपयोग को लेकर कोई स्पष्ट कानूनी ढाँचा अभी तक नहीं बना है।
मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि ज्यादती करने वाले पुलिस अधिकारियों या प्रदर्शनकारियों के बीच घुसे आपराधिक तत्वों को बख्शा जाएगा। अदालत ने संकेत दिया कि वह इस मामले में संतुलित दृष्टिकोण अपनाएगी — न तो पुलिस ज्यादती को नज़रअंदाज़ करेगी और न ही वास्तविक अपराधियों को।
आगे क्या होगा
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में 18 अगस्त को अगली सुनवाई करेगा। तब तक सरकार और याचिकाकर्ताओं के वकीलों के बीच एफआईआर निपटारे के तंत्र पर बातचीत जारी रहने की संभावना है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र अपने आश्वासन को ठोस कानूनी कदमों में कैसे बदलता है।